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बहस का स्थान प्यार में

एकदम साफ़ दिखाई दे
उसकी ज़रुरत दबाव डालने की
हावी होने की
दबंगपने की

इस हद तक कि अभी अभी जो सूझा हो
उपाय आपको
बीच बहस में
बातों के चौराहे पर

जिसे लेकर हज़ार फूल खिल गए हों
आँखों के आगे
नोचकर उनमे से
एक एक को
खड़ा करना दलीलों की चिलचिलाती धूप में
नाखुश और निरुपाय
साफ़ दिखाई दे उसकी ज़रुरत उसे………..





प्रतिष्ठा के योद्धा

फिर एक नयी किस्म की चीज़ आविष्कृत हुई
प्रतिष्ठा
जो उनकी होती थी
जो इमानदारी से काम करते थे
सब सहमत हुए
वह चीज़ कहलायी
प्रतिष्ठा
फिर इमानदारी से काम करने वालों की श्रेणियाँ बनीं
कई बातें निकलीं
इस इमानदारी से काम करने की फितरत के भीतर से
कि हम उतना ही काम लें
अपने माथे
जितना कर पाना संभव है
हमारे लिए
जितना हम कर सकते हैं
ताकि काम ठीक से हो
निष्ठा से, लगन से
आत्मीयता और तन्मयता से
काम का मन लायक होना
संतुष्टि भर
अपने आप में एक पारितोषिक है
प्रतिष्ठा से अलग भी
काम की गुणवत्ता पर
असहमतियाँ भी होती हैं
लेकिन प्रतिष्ठा वाली बात का लेना देना
कुछ और बातों से होना चाहिए
जो है नहीं
जैसे घूस के पैसों से भी
गाड़ी में चलने वालों की प्रतिष्ठा है
चोरी खुलेआम, सरेआम कर
मालामाल रहने वालों की
भी प्रतिष्ठा है
दूसरे के हक़ों की चोरी करने वालों
गरीबों के हाथ की रोटी
बच्चों के मुँह के निवालों की चोरी कर
अमीरों को दावत देने वालों की प्रतिष्ठा है
प्रतिष्ठा है उनकी
जो हत्याएं कर
संप्पत्ति लूटते हैं
हथिया कर अधिकार जमाकर
बैठ जाते हैं
विधवाओं की संप्पत्ति पर
प्रतिष्ठा है उनकी
जो पगार लेते हैं
किसी नौकरी की
और काम करते हैं
किसी कलाकारी का
दुकानदारी का
लेकिन मेरी प्रतिष्ठा के इर्द गिर्द
हज़ार सवालिया निशान
लगाने  की
उनकी कोशिश समझ नहीं आती थी
कभी वो कहते थे
मैं कहाँ आती जाती हूँ
कभी वो कहते मैं इतना कम क्यों बोलती हूँ
यानि उनसे बेबात की लड़ाई में
उलझी रहती
तो प्रतिष्ठा दत्तक
जो दरअसल अब
अमीरों के घर की
सजावट की सामग्री थे
मुमकिन है मुझे कुछ दे भी देते
लेकिन प्रतिष्ठा अब एक बहुत
भारी रूप से
गिरवी चीज़ थी
उसे छुड़ा पाना बहुत मुश्किल…………….








एक क्रांति की भ्रान्ति सी

ये जो साफ़ साफ़ दिखती हुई
तीसरी हस्ती है
बहुत ढुलमुल
जो केवल पैदा कर रही है
भ्रान्तियाँ
उलझनें और भ्रम
ये तीसरी हस्ती
जो किसी शर्त की तरह
पेश कर रही है
ये खबर
कि आज के नौकर, दाई, ड्राइवर
रिक्शा चालक, तमाम वाहनों के रखवाले
निजी ही नहीं
सरकारी या प्राइवेट
जो चलते हैं
सड़क पर
और जिनका भाड़ा किया जाता है
सबके चालक
सब श्रमिक, मज़दूर
बोल रहे हैं
उसकी भाषा में
कोई मालिक है
न्याय बांटता
जैसे कबीले का मुखिया
जैसे न्याय की कबीलों सी समझ
ख़ुशी की भी कबीलों सी हस्ती
और ये जो मालिकाना का अंदाज़ लिए
कोई सबकी ख़ुशी का ठेकेदार है
खड़ी करता रोज़ नई भ्रान्तियाँ
समस्याएं
वो आखिर क्यों नहीं समझता
कि बहुत नाजुक हैं
रिश्तों के धागे
प्रेम जैसे
और टूटते हैं
टूट रहे हैं
हमारे इर्द गिर्द चारो ओर
ये सच है
और इससे मुंह फेर लेने से
वह झूठ तो नहीं हो जायेगा ……………….







घर में एक मौत
कल एकदम से उसकी बहन की मौत की खबर आई
मुझे जागने पर बताया गया
खबर पहले ही गयी थी
एकदम सवेरे
वह उदास था
और घर में एक अजीब सी चुप्पी
पिछले दो दिनों से
मेरेउठते ही
माँ के सवाल पर
मेरा बवाल था
कि उठते ही पूछो
खाने में पकने वाली चीज़ों की बातें
बड़ी अजीब चीज़ है
कम पचा पाना
खून की कमी
और बढ़ाने की उसे जुर्रत
ये सब सुनते
कि दरअसल
आप तो बैठे रोटी तोड़ रहे हैं
और जाने क्या तो उनका जवाब पाते
पर जो भी हो
ये कल शाम तय हो गया था
आज बकरे का मांस पकेगा
खस्सी का गोश्त
और ये खबर एकदम अचानक आई
हमारा दिल तोड़ती
मन दुखाती
और थोड़ी देर बाद
वो चुपचाप शलजम काट रहा था
ये ज़िन्दगी है
वो मौत
जो ज़िंदा हैं
उनके लिए ख़ाना पकता ही होगा
वहां भी पका होगा
जो गयी
उसका पति पहले जा चुका था
बच्चों की शादियाँ सब निपट चुकी थीं
उसकी माँ हालाकि ज़िंदा थीं
और कल ही वह उसका भाई
उसकी अपनी नानी के किस्से कह रहा था
कि वह घोर बुढ़ापे में
जब बिल्कुल नहीं सूझता था उसे
मारे मोतियाबिंद के
खेतों की मेड़ों पर
चलती चली जाती थी
और यह जिसपर
लकवे की गाज गिरी
बाद ऑपरेशन के
चल दी अचानक
बिना कहे
जबकि लोग उसे ला ही रहे थे
मायके, पीहर, नइहर
जा ही रहे थे मिलने
हाँ, खबर आई थी
लकवे के आक्रमण की
सन्न रहा था
हमारा घर उस दिन
ठंढ़ से काँपा हुआ सा
खौफ खाया हुआ सा
अब वह चुपचाप
शलजम काट रहा था
और मैं एक बहुत बंजर
विदेशी समय से लौटी थी
जहाँ आलू तक का उगना
दूभर लगता था
वह मेरे बहुत बचपन से
मेरे माता पिता के घर में था
वो अब बूढ़े हो रहे थे
और इंतज़ाम समेत
सबकुछ इतना अनिश्चित
कि लगता था
ज़िन्दगी ही अंत की ओर
अग्रसर
असल समय सूर्योदय नहीं
सूर्यास्त का
मृत्यु आखिरी सच
और वह बहुत उदास हाथों से
काट रहा था
शलजम

और जबकि वह कर्म काण्ड में
बिल्कुल नहीं करती थी विश्वास
हिन्दू रीति से
क्रिया कर्म होने थे
फूंक दिया जाना था देह को
प्राण जाने के बाद
देह देह नहीं थी
राह बताई जानी थी
आत्मा को
मोक्ष और पुनर्जन्म पर
बहस नहीं होनी थी
गाँव में लगातार
जन्म का मौसम था
और उसकी बियाबान ज़िन्दगी में
जन्म पर एक लम्बा विमर्श……………………….





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