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नई दिल्ली। सोशल मीडिया पर यह खबर बड़ी तेजी से वायरल हो रही है कि जेल में बंद बलात्कारी बाबा नकली है और असली गुरमीत सिंह राम-रहीम विदेश भाग गया है।  आज के तकनीकी युग में यह असंभव भी नहीं है। सफेदपोश अपराधी बुरे समय के लिए अपना डुप्लीकेट तैयार रखते हैं। बाबा ने जिस तरह से अपनी सोने की लंका बना रखी थी, उसकी सुरक्षा के लिए उन्होंने कुछ इंतजाम तो किए ही होंगे। सच क्या है इसका पता करना कोई मुश्किल नहीं है। डीएनए जांच से इसका आसानी से पता चल सकता है। बशर्ते सोशल मीडिया की अटकलबाजी को प्रशासन गंभीरता से ले।

लेकिन एक स्वाभाविक सा प्रश्न उठता है कि यदि कोर्ट में हाजिर होने वाला और जेल भेजा जाने वाला राम-रहीन नकली है तो उसे इतने लाव-लश्कर के साथ क्यों लाया गया और उसके बचाव के लिए इतनी बड़ी व्यूह रचना क्यों की गई थी? उसे फरार कराने की आपराधिक साजिश क्यों रची गई थी? उसे आराम से जेल की सज़ा काटने देते और जेल के बाहर उसके परिजनों की देखभाल डेरे की ओर से किया जाता। ऐसा होता तो असली बाबा भूमिगत होकर ठाट से अपने साम्राज्य का संचालन करता।
संभव है बाबा को सज़ा सुनाए जाने के बाद जिन लोगों ने उपद्रव मचाया, पुलिस की लाठी और गोलियां खाईं, मारे गए या घायल होकर अस्पताल पहुंचे, उन्हें अंदर की जानकारी न हो, लेकिन हनीप्रीत साये की तरह डुप्लीकेट राम-रहीम के साथ क्यों लगी रही? जेल में उसके साथ रहने के लिए क्यों बेचैन थी? यह सब सिर्फ दिखावा तो नहीं हो सकता। हनीप्रीत जेल परिसर से तभी बाहर निकली जब उसे बाबा के साथ रहने देने की अनुमति मिलने की कोई गुंजाइश नहीं दिखी।
असली और नकली को लेकर जो तर्क दिए जा रहे हैं, हो सकता है उनमें सच्चाई हो। लेकिन मूल प्रश्न यह नहीं है कि बाबा असली है या नकली। मूल प्रश्न यह है भारत के लोग अंधविश्वास के जाल में कबतक फंसे रहेंगे? इतना तय है कि जबतक अंधभक्तों की मौजूदगी रहेगी ढोंगी बाबाओं का खेल चलता रहेगा। आज राम-रहीम तो कल कोई और...। यह सिलसिला थमने वाला नहीं।

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