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अंशुमान त्रिपाठी
नई दिल्ली। भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में पाकिस्तान के आरोपों का जवाब देते हुए उसकी धज्जी उड़ाकर रख दी। सुषमा स्वराज ने जवाब में जो सवाल दागे उसका कोई जवाब पाकिस्तान के पास नहीं है।
इस सच्चाई से स्वयं पाकिस्तान के हुक्मरान भी इनकार नहीं कर सकते कि पाकिस्तान के गठन के बाद से अबतक चाहे चुनी हुई सरकारें रही हों या फिर सैनिक सरकारें बुनियादी समस्याओं के निदान पर उनका कोई ध्यान नहीं रहा। वे सिर्फ विदेशी इम्दाद पर आश्रित रहीं या फिर नशीली दवाओं की तस्करी के जरिए खुराफात मचाने के सामान जुटाए। कश्मीर का एक हिस्सा उसे भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने दिया था। लेकिन इससे उसे संतोष नहीं हुआ। अपने जन्मकाल से ही वह पूरे कश्मीर पर कब्जे के प्रयास में लगा रहा। इस चक्कर में पूर्वी पाकिस्तान उसके हाथ से निकल गया। भारत के साथ दो बार जंग में बुरी तरह पराजित होने के बाद जब उसे समझ में आया कि आमने-सामने की जंग में वह जीत नहीं सकता तो उसने छद्म युद्ध की शुरुआत कर दी। अपनी सरज़मीन पर आतंकी संगठनों को पालना-पोसना शुरू किया। मकसद था भारत को अशांत करना। इस तरह की लड़ाई में काफी धन की जरूरत होती है। वह अमेरिका से विभिन्न मदों में मदद लेता रहा लंबे समय तक उसपर आश्रित रहा। अरब देशों से भी इस्लाम के नाम पर मदद लेता रहा। लादेन प्रकरण के बाद जब अमेरिका का उसके प्रति मोह भंग होने लगा तो उसने चीन को अपना दाता बनाया। अब चीन का भी उससे मोह भंग होने लगा है। पाकिस्तान ने सही तरीके से आर्थिक विकास के बारे में सोचा ही नहीं। आत्मनिर्भर होने की जरूरत ही नहीं महसूस की। अब अगर चीन अपने इम्दाद में कटौती करता है तो सिर्फ अरब देशों की मदद से उसके लिए आतंकी गतिविधियों को जारी रखने में कठिनाई आएगी। अरब देश उसे आर्थिक सहायता तो दे सकते हैं लेकिन गोला बारूद नहीं। फिलहाल पाकिस्तान को रूस से मदद की उम्मीद है। हालांकि रूस उसके टुच्चेपन को प्रश्रय देगा इसकी संभावना कम दिखती है। लिहाजा आनेवाला समय पाकिस्तान के लिए मुस्किलों भरा हो सकता है। बेहतर है कि वह समय रहते चेत जाए और आतंक के पोषण की जगह विकास का रास्ता पकड़े। इसी में उसका कल्याण है।

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