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 महंगाई, बेरोजगारी, आतंकवाद के सवालों पर जवाब देते नहीं बन रहा है भाजपाइयों को 

अजय औदीच्य
गाजियाबाद। इलैक्ट्रोनिक मीडिया में भले ही नमो-नमो का शोर हो, लेकिन सोशल साइट्स पर इन दिनों मोदी विरोधी लहर सी चल रही है। महंगाई, कालाधन, बेरोजगारी, आतंकवाद जैसे सवालों को खूब उछाला जा रहा है। लोकसभा चुनावों के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषणों के टेप जारी हो रहे हैं और साथ ही उनके दावों की पोल खोली जा रही है। मोदी को अगले 15 साल का प्रधानमंत्री बताने वाले भाजपाई इस मुहिम पर खामोश हैं क्योंकि उन्हें सोशल साइट्स की पोस्ट्स पर जवाब देते नहीं बन रहा है।
इन दिनों सुबह होते ही सोशल साइट्स पर केन्द्र सरकार और प्रधानमंत्री का मखौल उड़ाने वाले कार्टून, वीडियो टेप और कामेन्ट्स देखने को मिल रहे हैं। कुछ नहीं, बल्कि बहुत सारे लोग इस मुहिम के हिस्सेदार हैं। इनमें समाजसेवी भी शामिल हैं और शिक्षाविद, कारोबारी, पत्रकार, उद्यमी और राजनीति से जुड़े लोग भी। मखौल उड़ाने वाली इन पोस्ट्स पर तीखे कामेन्ट्स भी दे रहे हैं। अब तक ऐसे कामेन्ट्स पर जवाबी हमले करने वाले नमोभक्त जैसे एकाएक खामोश हो गए हों। तीन साल में नोटबंदी और जीएसटी के अलावा मोदी सरकार ने क्या किया, यह सवाल सोशल साइट्स में खूब उठाया जा रहा है। कांग्रेस या फिर यूपीए सरकार के कार्यकाल में शुरू की गईं परियोजनाओं का उद्घाटन करने वाले प्रधानमंत्री मोदी के फोटो उनकी उपलब्धियों से बाहर किये जाने की मुहिम चल रही है।
बेशक कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और विपक्ष के कई नेता आरोप लगा रहे हों कि मोदी शासन में भय का माहौल बनाया जा रहा है, लेकिन सोशल साइट्स की पोस्ट्स पर निगाह दौड़ाएं तो लोग बेलाग होकर सरकार को कोस रहे हैं और मजाक उड़ा रहे हैं। सोशल साइट्स पर ऐसी-ऐसी बातें की जा रही हैं, जो असंसदीय हैं और उन पर लगाम लगाने के लिये कानून है। लेकिन ऐसा लग रहा है कि सोशल मीडिया को बेलगाम छोड़ दिया गया है और सबको अपनी भड़ास अपनी भाषा में निकालने की आजादी है।
दरअसल, नोटबंदी के बाद जीएसटी कानून लागू किये जाने के बाद धड़ाम से गिरी जीडीपी ने लोगों को बेकाबू कर दिया है। जनता सवाल उठा रही है कि दुनिया में जब कच्चे तेल के दाम गिर रहे हैं तो भारत में क्यों बढ़ाए जा रहे हैं। सवाल यह भी उठाया जा रहा है कि जब उद्योग-धंधे चैपट हो रहे हैं और महंगाई, बेरोजगारी को लेकर त्राहिमाम की स्थिति है तो बुलेट ट्रेन क्यों लाई जा रही है। आए दिन ट्रेन हादसों को लेकर भी सरकार को घेरा जा रहा है। कालेधन को लेकर नरेन्द्र मोदी के चुनावी भाषणों पर भी घेरा जा रहा है। कश्मीर में हर रोज हो रही गोलाबारी और जवानों की शहादत में हुए इजाफे को लेकर भी प्रश्न किये जा रहे हैं। जाहिर तौर पर इन सवालों का जवाब न सरकार दे पा रही है और न भाजपा के लोग। जवाब दें भी तो कैसे दें?
हैरत की बात यह है कि साल भर पहले तक खुद को हस्तिनापुर से बंधे होने की दुहाई देकर भाजपा की जय-जयकार करने वाले कई लोग भी सोशल साइट्स पर मोदी सरकार को कोसते नजर आ रहे हैं। हैरतजदा हकीकत यह भी है कि राहुल गांधी को सोशल साइट्स पर पप्पू और पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह को मौनी बाबा व स्टेपनी कहकर उनका मखौल उड़ाने वाले लोग भी अब बदले-बदले नजर आ रहे हैं। उन्हें अब केन्द्रीय नेतृत्व संभावनाओं भरा नहीं दिख रहा है। कुल मिलाकर माहौल आश्चर्यजनक रूप से बदला है और सोशल मीडिया इस बदलाव का गवाह बन रहा है। बदले माहौल में इस सवाल को लेकर भी जाहिर तौर पर बहस-मुबाहिसा हो रहा है कि 2019 में भाजपा सत्ता में लौट पाएगी या नहीं। अब तक ताल ठोंककर दावा करने वाले बहस-मुबाहिसे के बीच खामोशी अख्तियार किये दिखने लगे हैं।

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