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नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के 2015 के आदेश को लागू करने में असमर्थता व्यक्त की है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को 1960 के दशक में पड़ोसी देश से आये चकमा-हजोंग शरणार्थियों को नागरिकता प्रदान करने का आदेश दिया था। गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू का कहना है कि सरकार ऐसा नहीं कर सकती क्योंकि ऐसा करना अरुणाचल के स्थानीय निवासियों के अधिकारों का हनन होगा।
सरकार यह बात सुप्रीम कोर्ट को बताएगी कि वह चकमा शरणार्थियों की इतने साल से देखभाल कर रख रही है लेकिन 64 हजार शरणार्थियों को अरुणाचल में बसाना मुमकिन नहीं है। अगर लगातार उनको भारत की नागरिकता दी जाती है तो अरुणाचल का जनसंख्या संतुलन बिगड़ जाएगा।
गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने कहा कि अरुणाचल प्रदेश के सांसद होने के नाते उनका कर्तव्य बनता है कि वह अरुणाचल प्रदेश के निवासियों के अधिकारों की बात सामने रखें। किरण रिजिजू का आरोप है कि पिछली कांग्रेस सरकारों ने बंगाल ईस्टर्न रेगुलेशन 1873 का उल्लंघन किया और चकमा और हजोंग साथियों को लाकर अरुणाचल में बसा दिया।
इस वक्त अरुणाचल में अनौपचारिक रूप से एक लाख चकमा शरणार्थी रह रहे हैं। सरकार कोर्ट को बताएगी कि वह अपने आदेश को इस परिपेक्ष में देखे और उसमें बदलाव लाय, ताकि अरुणाचल के आदिवासी लोगों के अधिकारों की रक्षा हो सके।
गौरतलब है 2015 में एक याचिका के सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पिछले 45 सालों से बिना अधिकारों के अरुणाचल में रह रहे हैं चकमा होजोंग शरणार्थियों को नागरिकता देने का आदेश दिया था। सरकार का मानना कै कि चकमा शरणार्थियों के मामले में फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू करना बहुत मुश्किल है। चकमा शरणार्थियों के मामले में सरकार चाहती है जनता की भावनाओं के मुताबिक अरुणाचल के अलावा देश के बाकी हिस्सों में उन्हें बसाया जाए।


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