0
नई दिल्ली। रविवार 27 अगस्त को पंखुरी सिन्हा के द्वारका स्थित आवास पर उनके दूसरे कविता संग्रह 'बहस पार की लम्बी धूप' पर साहित्यिक चर्चा संपन्न हुई. कार्यक्रम में मुख्य वक्ता विख्यात कवि मंगलेश डबराल और मदन कश्यप थे. कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रोफेसर अर्चना वर्मा ने की, संचालन परिकथा के सहायक सम्पादक सुशील कुसुमाकर जी ने किया।
सबसे पहले, कवयित्री ने अपने सद्य: प्रकाशित संग्रह से, 'आदमी और जानवर', 'एक समूचा वार्तालाप', 'धोबिनिया, खंजन, हजमीनिया' शीर्षक तीन कविताओं का पाठ किया। उन्होंने, टेक्सास, बिहार  और मुंबई में तूफान और बाढ़ की तत्कालीन दुर्घटनाओं की पृष्ठ भूमि में, शीर्षक की प्रतीकात्मकता और प्रकृति विषयक वास्तविकता और प्रासंगिकता पर संक्षिप्त टिप्पणी भी की.
अपने उपन्यास 'जी मेल एक्सप्रेस' को लेकर लोक सभा टीवी पर आ चुकी कवियत्री, कथाकार अलका सिन्हा ने संग्रह पर अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि कवितायेँ बहुलार्थी ही नहीं, एक साथ, कई विषयों को लेकर चलती हैं, जिन्हें पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि चार पांच खाने साथ बुन दिए गए और फिर एकदम से कोई एक धागा उधेड़ दिया गया. जैसे यौवन के साथ हुए अत्याचार की चर्चा आती है, और फिर एकदम से कदम ताल मिलाती हुई राजनीति भी साथ के साथ आ जाती है. यानि कि कविता किसी सीधी लकीर सी कहीं पहुँचाती नहीं है, जैसे लिखने वाला अपने मन की उधेड़ बुन, व्यथा कथा किसी पशोपेश में सुनाता है, पाठक भी इन तमाम सीढ़ियों से गुजरता है. इस समूची शैली और पाठक को यह अनुभव देने की कला को पंखुरी का सिग्नेचर ट्यून माना जा सकता है.
इसके बाद मंगलेश जी ने उपस्थित सभी सुधि जनों से आग्रह किया कि अपनी पसंद की एक एक कविता का पाठ करें और फिर उसपर टिप्पणी। सबसे पहले, मृदुला प्रधान जी ने 'प्यार के बिम्ब' शीर्षक कविता को चुनते हुए, उसे पढ़ा और सराहा। उन्होंने कहा कि यह अपने आप में एक मुकम्मल कविता है, किसी भी सुंदर निर्मित पत्थर की तरह, जिसके बनने में जितने किस्म के अवयव लगे हैं, सबका उल्लेख है.
राकेश धर द्विवेदी जी ने 'चाय की लत से बदतर', अभिषेक जी ने 'पिता के लिए महिमा मंडित गीत', शिवकुमार बिलग्रामी जी ने 'आदमी और औरत' शीर्षक कवितायेँ चुनीं और पढ़कर सराहीं।
जहाँ अलका जी ने कहा कि कविताओं में आधी नींद में निकली कराह की ध्वनि है, वहीं वरिष्ठ कवि मदन कश्यप ने कहा कि पंखुरी की कविताओं में जो चीज सबसे ज्यादा आकर्षित करती है, वह है उसकी भाषा। अधिक जटिल भी नहीं, सरल, सुगम्य और सुबोध भाषा है इनकी कविताओं की. और आज के जटिल समय में जिस तरह अकाव्यात्मक हुई है कविता की भाषा, वह भी नहीं है. उन्होंने कहा कि पंखुरी की भाषा में एक काव्यात्मक पारदर्शिता है--इन्होंने अपनी लम्बी साहित्यिक यात्रा में एक अपनी भाषा अर्जित की है, जो समकालीनों से अलग है. और कविता के लिए, भाषा ही सबसे ज्यादा जरूरी है. दूसरी बड़ी शक्ति इन कविताओं की कि अनुभव और मनोभाव, दोनों के बीच के आयामों को बखूबी तलाशा और तराशा गया है. अनुभव और मनोभाव के बीच के कई रिश्ते यहाँ वर्णित हैं---पंखुरी सीधा सीधी अपने मनोभावों का वर्णन नहीं करतीं, उनके प्रभाव के साथ अपने मनोभावों से टकराती हैं, और कविता में उस टकराहट की छवि उभरती है----जो ज्यादा प्रामाणिक भी है, मौलिक भी और आकर्षक भी. और जहाँ जहाँ इन्होने अपने वैक्तिक अनुभव को समष्टि के, समय के अनुभव से जोड़ा है, वहां रचना बेहतरीन बनी है. यह स्त्री अनुभव और अभिव्यक्ति का समय है, जिसमें इनकी रचनायें सोची समझी, जाँची परखी लगती हैं. कविता में राजनैतिक सजगता भी है, उस उदासीनता की जगह जो कई बार इस जटिल समय की व्याख्या करते इनके समकालीनों में मिलती है.
उन्होंने कहा कि कविता की व्याख्या कहानी की तरह सम्भव नहीं है, और न यह उपक्रम होना चाहिए,  क्योंकि कविता की यात्रा बाहर से बाहर की यात्रा नहीं हो सकती, वह या तो बाहर से भीतर की यात्रा होगी या भीतर से बाहर की यात्रा होगी। यानि चेतन की प्रकृति तक की यात्रा, और उनके परस्पर संवाद बिंदुओं और स्थलों से कविता बनती है. इसी विषय में, उन्होंने कालिदास की वह पंक्ति उद्धृत की--पहले मूल संस्कृत में---फिर अनूदित--जो कहती है कि वसंत धरती पर इस तरह छाया और गदराया है, कि उसने उसे जैसे क्षत विक्षत कर दिया है! इस अभिव्यक्ति को पुरुष की काव्य दृष्टि कहते हुए, उन्होंने स्त्री लेखन की एक उपलब्धि बताई प्रेम और परिहास के माध्यम से प्रतिरोध का सम्प्रेषण। उन्होंने कहा कि बहुत से जटिल विचार पंखुरी की कविताओं में हैं, लेकिन अभिव्यक्ति जटिल नहीं है. इनकी कविता में प्रकृति को, समाज को, इतिहास को देखने की एक पैनी स्त्री दृष्टि है, स्त्री कविता के पास इन सबको देखने का एक अलग नजरिया होना चाहिए।
वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल ने कहा कि उन्हें संग्रह की छोटी कवितायेँ ज्यादा अच्छी लगीं, उनमें एक सूक्तिपरक रिफ्लेक्टिव मूड है. बहुत सी कवितायेँ हैं जो उम्दा हैं, हालाकि यह इस समय की त्रासदी है कि हम सब अपनी बात को कह पाने के लिए सही शब्द, तरीके नहीं ढूंढ पा रहे. उन्होंने कहा कि जैसा कि मुक्तिबोध ने कहा है, हम एक ही समय, एक ही जबड़े में हैं--बहुत से हमारे अनुभव साझा के हैं, जैसे भूमंडलीकरण, स्त्रियों पर अत्याचार, सभी मानवीय संबंधों का छिन्न भिन्न होना। जहाँ पंखुरी  समस्यायों को देख पायी हैं, और ऐसा कई कविताओं में है, वहां रचनाएं सशक्त बनी हैं. इनका अपना नजरिया है, इम्प्रेशनिस्टिक मिजाज, जिसमें कई सम सामयिक समस्याएं ढली हैं, जो संग्रह की विशेषता है. एक और अच्छी बात यह है, कि इसमें 'सेंस आॅफ ह्यूमर' बहुत उम्दा है. जैसे मिया मिट्ठू कविता अच्छी है. इस संग्रह की कविताओं में इनका बदला हुआ शिल्प भी दृष्टि गोचर है, जो एक प्रगति का सूचक है, क्योंकि एक कवि को अलग अलग शिल्पों में काम करना चाहिए। इनकी लेखनी की उड़ान और उठान दोनों के लिए ये अच्छे संकेत हैं. संग्रह की दूसरी ताकत है, मानवीय दु:ख के प्रति एक आॅब्जेक्टिविटी, एक वस्तुपरकता भी है, कोई जख्मीपना नहीं है, जो आम तौर पर कवियों में दिखता है. एक किस्म का खिलवाड़, एक किस्म की बहादुरी दिखती है कि जैसे आप अपनी तकलीफ को भी खेल की तरह ले रहे/ रही  हैं. ये कवितायेँ हाहाकारी होने से बचाती हैं. इनका गुण है कि न इनमें कातरता है, न हाहाकार है.
'मेरी बेटी के पैदा होने का साल' शीर्षक कविता पर विस्तार से बोलते हुए, मंगलेश जी ने कहा कि वह एक बहुत अच्छी कविता है, जिसमें अजीब ढंग से परिकल्पना और वास्तविकता, स्मृति और कल्पना को बुना गया है, जो कविता के कैनवास को बहुत बड़ा करती है. इसी तरह, दाम्पत्य संबंध विच्छेद पर कई कवितायेँ हैं, जिनमें वस्तुगठता है, निजी से दूरी और समय के एक संकट का रेखांकन है. इन कविताओं में पूरी स्त्री जाति की पीड़ा और उसके आगे की चुनौतियों को देखा जा सकता है. साथ ही, इनमें परकाया प्रवेश का भी गुण है. मंगलेश जी ने संग्रह से, 'पेड़ों की राजनीति' शीर्षक कविता का पाठ किया, जिसे उन्होंने एक बढ़िया कविता बताया।
अपने अध्यक्षीय भाषण में अर्चना वर्मा जी ने कहा, कि इन कविताओं की पंक्तियों के बीच कई फाकें हैं, जिनमें से कई बार अलग अलग सूत्र निकलकर खड़े हो जाते हैं, मुमकिन है यह कवियत्री का कोई शिल्पगत प्रयोग हो! उन्होंने दो कविताओं का पाठ किया, 'निकट बर्खास्तगी', और 'मित्रता पर जोर'. धन्यवाद् ज्ञापन, सुशील कुसुमाकर जी ने किया, जिसके बाद भी शमशेर की कविता के अर्ध और पूर्ण विराम से लेकर, फूलों और पंखुरियों की खेती और विध्वंस, पेड़ काटने और कविता के शिल्प पर लम्बी बातें चलती रहीं।






Post a Comment Blogger Disqus

 
Top