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-देवेंद्र गौतम
राहुल गांधी ने कैलिफोर्निया में कहा है कि पूरा भारत परिवारवाद से चलता है। यदि यह सच है और भारत के लोग भी इससे सहमत हैं तो आज प्रधानमंभी की कुर्सी पर नरेंद्र मोदी कैसे आसीन हैं? उत्तर प्रदेश में मुलायम परिवार के किसी व्यक्ति की जगह योगी आदित्यनाथ को किसने बिठा दिया? वे तो किसी स्वनाम धन्य परिवार से नहीं आए हैं। क्या उन्हें सत्ता सौंपने का फैसला भारत के लोगों का नहीं था? साफ है कि राहुल गांधी अभी तक भारत को समझ ही नहीं सके हैं। वे वही भारत देखते हैं जो उनके चाटुकार दिखाते हैं।

राहुल जी को पता नहीं है कि सिर्फ किसी परिवार विशेष में जन्म ले लेने से व्यक्तित्व का विकास नहीं हो जाता। बाप-दादा के नाम का सिक्का दो-तीन पीढ़ियों से ज्यादा नहीं चलता। बड़े परिवार में जन्म लेने का इतना लाभ जरूर होता है कि आपको पहचान के संकट से नहीं गुजरना पड़ता। आप शुरुआती संघर्ष से बच जाते हैं। लेकिन आपका भविष्य तो अंतत: आपकी प्रतिभा से ही तय होगा। कांग्रेस के लोग आपके परिवार के भक्त हो सकते हैं। पूरा देश नहीं हो सकता। हालांकि आपकी पार्टी के अंदर से भी असहमति के स्वर उठते ही रहे हैं। कांग्रेसी आपके भक्त हो सकते हैं लेकिन भारत में सिर्फ कांग्रेसी तो नहीं रहते। यह देश कुछ परिवारों के प्रति श्रद्धा का भाव रख सकता है लेकिन अपना भविष्य तो गिरवी नहीं रख सकता। आप तो इतने असहिष्णु हैं कि अपने पूर्वजों के गलत निर्णयों की चर्चा पर भी भड़क उठते हैं। किसी घोटाले में आपके परिवार के किसी सदस्य का नाम आता है तो उसकी जांच का स्वागत करने की जगह उसे झुठलाने के लिए सत्ता के दुरुपयोग तक पर उतर जाते हैं। राष्ट्रीय अपमान का विषय बना डालते हैं। आप तो देश के टुकड़े करने का नारा लगाने वालों के प्रति सहानुभूति रखते हैं। उनकी अभिव्यक्ति की आजादी की चिंता में बेचैन हो जाते हैं। लोग कैसे विश्वास करें कि आपके हाथ में देश सुरक्षित रहेगा।
वैसे भी परिवारवाद लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं है। यह राजतंत्र के जमाने की चीज है। तब राजपरिवार के लोग ही राजा की गद्दी के अधिकारी होते थे। सत्ता का पूरा संघर्ष एक परिवार के अंदर चलता था। लोकतंत्र की व्यवस्था में ऐसा नहीं होता। कोई भी व्यक्ति सत्ता की लालसा रख सकता है। उसके संघर्ष में शामिल हो सकता है। शायद आपको यह बात अच्छी न लगे लेकिन यह कटु सत्य है कि जिसमें प्रतिभा होती है वह पूर्वजों का नाम नहीं बेचता। चलते हुए लड़खड़ाता है। ठोकर भी खाता है। लेकिन अपनी राह स्वयं बनाता है। इसलिए राहुल जी, परिवारवाद के जेट विमान से उतरिए और अपनी ज़मीन खुद तलाश करिए। भारत परिवारवाद से नहीं प्रतिभावान नेतृत्व से चलता है। नेतृत्व के लिए कम से कम देश के सामाजिक-आर्थिक नब्ज को पहचानना होता है। सांस्कृतिक मूल्यों को समझना होता है। बाप-दादा, नानी-नाना के नाम पर सत्ता की चाबी मिलने का समय बीत चुका है। आप छुट्टी मनाने बार-बार विदेश जाते हैं। देश में आपका मन नहीं लगता और सत्ता पर अपना जन्मगत अधिकार भी समझते हैं। छुट्टियां मनाने के लिए देश में भी बहुत से रमणिक स्थल हैं। विदेश में कोई और आकर्षण है तो बात अलग है। जुड़ना है तो देशवासियों की भावनाओं से जुड़िए। तभी कल्याण हो सकता है।

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