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देवेंद्र गौतम
नई दिल्ली। देश के सार्वजनिक क्षेत्र के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक आॅफ इंडिया ने न्यूनतम जमा राशि की अनिवार्यता के नियमों पर पुनर्विचार करने की घोषणा की है। अगर उसने यह काम नहीं किया तो खाताधारियों की एक बड़ी संख्या अपना खाता बंद अथवा निष्क्रिय रखने को विवश हो सकती है। स्वयं स्टेट बैंक प्रबंधन ने कुछ दिनों पूर्व जानकारी सार्वजनिक की थी कि न्यूनतम जमा राशि का पालन नहीं करने वाले ग्राहकों से जुमार्ने के रूप में कई हजार करोड़ की वसूली हुई है।
दरअसल खातादारियों की एक बड़ी संख्या नौकरी पेशा अथवा छोटे व्यवसायी वर्ग से आती है। ये खाते का संचालन तो नियमित रूप से करते हैं लेकिन अल्प आय भोगी होने के कारण महीने में न्यूनतम जमा राशि निकालने की भी नौबत आ जाती है। ऐसे में बैंक पैसा काट लेते हैं तो उनके अंदर आक्रोश उपजना स्वाभाविक है। नोटबंदी के बाद स्टेट बैंक ने न्यूनतम जमा राशि की सीमा 5 हजार तय कर दी है। जो खाते में लाखों करोड़ों जमा रखते हैं, उन्हें तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जन-धन योजना के उन खाताधारियों को भी अंतर नहीं पड़ता जो बैंकिंग व्यवस्था से हाल में जुड़े हैं। फर्क उन्हें पड़ता है जो न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति भर उपार्जन करते हैं और बैंकिंग व्यवस्था से लंबे समय से जुड़े हैं। स्टेट बैंक और अन्य सरकारी बैंकों के नियमों के सख्त किए जाने और रिजर्व बैंक तथा सरकार की इसमें मौन सहमति के बाद आम भारतीयों में यही संदेश गया कि मोदी सरकार उच्च वर्ग और निम्न वर्ग को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़े रखना चाहती है मगर निम्न मध्यम वर्ग को इससे बाहर निकाल फेंकना चाहती है। इसीलिए ऐसे-ऐसे नियम बनाए जा रहे हैं कि वह अपने खाते बंद कर पूरी तरह नकदी की अर्थ व्यवस्था में आ जाएं। बैंक अपने नियमों के जरिए खाताधारियों से करोड़ों-करोड़ की वसूली तो कर सकते हैं लेकिन यह उनकी व्यावसायिक शुचिता पर सवाल खड़े करेगा और उन्हें दूरगामी नुकसान उठाना पड़ेगा। चंद करोड़पतियों के भरोसे बैंक का संचालन संभव नहीं है। दूसरी बात यह है कि निम्न मध्यम वर्ग के लोग ही बैंकों से छोटे-मोटे कर्ज लेकर अपना व्यवसाय करते हैं और नियमानुसार किस्त जमा करते हैं। किस्त जमा करने में विलंब होने पर बैंक उनपर दबाव भी डाल पाते हैं। अरबपति व्यापारियों के पास बैंकों का कितना पैसा डूबंत खाते में चला गया है, सर्वविदित है। विजय माल्या जैसे लोग अरबों का कर्ज लेकर विदेश भाग चुके हैं। उनका सरकार कुछ नहीं बिगाड़ पा रही तो बैंकों की क्या औकात है। इसलिए बैंकों को और मोदी सरकार को भी निम्न मध्यम वर्ग के हितों के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए। यह वर्ग शांति से जीना और ईमानदारी की रोटी खाना चाहता है। लेकिन जब यह गुस्से में आता है तो बड़ी से बड़ी सत्ता को भी पलटकर रख देता है। नोटबंदी और जीएसटी की मार झेल रही जनता पर अगर बैंक भी नियमों के डंडे बरसाना शुरू करेंगे तो पानी सिर के ऊपर चला जाएगा। फिर क्या होगा कोई नहीं जानता। गनीमत है कि सरकार ने तो नहीं लेकिन स्टेट बैंक ने ऐसे खाताधारियों की परेशानियों को महसूस किया और इसमें बदलाव की जरूरत समझी। जितनी जल्दी संभव हो उसे इसपर अमल करना चाहिए।

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