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अंशुमान त्रिपाठी
डोकलाम का युद्ध टल गया लेकिन चीन ने इससे कुछ सबक तो लिया ही है। तनाव बढ़ने के साथ ही भारत में चीनी उत्पादों के बहिष्कार का आंदोलन तेज़ हो गया। उसके बाजार पर जबर्दस्त असर पड़ा। इससे चीन के व्यवसायी वर्ग में खलबली मची। विदेशी निवेशकों का दबाव पड़ा। चीन की अर्थ व्यवस्था पहले ही मंदी के दौर से गुजर रही थी। ऐसे में सिर्फ अड़ियल रुख अपनाने और दादागीरी जमाने के नाम पर एशिया के सबसे बड़े बाजार से हाथ धो बैठना उसकी अर्थ व्यवस्था के लिए घातक होता। अगर युद्ध हो जाता तो उसे साथ हुई पूर्व की तमाम संधियां भंग हो जातीं। इसके बाद भारत के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाते। इससे जो क्षति होती उसे उसका एकमात्र परम मित्र पाकिस्तान कभी भरपाई नहीं कर सकता था। पाकिस्तान की दोस्ती के कारण चीन की अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में भी फजीहत हो रही थी। लिहाजा समय रहते उसे बात समझ में आ गई और वह पीछे हट गया। अब वह भारत के साथ बराबरी का बर्ताव कर रहा है। भारत के हितों में अड़ंगा डालने से भी बच रहा है। हाल में संयुक्त राष्ट्र महासभा में जब पाकिस्तान ने कश्मीर मुद्दे पर अंतर्राष्ट्रीय हस्तक्षेप की मांग की तो चीन ने साफ तौर पर कह दिया कि यह भारत और पाकिस्तान का आपसी विवाद है। पाकिस्तान को कश्मीर की लड़ाई लड़नी है तो अपने बूते लड़े। इधर भारत के विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान के दावों की हवा निकाल दी। गलत तसवीर पेश कर उसने स्वयं के आतंकी राष्ट्र होने की छवि पर खुद ही मुहर लगा दिया। अभी तक की भारत की सरकारें चीन की आंख में आंख मिलाकर बात करने से कतराती थीं। इसलिए उसने सोचा था कि बंदरघुड़की देकर अपनी बात मनवा लेगा। जब उसे लगा कि भारत युद्ध के मैदान से पीछे नहीं हटेगा तो उसने अपने कदम पीछे खींचे। लेकिन जिस बहिष्कार आंदोलन से उसके होश ठिकाने आए वह भारत सरकार अथवा भारतीय सेना द्वारा आहुत नहीं था। वह जन समुदाय की तरफ से उठा हुआ स्वाभाविक रोष था। दो सरकारों के बीच समझौता हो जाने पर भी यह जन-विक्षोभ खत्म होने वाला नहीं है। भारतीय लोगों के अंदर से उठा यह भावनात्मक ज्वार अब स्वदेशी की तरफ मुड़ जाएगा। इसके सीधे निशाने पर चीन भले न आए लेकिन परोक्ष निशाने पर तो रहेगा ही। भारतवासियों का दिल जीतने के लिए उसे अभी बहुत कुछ करना होगा। अपनी चालबाजियों से तो उसे हर हाल में बचना होगा।

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