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जातीय समीकरण को भी साधने की कोशिश 

योगी आदित्यनाथ के प्रतिद्वंदी माना जाता हैं शिव प्रकाश

अंशुमान त्रिपाठी

नई दिल्ली। शिव प्रताप शुक्ला को मंत्रिमंडल में शामिल करके पीएम मोदी ने यूपी के समीकरण को साधने की कोशिश की है तो दूसरी तरफ उन्होंने जातीय समीकरण को भी साधने की कोशिश की है। पूर्वांचल से भाजपा का प्रतिनिधित्व करने वाले योगी आदित्यनाथ को यूपी की कमान सौंपने के बाद भाजपा को किसी ऐसे नेता की दरकार थी जो गोरखपुर सहित पूर्वांचल का प्रतिनिधित्व कर सके। ऐसा इसलिए भी काफी जरूरी हो गया था क्योंकि मोदी मंत्रिमंडल से कलराज मिश्रा ने भी इस्तीफा दे दिया था, इस कमी को पूरा करने के लिए पीएम मोदी ने प्रदेश उपाध्यक्ष शिव प्रताप शुक्ला को अपने मंत्रिमंडल में जगह दी है। शिव प्रताप शुक्ला भी गोरखपुर से ताल्लुक रखते हैं और उन्हें योगी आदित्यनाथ का प्रतिद्वंदी माना जाता है।
ऐसे में जिस तरह से योगी आदित्यनाथ को प्रदेश का जिम्मा सौंपा गया है उसके बाद शिव प्रताप को कैबिनेट में जगह देकर पीएम मोदी ने यूपी की राजनीतिक में बैलेंस लाने का प्रयास किया है। माना जा रहा है कि जिस तरह से यूपी में योगी सरकार आने के बाद लगातार कई विवाद खड़े हुए हैं उसके बाद पीएम मोदी इससे खुश नहीं थे, लिहाजा उन्होंने शिव प्रताप को कैबिनेट में जगह देकर योगी आदित्यनाथ को साफ संकेत दिया है कि वह सरकार चलाने के अपने रवैये में बदलाव करें। एक तरफ जहां शिव प्रताप गोरखपुर से आते हैं और उनका ब्राह्मणों में काफी प्रभाव है, ऐसे में शिव प्रताप के कैबिनेट में शामिल होने से प्रदेश के ब्राम्हणों को भी साधने की कोशिश की गई है। इस कड़ी में पीएम मोदी मंत्रिमंडल से महेंद्रनाथ पांडे की छुट्टी करके उन्हें यूपी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया था। शिव प्रताप का पूर्वांचल की राजनीति में काफी दबदबा है, लोग उन्हें उनकी छवि की वजह से काफी पसंद करते हैं। उन्होंने लगातार चार बार 1989,1991,1993 और 1996 में विधायकी का चुनाव जीता था। शिव प्रताप के बढ़ते कद को देखते हुए योगी आदित्यनाथ ने उनके खिलाफ उम्मीदवार खड़ा करके उन्हें चुनाव तक हरवाया था, इसी के बाद से दोनों ही नेताओं के बीच तनातनी शुरू हो गई थी। यहां तक कि यूपी विधानसभा चुनाव के दौरान भी शिव प्रताप और योगी आदित्यनाथ एक साथ नहीं दिखे थे। शिव प्रताप शुक्ला के खिलाफ जिस तरह से योगी आदित्यनाथ ने सियासी दांव खेला उसके बाद शिव प्रताप का सियासी सफर लगभग खत्म हो गया था, लेकिन बावजूद इसके उन्होंने कभी भी पार्टी का दामन नहीं छोड़ा। पार्टी के साथ उनकी वफादारी को देखते हुए पीएम मोदी ने उन्हें 2014 में राज्यसभा पहुंचाया और अब उन्हें अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया है। ब्राम्हणों को खुश करने की कवायद दरअसल जिस तरह से योगी आदित्यनाथ ने यूपी की कमान संभालने के बाद लगातार तमाम बड़े पदों पर राजपूतों को जगह दी उससे ब्राह्मण समाज खुद को अपेक्षित महसूस करने लगा था। प्रदेश के डीजीपी से लेकर, डीएम, पुलिस अधीक्षक, महाअधिवक्ता के पद पर भी राजपूतों को बैठा दिया गया। यही नहीं पूर्वांचल में ब्राह्मण नेता हरिशंकर तिवारी के घर पर पुलिस ने छापेमारी भी की, रायबरेली में 5 ब्राम्हणों की हत्या भी हुई, जिसके चलते भाजपा के खिलाफ लगातार ब्राम्हणों के बीच में रोष बढ़ रहा था। ऐसे में शिव प्रताप शुक्ला के कैबिनेट में आने से से काफी हद तक यूपी के समीकरण को साधने में भाजपा को मदद मिलेगी,जिसका लाभ 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को हो सकता है। आपात काल में जेल भी गए हैं शिव प्रताप शुक्ला ने अपनी राजनीतिक पारी बतौर छात्र राजनेता के तौर पर शुरू की थी। शिव प्रताप का भी कार्यक्षेत्र गोरखपुर रहा है, वह गोरखपुर के एक मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते हैं। शिव प्रताप शुक्ला का जन्म गोरखपुर के पास खजनी के रुद्रपुर गांव में हुआ था। उन्होंने अपनी पढ़ाई गोरखपुर से ही पूरी की है, गोरखपुर के ही दीनदयाल विश्वविद्यालय से उन्होंने कानून की पढ़ाई की। वह आपातकाल के दौरान जेल भी गए और प्रदेश में भाजपा सरकार के दौरान मंत्री भी रहे। लेकिन 2002 की हार के बाद वह संगठन के कार्य में जुट गए, जिसका उनको बखूबी फल मिला है।

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