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देवेंद्र गौतम
बीएचयू में लाठी चार्ज के मामले में बनारस के कमीश्नर नितिन कर्ण की जांच रिपोर्ट में भी यूनिवर्सिटी प्रशासन को लापरवाही का दोषी ठहराया है। वे समय रहते मामले को सुलझा सकते थे। लेकिन उन्होंने इसे और भड़कने दिया।

अब तो यह बात भी सामने आ रही है कि लाठी चार्ज करने वाले दरअसल वीसी के सुरक्षाकर्मी थे। इत्तेफाक से उनकी वर्दी भी खाकी थी। इसके कारण लोगों को लगा कि पुलिस ने बर्बरता की है। बनारस के जिलाधिकारी ने तीन दिनों के अंदर यूनिवर्सिटी के सुरक्षाकर्मियों की वर्दी का रंग बदलने का आदेश दिया है। इस प्रकरण में सच पूछें तो वीसी की सोच ही गलत थी। एक खबरिया चैनल से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा था कि छेड़खानी तो देश भर में होती है। हमारी यूनिवर्सिटी में ही नहीं। यह एक सुरक्षात्मक जवाब था। इसका सीधा मतलब है कि वे छेड़खानी को सामान्य घटना मानते हैं। उनके परिसर में छेड़खानी होती है तो यह कोई ऐसी बात नहीं जिसे गंभीरता से लिया जाए। अपनी इसी सोच के कारण उन्होंने चिनगारी को दावानल में परिणत होने दिया। और अब जब पूरे देश में भर्त्सना हो रही है तो प्रशासन को और विपक्षी राजनीतिक दलों को इसके लिए दोषी ठहरा रहे हैं। वे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े हैं और भाजपा सरकार के खास लोगों में हैं। इसीलिए वे आश्वस्थ हैं कि उनपर कोई कार्रवाई नहीं होगी। उन्हें बचा लिया जाएगा। केंद्र में ही नहीं यूपी में भी भाजपा की ही सरकार है। आमतौर पर सरकारी तंत्र ऐसे मौकों पर कुछ लोगों को बलि का बकरा बनाकर अपने लोगों को बचाने का काम करता है। इस कांड में भी इसी के संकेत मिल रहे हैं। योगी सरकार ने तो मामले की रिपोर्ट मांगी है लेकिन वाराणसी के सांसद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अभी तक इस घटना पर कोई टिप्पणी नहीं की है। अगर मोदी और योगी की सरकार भी यही नीति अपनाती है तो कांग्रेस और भाजपा के बीच का फर्क ही मिट जाएगा। भाजपा वाइस चांसलर को बचाने में अपनी ताकत का इस्तेमाल करती है तो कांग्रेस ने राबर्ट बाड्रा के जमीन घोटाले बचाव कर क्या गलती की थी। इस दौर में एक खास बात यह हुई है कि मुद्दा चाहे कितना भी संवेदनशील हो उसे राजनीतिक मुद्दा बना दिया जाता है। विपक्ष के पास किसी को सांप्रदायिक करार देना राजनीतिक गाली है तो सत्तापक्ष ने देशद्रोही शब्द को विरोधियों के खिलाफ गाली के रूप में प्रयोग करना शुरू कर दिया है। अनावश्यक राजनीनितिक उपयोग के कारण इन शब्दों की अर्थवत्ता भी खत्म होती जा रही है। अब देखना है कि केंद्र और राज्य सरकार अपने समर्थक वीसी को बचाने का प्रयास करती या फिर छात्र समुदाय का विश्वास जीतने के लिए निष्पक्ष कार्रवाई का आदेश देती है। सरकार जो भी करेगी उसका असर पूरे देश के छात्र और युवा वर्ग पर पड़ेगा इसमें कोई संदेह नहीं है।

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