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अंशुमान त्रिपाठी
नई दिल्ली। दिल्ली मेट्रो कारपोरेशन लिमिटेड भी भारतीय रेलवे के हमराह चल पड़ा है। उसकी की तरह याङिÞयों की जेब पर ज्यादा से ज्यादा दबाव डालने की रणनीति बना ली है। वर्ना मात्र पांच महीने के अंदर दूसरी बार किराया बढ़ोत्तरी की क्या जरूरत आ पड़ी। यह 3 अक्टूबर से लागू होगा। आखिर इतनी जल्दी किराया बढ़ोत्तरी की क्या जरूरत आ पड़ी। जहां तक मेट्रो में यात्रियों का सवाल है, आमतौर पर 20 से 30 हजार प्रतिमाह आय वाले मध्यम वर्ग के लोग इसमें सफर करते हैं। मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों ने पहले ही इस वर्ग के बजट को बिगाड़ रखा है।
नोटबंदी और जीएसटी से उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोत्तरी हो गई। दूसरी तरफ आर्थिक मंदी का असर हर सेक्टर में दिखने लगा जिससे खासतौर पर निजी क्षेत्र के कर्मियों के वेतन में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई। रोजगार के भी लाले पड़ गए। अच्छे दिनों के इंतजार में बुरे दिनों का दंश झेलना पड़ रहा है। ऊपर से मेट्रो भी उनपर बोझ लाद देगा तो उनकी क्या हालत होगी, यह सोचनेवाला कोई नहीं है। जहां तक मेट्रो का सवाल है पिक आवर हो या सामान्य समय किसी लाइन का मेट्रो खचाखच भरा हुआ ही चलता है। सीट से ज्यादा खड़े-खड़े चलने वाले लोग होते हैं। फिर भी मेट्रो की वित्तीय जरूरतें पूरी नहीं हो पा रही हैं तो इसका क्या किया जा सकता है। समस्या यह है कि कमाई बढ़ाने के नाम पर प्रबंधकों को सिर्फ उपभोक्ताओं की जेब ही नज़र आती है। वैकल्पिक उपायों की तरफ ध्यान ही नहीं जाता। यह विज्ञापन का युग है। मेट्रो प्रबंधन को विज्ञापनों से भी अच्छी आमदनी होती है। थोड़ी दूरदर्शिता से काम लिया जाए तो इसे और बेहतर बनाया जा सकता है। कई ट्रेनों के डब्बों पर किसी कंपनी का प्रचार नहीं होता। कई स्टेशनों के होर्डिंग खाली पड़े रहते हैं। डब्बों के अंदर भी इसकी पर्याप्त गुंजाइश रहती है। आमतौर पर वहां दिल्ली सरकार के विज्ञापन भरे रहते हैं। अगर विज्ञापन और स्टेशनों पर व्यावसायिक गतिविधियों का प्रबंधन सुनियोजित तरीके से किया जाए तो डीएमआरसी की आय में काफी इजाफा हो सकता है। लेकिन प्रतीत होता है कि रेलवे की तरह यहां भी दूरदर्शिता का अभाव है। अब दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस मामले को गंभीरता से लिया है। उन्होंने किराए बढ़ोत्तरी के फैसले को रद्द करने के उपायों पर विचार करने को कहा है। उनके निर्देश पर दिल्ली के परिवहन मंत्री ने मेट्रो प्रमुख को अपने दफ्तर में बुलाया है। क्या निर्णय होगा कहना मुश्किल है। लेकिन सत्ता में बैठे लोगों को मध्यम वर्ग के हितों का ध्यान रखना चाहिए। यह पढ़ा लिखा और जागरुक वर्ग है। यह आर्थिक रूप से भले कमजोर हो लेकिन हवा बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखता है। अच्छे-अच्छों का तख्ता पलट करने में इसी वर्ग की भूमिका होती है। इसलिए उसे परेशान करने से बचना चाहिए। 

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