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नई दिल्ली। जदयू के शरद यादव गुट ने नीतीश कुमार को पार्टी के अध्यक्ष पद से हटा दिया। भाजपा के साथ गठबंधन सहित उनके तमाम फैसलों को खारिज कर दिया। यह तमाम फैसले एकतरफा और राजनीतिक हैं। नीतीश गुट स्वाभाविक रूप से इसे मानना तो दूर सुनना भी गवारा नहीं करेगा। निश्चित रूप से शरद यादव एक ऐसी जंग लड़ रहे हैं जिसमें जीत की संभावना संदिग्ध है। नीतीश कुमार ने जो फैसला लिया जाहिर है कि कार्यकर्ताओं और सहयोगियों को विश्वास में लेकर ही किया। उस समय शरद जी से उनकी बात हुई या नहीं पता नहीं लेकिन शरद जी ने तत्काल अपना विरोध दर्ज नहीं किया था। कुछ समय तक वे टिप्पणी करने से बचते रहे थे। लालू प्रसाद के संपर्क में आने के बाद उनका आक्रोश धीरे-धीरे बढ़ा था। उन्हें लालू परिवार के भ्रष्टाचार के आरोपों और भाजपा की धारा के बीच चयन करना था। उन्होंने जातिवाद और भ्रष्टाचार का चयन किया। भाजपा और जदयू के बीच कोई पहली बार गठबंधन नहीं हुआ है। यह गठबंधन पहले भी बना था और उनकी साझा सरकार पहले भी बिहार में चल चुकी है। साझा सरकार के बावजूद जदयू की धर्म निरपेक्ष छवि पर कोई असर नहीं पड़ा था। उस वक्त शरद जी को भी भाजपा के साथ गठबंधन में कोई बुराई नज़र आई थी। इसबार लालू प्रसाद के उकसावे के कारण वे भड़क उठे हैं। लालू प्रसाद धुरंधर नेता हैं। उन्होंने शरद जी के समर्थन में जदयू के कुछ लोगों को जुटा भी दिया है। उनका मुख्य मकसद जदयू को तोड़ना और नीतीश कुमार से बदला लेना है। लेकिन शरद जी के साथ जुटे अधिकांश नेता भूतपूर्व हैं। वर्तमान लोगों का समर्थन होता तो वे बिहार सरकार को कब का गिरा चुके होते। अभी तो उनकी राज्यसभा सदस्यता ही संकट में है। राजनीति में असली और नकली का फैसला दावेदारी से नहीं समर्थकों की तादाद से होता है। जदयू की संवैधानिक स्थिति का फैसला चुनाव आयोग में होना हैै। अभी जिस तरह के कार्यक्रम हो रहे हैं वह राजनीतिक प्रहसन मात्र कहे जा सकते हैं। इस तरह की गतिविधियों से शरद जी का वजन हल्का होगा और कद पर भी असर पड़ेगा। वे एक गंभीर नेता हैं। उन्हें अपनी गरिमा बचाए रखनी चाहिए।

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