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 बीएचयू में छात्राओं पर लाठी चार्ज 

-देवेंद्र गौतम
 बीएचयू में छात्राओं पर लाठी चार्ज के मामले में जिन तीन अधिकारियों पर कार्रवाई की गई, उनकी भूमिका तो स्थितियों के बेकाबू होने के बाद शुरू हुई थी। हालात को बिगाड़ने वाले तो बच निकले। 12 सौ छात्रों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया। उन्हें आंदोलित करने वालों का कुछ न बिगड़ा। प्राय: इस तरह की हर घटना के बाद इसी तरह की कार्रवाई होती है। कुछ अधिकारी बलि का बकरा बना दिए जाते हैं। लोगों का गुस्सा शांत हो जाता है और असली दोषी अपने रुत्बे की आड़ में बच निकलते हैं। बीएचयू के कुलपति ने अगर छात्राओं की मांग पर ध्यान दिया होता और उनके साथ बैठक कर समस्या का समाधान करने का आश्वासन भी दे दिया होता तो तनाव इतना नहीं बढ़ता।
हालात उनके अड़ियल रुख और संकीर्ण सोच के कारण बिगड़े। छात्राओं ने कोई गलत मांग नहीं की थी। वे कैंपस के अंदर शांति और सुरक्षा की मांग कर रही थीं। इज्जत के साथ रहना चाहती थीं। यह विश्वविद्यालय प्रशासन की जिम्मेदारी भी थी। इसका निर्वहन करने की जगह कुलपति ने दकियानूसी अंदाज में कह दिया कि शाम के बाद तुमलोग क्या रेप होने के लिए निकलती हो। उन्हें अपने परिसर में मनचलों की आवाजाही से कोई फर्क नहीं पड़ता था। उनकी गंदी हरकतों और फब्तेबाजी से भी उन्हें नाराजगी नहीं थी। लड़कियों के छात्रावास के रास्ते में बिजली की व्यवस्था करने की जरूरत उन्होंने महसूस नहीं की। लड़कियां हास्टल में कैद रहें यही सुरक्षा संबंधी उनकी सोच थी। उनकी गलत टिप्पणी और संकुचित धारणा के कारण ही छात्रों का आक्रोश बढ़ा। सुरक्षा की मांग आंदोलन में तब्दील हो गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वाराणसी दौरे के दौरान एक छात्रा ने अपने सिर मुड़वाकर विरोध दर्ज किया। लेकिन प्रधानमंत्री तक उनकी आवाज़ नहीं पहुंची या उन्होंने अनसुनी कर दी। स्पेशल ब्रांच ने भी उन्हें विश्वविद्यालय के अंदर चल रहे घटनाक्रम से संभवत: अवगत कराना जरूरी नहीं समझा। प्रधानमंत्री जी भूल गए कि वे देश के प्रधानमंत्री होने के साथ वाराणसी के सांसद भी हैं। वे एक बार कुलपति को समझा देते तो मामला शांत हो जाता। लेकिन वे भी अपने व्यस्त कार्यक्रमों से निपटकर वापस लौट आए।  अब बीएचयू के छात्र-छात्राओं के आक्रोश की यह लहर देश के अन्य विश्वविद्यालयों में फैल रही है। क्या इसके लिए वाराणसी के तीन अधिकारी ही जिम्मेवार हैं? सरकार को इसपर विचार कर संयम से काम लेना चाहिए। छात्रों का आंदोलन किसी भी सरकार की सेहत के लिए अच्छा नहीं होता।

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