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अंशुमान त्रिपाठी
 दिल्ली। भारतीय सेना ने एक तरफ आपरेशन अर्जुन चलाकर पाकिस्तान को घुटने टेकने पर विवश कर दिया, दूसरी तरफ म्यामार बार्डर पर नगा उग्रवादियों के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक की तर्ज पर कार्रवाई कर उनके होश ठिकाने लगाए। इसे आतंकवाद के खिलाफ सही कार्रवाई कहा जा सकता है। इसी तरह की कार्रवाइयों के अभाव में आतंकी संगठनों का दु:साहस सातवें आसमान पर पहुंच गया था। सेना ने एक और मोर्चे पर कामयाबी हासिल की है। वह है स्थानीय लोगों का समर्थन प्राप्त करना। कुछ समय पहले तक कश्मीर की जनता सेना को उत्पीड़क के रूप में देखती थी और अलगाववादी नेता उनके शुभचिंतक बने हुए थे। आतंकवाद के कारण पर्यटन उद्योग मार खा चुका था और बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हो गए थे। इस स्थिति का लाभ अलगाववादी उठा रहे थे। वे पाकिस्तान और अरब देशों से भारी भरकम धन प्राप्त करते थे और उसका इस्तेमाल लोगों को देश के खिलाफ भड़काने और आतंकियों का समर्थन जुटाने में करते थे। टेरर फंडिंग के खिलाफ एनआइए और सेना की कार्रवाई के बाद फंडिंग का पूरा तंत्र टूट गया। इस बीच कश्मीरी लोगों को यह समझ में आने लगा कि अलगाववादी उनके शुभचिंतक नहीं थे बल्कि पाकिस्तान के हितों को साधने में उनका इस्तेमाल करते थे। केंद्र सरकार ने सेना में खस्मीरी युवकों को नियोजित करना शुरू किया तो उनकी धरणा बदली। अब कश्मीरी अवाम सुरक्षा बलों को पूरा सहयोग दे रही है। उनकी सूचनाओं के जरिए घुसपैठ को रोकने में बड़ी मदद मिली है। आवश्यकता सि बात की है कि सरकार कश्मीरी युवकों की परेशानी को समझे, उन्हें रोजगार मुहैय्या कराए। जबतक आतंकवाद पर पूरी तरह नियंत्रण नहीं हो जाता, पर्यटन उद्योग में तेज़ी आने की उम्मीद नहीं की जा सकती। इस बीच संक्रमण काल के दौरान वहां रोजगार का सृजन किए जाने की जरूरत है। इससे कश्मीरी जनता के बीच यह संदेश जाएगा कि दिल्ली में बैठी हुई सरकार उनकी शुभचिंतक है और उनकी फिक्र करती है। सेना और सुरक्षा बलों को भी ज्यादा से ज्यादा जनोन्मुखी होने की जरूरत है। उसे आम कश्मीरियों और आतंकी संगठनों से जुड़े लोगों के बीच अंतर करना होगा। इस तरह के तत्वों को जनता से अलगाव में डालने की रणनीति अपनानी होगी। तभी बेहतर नतीजे प्राप्त हो सकते हैं।

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