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रंगून। रोहिंग्या मुसलमानों के नरसंहार ने म्यांमार में वीभत्स रूप ले लिया है। चश्मदीदों के मुताबिक, पश्चिमी राखीन राज्य में बर्मा की सेना और पैरामिलिटरी फोर्स बच्चों के सिर काट रहे हैं और उन्हें जिन्दा जला रहे हैं। रोहिंग्या उग्रवादियों पर शिकंजा कसे जाने के बाद से करीब 60 हजार रोहिंग्या मुसलमान देश छोड़कर बांग्लादेश की सीमा में जा चुके हैं। जो लोग सेना के अत्याचार से बच गए उन्होंने हिंसा की भयावहता बताई है। अब्दुल रहमान (41) नाम के एक व्यक्ति ने बताया, 'मेरे भाई को मार दिया गया। सैनिकों ने उसे समूह के साथ जिंदा जला दिया।' अब्दुल ने बताया, 'मैंने अपने परिवार के अन्य सदस्यों के शव मैदान में पड़े देखे। उन्होंने उनके शरीर पर गोलियों से निशान बना दिए थे और कुछ के सिर कटे हुए थे।' उन्होंने बताया, 'मेरे दो भतीजों के सिर नहीं थे। एक छह साल का था और एक नौ साल का। मेरी पत्नी की बहन को गोली मार दी गई।'
अब्दुल की तरह एक और ग्रामीण सुल्तान अहमद (27) ने बताया, 'कुछ लोगों के सिर काट दिए गए। सेनाएं जब हमारे पड़ोसी गांव के लोगों के सिर काट रही थी उस समय हम अपने घर में छुपे हुए थे।' उन्होंने कहा, 'जैसे हमने यह देखा, हम वहां अपने घर से तुरंत भाग निकले।' बर्मन सेना से बच निकले कई लोगों की ऐसी ही कहानी है। ह्यूमन राइट वॉच द्वारा जारी की गई सैटलाइट तस्वीरों में एक रोहिंग्या गांव की 700 इमारतों को आगे में झुलसते देखा जा सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि विस्थापित हुए लोगों की संख्या बढ़ सकती है। वहीं बर्मन सेना का कहना है कि अब तक 400 उग्रवादी मारे जा चुके हैं।
म्यांमार में हो रही हिंसा पर वैश्विक नेता भी बयान दे रहे हैं। ब्रिटेन के विदेश सचिव बोरिस जॉनसन ने कहा कि इस हिंसा का अंत होना चाहिए। उन्होंने म्यांमार की स्टेट काउंसलर आंग सन सू की से अपील की इस हिंसा पर कार्रवाई करें। तुर्की के राष्ट्रपति रेजेप तैयब एर्दोआन ने एक कदम आगे जाते हुए कहा कि बर्मा की सेनाएं नरसंहार कर रही हैं और जो इससे अनदेखा कर रहे हैं इसमें सहापराधी हैं।
हालांकि हिंसा पर बर्मा सरकार ने इस आरोप से इनकार किया है कि वह पत्रकारों को प्रभावी इलाकों में जाने नहीं दे रही। रोहिंग्या मुसलमानों के नरंसहार पर आंग सू की अब तक चुप रही हैं। इसके चलते उन्हें और उनके देश का काफी आलोचना सामना करना पड़ा है। आंग सू की को शांति को नोबेल पुरस्कार मिल चुका है।

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