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अंशुमान त्रिपाठी
नई दिल्ली। हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या प्रकरण ने दिलचस्प मोड़ लिया है। इस मामले को दलित उत्पीड़न का मामला बनाया गया। देश के सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों का माहौल गरमाया गया। भाजपा के कई नेता आरोपों के घेरे में लाया गया। केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा किया गया। देश के लगभग सभी हिस्सों में इसे एक अति गंभीर और अति संवेदनशील मुद्दा बनाया गया। इसकी आड़ में राष्ट्रविरोधी तत्व भी अपने स्वार्थ की रोटियां सेंकने से नहीं चूके। उन्होंने खुलेआम राष्ट्र विरोधी नारे लगाए। भारत के हजार टुकड़े कर देने की बात की। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, वामपंथी व अन्य विपक्षी नेताओं ने राष्ट्रविरोधी नारों को भी पूरी बेशर्मी के साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुद्दा बनाया।

अब इस मामले को लेकर गठित जांच कमेटी की रिपोर्ट आ चुकी है। इस रिपोर्ट ने सारे परिदृश्य को ही उलटकर रख दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक वेमुला ने किसी तरह की प्रताड़ना से आजिज आकर नहीं बल्कि व्यक्तिगत कारणों से आत्महत्या की थी। अपने सुसाइड नोट में भी उसने अपने सहपाठियों, विश्वविद्यालय प्रशासन या राजनेताओं पर कोई दोषारोपण नहीं किया है। सबसे बड़ी बात यह कि रिपोर्ट के मुताबिक वह दलित था ही नहीं। उसके पिता वी. मणिकुमार बडेरा समुदाय से हैं। बडेरा समुदाय अति पिछड़ा वर्ग से आता है, दलित समुदाय से नहीं। हालांकि उसकी मां का तर्क है कि वह माला समुदाय से है जो अनुसूचित जाति के तहत आता है।
बहरहाल मुख्य बात यह है कि दलितवाद के चक्कर में मूल सवाल पीछे छूट गया। वेमुला की आत्महत्या को जातिवाद के चश्मे से देखने का प्रयास किया गया। इस मौत की आड़ में राजनीतिक रोटियां सेंकी गर्इं। सवाल यह है कि क्या रोहित वेमुला को सिर्फ एक होनहार छात्र नहीं माना जा सकता था। अगर ुउसकी जगह कोई सामान्य छात्र रहा होता तो क्या उसकी आत्महत्या किसी की संवेदना को नहीं झकझोरती। क्या तब भी इतने मोटे-मोटे आंसू बहाए जाते और तूफान खड़ा किया जाता? वेमुला किसी व्यक्तिगत कारण से परेशान था और अपने जीवन का अंत करने की ठान चुका था। मनुष्य की परेशानी उसके चेहरे से झलकती है। तो क्या उसके चेहरे पर झलकती परेशानी पर उसके किसी सहपाठी ने गौर नहीं किया? कारण जानने की कोशिश नहीं की? ऐसी मन:स्थिति में कोई भी व्यक्ति अपने विश्वासी और करीबी लोगों से जरूर अपनी परेशानी बताता है। सवाल है कि वह शुभचिंतक जिनकी संवेदना उसकी मौत के बाद जागृत हुई क्या वेमुला के चेहरे के भावों को समय रहते नहीं पढ़ पाए। उसकी मौत के बाद उन्हें दलितवादी तूफान खड़ा करने का एक अवसर मिल गया। राष्ट्रविरोधी नारे लगाने का बहाना मिल गया। अब पूछा जाना चाहिए कि यह राजनीतिक स्वार्थ की रोटियां सेंकने के अलावा और क्या था। इस मुद्दे को लेकर जेएनयू में जो कुछ हुआ वह शिक्षण व्यवस्था की सबसे शर्मनाक परिघटना कही जा सकती है। राहुल गांधी ने इसे सत्तारूढ़ भाजपा पर राजनीतिक हमले के एक अवसर के रूप में देखा और विवादास्पद बयान देकर अपनी और कांग्रेस की मिट्टी पलीद कर ली।

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