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भाजपा और कांग्रेस की प्रतिष्ठा दांव पर
कांग्रेस के 46 विधायक बेंगलुरु से वापस लौटे

अहमदाबाद। गुजरात में कल आठ अगस्त को राज्यसभा की तीन सीटों के चुनाव के लिए भाजपा और कांग्रेस के आला नेताओं ने डेरा जमा लिया है। इस चुनाव में खास तौर से भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है।
इस चुनाव में कांग्रेस नेतृत्व की मुश्किलें बढ़ती ही जा रही हैं। पार्टी को अपने विधायकों में मची भगदड़ को रोकने के लिए उन्हें बेंगलुरु ले जाना पड़ा वहीं राकांपा भी तेवर दिखा रही है। दूसरी तरफ चुनाव में नोटा का बटन भी परेशान कर रहा है। राज्यसभा का चुनाव दोनों प्रमुख दलों के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। भाजपा से अमित शाह और केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की जीत तय मानी जा रही है। लेकिन भाजपा अपने अतिरिक्त 33 मतों के बूते बलवंतसिंह राजपूत को चुनाव जिताने में जुटी है। रविवार को शाह के आवास पर विधायकों की बैठक बुलाई गई। कांग्रेस के अहमद पटेल पिछले 25 साल से कांग्रेस में अहम प्रभाव रखते रहे हैं। गुजरात में राज्यसभा का चुनाव एक सीट तक सीमित नहीं है। आगामी विधानसभा चुनाव पर अहमद पटेल की जीत या हार का असर होगा। अगर कांग्रेस को कामयाबी मिलती है तो पार्टी का संबल ऊंचा होगा। अगर चुनाव में हाथ के हाथ में पराजय आती है तो कांग्रेस को मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। इस बीच एनसीपी के वरिष्ठ नेता प्रफुल्ल पटेल ने कहा है कि 2012 के चुनाव में कांग्रेस ने उनके साथ दगाबाजी की थी। अहमद पटेल को वोट देने का फैसला आलाकमान करेगा। उन्होंने कहा कांग्रेस वर्तमान हालत के लिए खुद जिम्मेदार है। कांग्रेस प्रभारी अशोक गहलोत ने कहा है कि बहुमत होने के बाद भी भाजपा तोड़फोड़ की राजनीति कर रही है।
कांग्रेस ने चुनाव से पहले भाजपा पर अपने विधायकों को लालच और धमकी से तोड़ने की कोशिश का आरोप लगाते हुए 44 एमएलए बेंगलुरु भेज दिए थे। उन्हें एक रिजॉर्ट में ठहराया गया था। मंगलवार को होने वाले राज्यसभा चुनाव से पहले अहमद पटेल आज शाम रिजार्ट में सभी विधायकों से मुलाकात करेंगे। इससे पहले अहमद पटेल ने कहा कि वो राज्यसभा चुनाव में अपनी जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं। सभी विधायक उनके साथ हैं। भाजपा की तरफ से केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह तो कांग्रेस की ओर से सोनिया गांधी के सलाहकार अहमद पटेल के उम्मीदवार होने की वजह से इस पर सबकी निगाहें हैं। इन तीनों की ही जीत तय थी लेकिन कांग्रेस के छह विधायकों के पार्टी छोड़ने और भाजपा के एक और उम्मीदवार खड़ा करने से मामला पेचीदा हो गया है।

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