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नीतीश को सबक सिखाने के लिए बनाया  मोहरा
भ्रष्टाचार के मुद्दे पर ही हुआ जदयू और राजद के बीच तलाक 

अंशुमान त्रिपाठी
पटना। 20 साल पहले चारा घोटाले के मुद्दे पर शरद यादव ने लालू का साथ छोड़ा था। अब भ्रष्टाचार के मुद्दे पर ही जदयू और राजद के बीच तलाक हुआ है। इसके बावजूद लालू के राजनीतिक डोरों में उलझकर शरद यादव दुबारा राजद से हाथ मिला सकते हैं। राजनीतिक हल्कों में यह चर्चा का विषय है। नीतीश की रणनीति से चारो खाने चित हुए लालू बौखलाहट में हैं। उन्हें तरह-तरह के संबोधनों से संबोधित कर रहे हैं। वे जदयू को तोड़कर नीतीश को सबक सिखाना चाहते हैं। इसीलिए वे शरद यादव की महत्वाकांक्षा को जागृत कर रहे हैं। लेकिन आज की तारीख में शरद यादव की जदयू पर कितनी पकड़ रह गई है कहना कठिन है। शरद जी नीतीश से जदयू का नेतृत्व छीन लेंगे, इसकी दूर-दूर तक संभावना नहीं दिखती। लालू ने उनकी कमजोर रग पर हाथ रख दिया है। इस चक्कर में पड़कर वे अकेले राजद में शामिल होंगे या उनके साथ जदयू का एक हिस्सा भी जाएगा यह आनेवाला समय बताएगा।
बिहार में महागठबंधन की सरकार गिर जाने के बाद और बीजेपी-जेडीयू की सरकार बन जाने के बाद से लालू प्रसाद यादव लगातार नीतीश कुमार पर हमलावर रहे हैं। जेडीयू के नाराज नेताओं के बारे में भी वह मीडिया से लगातार बात करते रहे हैं। अब लालू प्रसाद यादव ने कहा है कि जेडीयू के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता शरद यादव 8 अगस्त को उनसे मिलने के लिए पटना आ रह हैं। लालू यादव ने यह बात रांची में मीडिया कर्मियों से कही है। इधर जेडीयू के सूत्रों ने भी साफ कर दिया है कि अगर शरद ऐसा करते हैं तो उन्हें मनाने की कोशिशें बंद कर दी जाएंगी। शरद यादव दुविधा में हैं। उन्हें सेक्यूलरिज्म का भी निर्वहन करना है और भ्रष्टाचार को संरक्षण देने से भी बचना है।
बिहार की सत्ता में उथल-पुतल के बाद से शरद यादव लगातार नाराज चल रहे हैं। उनके करीबी लोगों ने स्पष्ट कहा कि वह पार्टी के इस फैसले से खुश नहीं है। हालांकि शरद यादव ने अभी तक नीतीश कुमार पर कोई सीधा हमला नहीं किया है लेकिन वह लगातार केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर हमला करते आ रहे हैं। यह स्पष्ट है कि अब बिहार में जेडीयू और बीजेपी की मिली जुली सरकार है।
शरद यादव ने समान विचारों वाली पार्टियों की एक बैठक 17 अगस्त को बुलाई है। वहीं, जेडीयू की कार्यकारिणी की बैठक 19 अगस्त को बुलाई गई है। यह माना जा रहा है कि पार्टी की अहम बैठक से पहले इस प्रकार की बैठक का आह्वान कहीं उनके अगले राजनीतिक इरादों की ओर इशारा तो नहीं है।
शरद यादव कई मंचों से कई बार बीजेपी को सांप्रदायिक पार्टी करार दे चुके हैं और नीतीश कुमार के बीजेपी के साथ जाने के फैसले से वह नाराज बताए जा रहे हैं।  राजनीतिक हल्कों में यह विचार हो रहा है कि अगर शरद यादव लालू प्रसाद यादव के साथ जाते हैं तब यह करीब 20 सालों बाद होगा जब चारा घोटाले और पार्टी में वर्चस्व के बाद शरद यादव ने लालू का साथ छोड़ा था। याद दिला दें कि 1997 में लालू प्रसाद यादव ने आरजेडी का गठन किया था  जब शरद यादव ने पार्टी प्रमुख के पद के लिए नामांकन दाखिल किया था।

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