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तीन तलाक मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का स्वर्णिम ऐतिहासिक फैसला

नौ करोड़ मुस्लिम महिलाओं में खुशी की लहर - अनुराधा त्रिवेदी


सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए तीन तलाक को असंवैधानिक करार दे दिया, जिसके बाद तलाक-ए-बिद्दत यानी एक बार में तीन तलाक बोलकर तलाक देना बंद हो गया है। कोर्ट का यह फैसला मुस्लिम महिलाओं को इस दंश से आजादी देता है साथ ही मुस्लिम पर्सनल लॉ को चैलेंज करता है। मामले को लेकर मुस्लिम धर्म गुरु फहीम बेग आज तक पर यह सवाल उठा दिया कि सरकार यूनिफार्म सिविल कोर्ड लागू करना चाहती है। 

तीन तलाक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने याचिका दायर करने वाली शायरा बानों ने अपनी याचिका में यह भी मांग की थी कि बहु विवाह की परंपरा भी खत्म करना चाहिए। इस्लामिक शरीयत के मुताबिक कोई भी मुस्लिम शख्स चार शादियां कर सकता है।

तीन तलाक के मसले में पाकिस्तान में 1961 में ही तीन तलाक पर रोक लगा दी थी। सन् 1955 में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री मोहम्मद अली बोगरा ने अपनी पहली पत्नी की मर्जी लिये बगैर अपनी सेकेटरी से विवाह कर लिया था। उनकी पत्नी ने जिसका विरोध किया, कोर्ट गई और 1961 में तीन तलाक पर रोक लग गयी। 
मुसलमानों में प्रचलित तीन तलाक की वैधानिकता पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया है।

मुख्य न्यायाधीश जे.एस. खेहर की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ के पांच न्यायाधीश बारी-बारी से अपना फैसला पढ़ा। पांच में से तीन जजों ने इसे असंवैधानिक करार दिया। सबसे पहले न्यायाधीश खेहर ने अपना फैसला पढ़ा उन्होंने अपहोल्ड (क्क॥ह्ररुष्ठ) शब्द का इस्तेमाल करते हुए कहा कि तीन तलाक पर संसद को फैसला करना चाहिए। उन्होंने कहा सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए केन्द्र सरकार को आदेश देती है कि छ: माह में तीन तलाक पर कानून बनाये इस दौरान छ: माह की अवधि में तीन तलाक पर रोक रहेगी। इसके बाद अपना फैसला पढ़ते हुए तीन अन्य जजो न्यायमूर्ति यू.यू. ललित न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ और न्यायमूर्ति आर एफ नरीमन ने तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया। 

इस पीठ की खासियत यह भी है कि इसमें पांच विभिन्न धर्मो के अनुयायी शामिल है। हालांकि यह बात कोई माइने नहीं रखती क्योंकि न्यायधीश का कोई धर्म नहीं होता।इस मामले पर सुनवाई कोर्ट ने स्वयं संज्ञान लेकर शुरू की थी लेकिन बाद में छ: याचिकाए दाखिल हो गयी थी जिसमें से पांच में तीन तलाक को रद्द करने की मांग है। 

चायिकाकर्ताओं ने दलीले इस तरह थी - कुरान शरीफ ने तीन तलाक का जिक्र नहीं है। दूसरी दलील थी- तीन तलाक महिलाओं के साथ भेदभाव है इसे खत्म किया जाये। तीसरी दलील थी- महिलाओं को तलाक लेने के लिए कोर्ट जाना पड़ता है जबकि पुरुषों को मनमाना हक दिया गया है। चौथी दलील- यह गैरकानूनी और असंवैधानिक है।

इस विषय पर सुनवाई का विरोध कर रहे मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जमीयत ए उलेमा ए हिंद की ओर से दलीले रखी गयी थी। इनका कहना था तीन तलाक अवांछित है लेकिन वैध है। दूसरे यह पर्सनल लॉ का हिस्सा है कोर्ट इसमें दखल नहीं दे सकता। तीसरे 1400 साल से चल रही प्रथा है यह आस्था का विषय है संवैधानिक, नैतिकता और बराबरी का सिद्धांत इस पर लागू नहीं होता। चौथे पर्सनल लॉ में इसे मान्यता दी गयी है। तलाक के बाद उस पत्नी के साथ रहना पाप है। धर्मनिरपेक्ष अदालत इस पाप के लिए मजबूर नहीं कर सकती। पांचवा पर्सनल लॉ को मौलिक अधिकारों की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता। 

इंदौर निवासी शाहाबानो पांच बच्चों की मां थी 1978 में पति से तीन तलाक के बाद इन्होंने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और सुप्रीम कोर्ट ने गुजारा भत्ता हेतु केस जीत लिया था। 1986 में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी थे मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के भीषण विरोध और दबाव की वजह से संसद में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को धता बताते हुए शाहबानो के जीते हुए केस को खारीज कर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बात मानी गयी थी। कोर्ट से जीतने के बाद भी शाहबानो को न्याय नहीं मिल पाया था। उल्लेखनीय है कि संविधान से ऊपर इस देश में कुछ भी नहीं है। ना मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की कोई संवैधनिक हैसियत है ना ही जमीयत ए हिन्द की कोई हैसियत है। संविधान सबसे ऊपर है महज तुष्टीकरण के लिए राजीव गांधी के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय की अवहेलना स्पष्ट रूप से राजनीतिक लाभ के लिए उठाया गया फैसला है। 

कोर्ट ने तीन तलाक मुद्दे पर बहुत महत्वपूर्ण टिप्णीयां की है जो चीज ईश्वर की नजर में पाप है वह इंसान द्वारा बनाये गये कानून में वैध कैसे हो सकती है। क्या तीन तलाक इस्लाम का अभिन्न हिस्सा है क्या निकाह नामे में महिला को तीन तलाक को न कहने का हक दिया जा सकता है अगर हर तरह का तलाक खतम कर दिया जायेगा तो पुरुषों के पास क्या विकल्प होगा। बहरहाल इस फैसले ने अधिकारों से वंचित तमाम मुस्लिम महिलाओं को एक शानदार निर्णय के द्वारा न केवल राहत दी है बल्कि जीवन जीने के लिए एक अच्छा अवसर भी दिया है। वक्त की मांग है कि मुस्लिम समाज की निति निर्धारक संस्थाएं खुले मन से सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर फैसले के बाद अब मुस्लिम समाज के बुद्धिजीवियों और समाज सुधारकों की परीक्षा की बारी है कि वे धर्म के नाम पर पिछले डेढ़ हजार सालों से जारी इस बेरहम, बेदिल परम्परा से मुस्लिम महिलाओं को निजात दिलाने के लिए शिद्दत से काम करे। 

तीन तलाक के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की स्पेशल बैंच का फैसला ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है इसे स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाना चाहिए। इस फैसले ने देश की नौ करोड़ मुस्लिम महिलाओं की जिंदगी में सुकुन भर दिया है। सही है कि इसके बाद भी मुस्लिम महिलाओं की परेशानी आसानी से कम नहीं होगी। लेकिन यह तय है कि सारा देश इस मसले पर उनके साथ है। यह समय की मांग है कि मानवीय मसलों और व्यापक सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दे राजनीति से ऊपर रखकर देखे जाने चाहिए।

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