0
अंशुमान त्रिपाठी
नई दिल्ली। गुजरात में अहमद पटेल की राज्यसभा चुनाव में जीत से कांग्रेस को कोरामिन की कुछ खुराक जरूर मिली है लेकिन इसे सत्ता में वापसी की दिशा में कोई शुभ संकेत होने का मुगालता नहीं पालना चाहिए। पटेल किसी तरह अपनी सीट निकालने में सफल रहे हैं। उनकी प्रतिष्ठा बच गई है। कांग्रेस ने गुजरात के 14 बागी विधायकों पर कार्रवाई कर अपनी अनुशासन प्रियता का प्रदर्शन किया है। दरअसल गुजरात ही नहीं देश के कई राज्यों में पार्टी के अंदर भगदड़ मची हुई है।
उनके नेता और कार्यकर्ता भाजपा में शामिल हो रहे हैं। अनुशासन का डंडा जरूर चलना चाहिए लेकिन इस भगदड़ के कारणों को समझने की कोशिश भी करनी चाहिए। जयराम रमेश सहित कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता इस ओर इशारा कर चुके हैं। दरअसल अभी 2024 तक भाजपा की सत्ता पर कोई आंच आने या कांग्रेस की सत्ता में वापसी की कोई संभावना नहीं दिख रही है। विपक्ष के कई नेता भी इसे स्वीकार कर चुके हैं। दरअसल मध्यमार्गी दलों के नेता और कार्यकर्ता किसी सैद्धांतिक आधार पर पार्टी से नहीं जुड़े होते। उनका एकमात्र लक्ष्य सत्तासुख प्राप्त करना होता है। लोग इसके लिए पांच साल इंतजार कर सकते हैं लेकिन जहां भविष्य की कोई तसवीर न दिख रही हो वहां बेहतर संभावनाओं की तलाश लाजिमी हो जाती है। फिलहाल कांग्रेस का कोई भविष्य नजर नहीं आ रहा है। वर्तमान नेतृत्व और उसकी कार्यप्रणाली से भी निराशा का ही माहौल बन रहा है। कांग्रेसी नेहरू-गांधी परिवार से मुक्त होकर अपने अस्तित्व की तलाश करने की कल्पना भी नहीं कर सकते। इस परिवार में दो लोग हैं जो बागडोर संभाल सकते हैं। एक राहुल गांधी तो उन्होंने अपनी छवि इस तरह की बना ली है कि उन्हें कोई गंभीरता से नहीं लेता। एक प्रियंका हैं तो उनके व्यक्तित्व पर उनके पति राहु-केतु की तरह स्थाई भाव से मौजूद हैं। इनलोगों ने अपने उत्तराधिकारी को भी जन्म नहीं दिया है। सोनिया गांधी की उम्र हो चुकी है। वैसे भी यह परिवार भारतीय नहीं रह पाया है। राहुल को छुट्टी मनाने के लिए भारत में कोई जगह पसंद नहीं आती। उन्हें बार-बार विदेश जाना पड़ता है। कांग्रेस की कमान यदि इस परिवार के हाथ में रही तो इसका बंटाधार तय है। परिवार के बाहर किसी के हाथ में कमान हो तभी इसके अस्तित्व के बचने की कोई सूरत निकल सकती है। इस निराशा के माहौल में नेता और कार्यकर्ता भाग रहे हैं तो यह कहीं से अस्वाभाविक नहीं है। सिर्फ अनुशासन का डंडा चलाने से अस्तित्व को बचा पाना फिलहाल कठिन है। समय बदल चुका है। राजनीति के मूल्य बदल चुके हैं। सेक्युलरिज्म की आड़ में आर्थिक लूट को अब जनता बर्दास्त करने को तैयार नहीं है। अब मुगालते पालने की जगह आत्ममंथन के जरिए रास्ता तलाशने की जरूरत है।

Post a Comment Blogger Disqus

 
Top