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लंबे समय से जारी जंग कोर्ट के आदेश के बाद निर्णायक मोड़ पर  

देवेंद्र गौतम

नई दिल्ली। तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद भारत के मुस्लिम समाज में लैंगिक युद्ध की शुरुआत हो गई है। आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने अभी इसपर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। 11 सितंबर को भोपाल में बोर्ड की बैठक के बाद उसकी प्रतिक्रिया आएगी। लेकिन कई मौलानाओं ने इसे शरीयत के साथ छेड़छाड़ का मामला बताते हुए तीखा विरोध किया है। कुछ ने तो न्यायपालिका के हस्तक्षेप को ही अनुचित बताया है। दूसरी तरफ मुस्लिम महिलाएं इस फैसले का भरपूर समर्थन कर रही हैं। बल्कि आॅल इण्डिया मुस्लिम वूमेन पर्सनल लॉ बोर्ड ने तो सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि कोर्ट के आदेश के बाद भी कोई तीन तलाक देता है तो उसके लिए सजा का प्रावधान किया जाए। दरअसल कोर्ट के आदेश के बाद मेरठ में एक गर्भवती महिला को तीन तलाक देने का मामला सामने आया है। इस तरह मुस्लिम समाज में एक तरह से जेंडर वार शुरू हो चुका है। बल्कि सच तो यह है कि यह जंग लंबे समय से जारी थी, कोर्ट के आदेश के बाद यह निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है।
सवाल है कि जब तीन तलाक पर 22 मुस्लिम देशों में पहले से ही कानूनी प्रतिबंध है तो भारतीय मुसलमान इसे जारी रखने के लिए तरह-तरह के कुतर्क क्यों गढ़ रहे हैं। पाकिस्तान जैसा कट्टर मजहबी देश जब इस प्रावधान को बंद कर चुका है तो भारत में इसपर अड़ियल रुख अपनाने का क्या अर्थ है। सवाल है कि क्या पाकिस्तान और प्रतिबंध लगाने वाले अन्य मुसलिम बहुल देश भारतीय मुसलमानों की तुलना में शरीयत की जानकारी कम रखते हैं? महिलाओं के साथ अन्यायपूर्ण व्यवस्था को समाप्त करने पर सहमति व्यक्त करने की उदारता दर्शाने में उन्हें परेशानी क्या है। मुस्लिम और अन्य समुदायों के पुरुषों का एक बड़ा हिस्सा तीन तलाक को खत्म करने का पक्षधर रहा है। इस लिहाज से इस जंग को उदारवाद और कठमुल्लापन के बीच की लड़ाई भी कह सकते हैं। इसमें सबसे बड़ा धर्मसंकट अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की नीति पर चलनेवाले राजनीतिक दलों के समक्ष उत्पन्न हो गया है। वोटबैंक के लिहाज से पुरुषों और स्त्रियों के प्रतिशत में कुछ खास फर्क नहीं है। अब उन्हें यह देखना है कि कट्टरवादी पुरुषों के पक्ष में खड़े होने से ज्यादा राजनीतिक लाभ मिलेगा अथवा महिलाओं के पक्ष में खड़े होने पर। भले यह न्यायपालिका की पहल पर हुआ है लेकिन चूंकि कानूनी प्रतिबंध भाजपा के शासनकाल में लगा है और एकमात्र भाजपा ही तीन तलाक के मुद्दे पर महिलाओं के पक्ष में खड़ी रही है, इसलिए जाहिर है कि मुस्लिम महिलाओं का भाजपा की ओर झुकाव बढ़ेगा। अब विपक्षी दलों को अपनी अल्पसंख्यक नीति की समीक्षा करने और उसमें आवश्यक बदलाव लाने की आवश्यकता पड़ेगी।

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