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देवेंद्र गौतम
यूपी सरकार के चिकित्सा शिक्षा विभाग का दावा है कि गोरखपुर में बच्चों की मौत आक्सीजन की कमी के कारण नहीं हुई है। इस हादसे का कारण इन्सेफ्लाइट्स नामक बीमारी है जिसका हर साल अगस्त महीने में का प्रकोप होता है। जिसकी चपेट में ज्यादातर छोटे बच्चे आते हैं। सरकार का यह भी कहना है कि पिछले वर्षों की तुलना में इस वर्ष कम मौतें हुई हैं। लेकिन दूसरी तरफ विभाग ने सभी सरकारी मेडिकल कालेजों और चिकित्सा संस्थानों को निर्देश दिया है कि अपने यहां दवा और गैस की कमी न होने दें और आपूर्तिकर्ताओं का जो भी बकाया हो उसका तुरंत भुगतान करें।
जाहिर है कि गोरखपुर के उस सरकारी अस्पताल में कहीं न कहीं आपूर्तिकर्ता के भुगतान का मामला फंसा था और तंग आकर उसने आपूर्ति रोक दी थी। अस्पताल के स्टाक रजिस्टर की जांच करने पर पता चल जाएगा कि हादसे के दिन स्टाक में कितने सिलिंडर थे और उनमें से कितने को उपयोग में लाया गया था। जब चिकित्सा शिक्षा विभाग को पता है कि हर साल अगस्त महीने में इन्सेफ्लाइट्स का प्रकोप होता है तो इससे निपटने के लिए क्या तैयारी की गई थी इसका पता लगाया जाना चाहिए।
गैर सरकारी सूत्रों का कहना है कि बीआरडी मेडिकल कालेज अस्पताल में आक्सीजन आपूर्तिकर्ता कंपनी का 27 लाख से अधिक का बकाया हो चुका था और उसने आपूर्ति रोकने की चेतावनी दे रखी थी। अधिकारियों ने इस चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया। जबकि राज्य सरकार ने भुगतान की राशि स्वीकृत कर दी थी और पैसों की कोई समस्या नहीं थी। दरअसल बाबू संस्कृति के कारण फाइल दबी हुई थी। जानबूझकर भुगतान लंबित रखा गया था। जगजाहिर है कि सरकारी संस्थानों में ठेकेदारों और आपूर्तिकर्ताओं के भुगतान प्राय: कमीशनखोरी के चक्कर में रोके जाते हैं। यदि घटना की निष्पक्ष जांच हुई तो इस बात का खुलासा हो जाएगा कि भुगतान लंबित रखने और स्थिति को आपूर्ति बाधित होने तक पहुंचाने में किन लोगों का हाथ था। उन्हें तत्काल गिरफ्तार कर उनपर हत्या का मुकदमा चलाया जाना चाहिए। यह हादसा नहीं नरसंहार है। इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
आमतौर पर इस तरह की जानलेवा लापरवाही के बाद एक जांच कमेटी गठित कर दी जाती है और कुछेक अधिकारियों की बलि चढ़ा दी जाती है। लोगों का आक्रोश थम जाता है और मामला धीरे-धीरे ढंढा हो जाता है। इसके साथ ही सरकारी तंत्र अपनी तमाम विकृतियों के साथ पूर्ववत संचालित होने लगता है। सरकारें बदलती हैं लेकिन यह तंत्र कभी नहीं बदलता। कार्य संस्कृति नहीं बदलती। बाबुओं की लोलुपता बरकरार रहती है। इस घटना के बाद भी मेडिकल कालेज के प्राचार्य को निलंबित किया जा चुका है। योगी सरकार को चाहिए कि व्यक्ति की बलि चढ़ाने की जगह तंत्र के शुद्धीकरण को सुनिश्चित करें क्योंकि यदि तंत्र नहीं बदला, सरकारी विभागों की कार्य संस्कृति नहीं बदली तो थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद इस तरह की घटनाओं की पुनरावृति होती रहेगी।

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