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देवेंद्र गौतम
नई दिल्ली। इन दिनों एक लतीफा चर्चे में है। किसी शिक्षक ने छात्र से पूछा कि उसने मुझे धोखा दिया का अंग्रेजी अनुवाद करो। छात्र ने लिखा-ही नीतीश्ड मी। यानी नीतीश धोखे का पर्याय बनते जा रहे हैं। आबादी का एक हिस्सा हंसी-मजाक में सही बिहार की परिघटना को इसी रूप में देख रहा है। इस तरह नीतीश विभीषण और जयचंद की तरह धोखेबाजी का प्रतीक बनते जा रहे हैं। एक मिथ कायम करते जा रहे हैं।
निश्चित रूप से नीतीश को धोखेबाज मानने वाले भी लालू परिवार को निर्दोष नहीं मान रहे। उनकी धर्म निरपेक्षता और सांप्रदायिक शक्तियों के विरोध के ढोंग को भी समझ रहे हैं। उसे भ्रष्टाचार और घोटाले पर डाली जाने वाली चादर समझ रहे हैं। उधर बिहार में जाति अथवा अन्य कारणों से लालू के भक्तों की भी एक जमात है। लालू और तेजस्वी के नीतीश विरोधी बयानों पर भक्तों की सहमति जरूर दिख रही है। फिर भी इस सियासी नाटक के बाद नीतीश एक मिथकीय चरित्र तो बन ही चुके हैं। अभी जो बात हंसी-मजाक में कही जा रही है, कल को उसे एक उदाहरण के रूप में पेश किया जा सकता है।
दरअसल लालू ने राजनीति की ऐसी विसात बिछाई थी कि उससे अच्छे-अच्छों का बचकर निकल पाना कठिन था। लालू जानते थे कि यदि वे भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे तेजस्वी से इस्तीफा दिलवा भी दें तो इसे नैतिकता के आधार पर लिया गया निर्णय नहीं माना जाएगा। चारा घोटाला के जमाने में ही यह बात स्पष्ट हो चुकी थी कि उनके परिवार के शब्दकोश में नैतिकता या अपरोध बोध जैसा कोई शब्द है ही नहीं। जाहिर था कि इस्तीफा देने के बाद भी उसका राजनीतिक लाभ नहीं मिलता। लाभ तभी मिलता जब नीतीश तेजस्वी को बर्खास्त करते। इसके बाद उपमुख्यमंत्री की कुर्सी भी उनकी पार्टी राजद के पास रहती और उनके परिवार का ही कोई सदस्य उसपर बैठता। इधर तेजस्वी को सहानुभूति बटोरने का मौका भी मिलता और सत्ता की बागडोर भी हाथ में ही रहती। दरअसल भ्रष्टाचार के आरोपों से या उनके साबित होने से भी लालू परिवार को कोई फर्क नहीं पड़ता। लालू तो स्वयं सजायाफ्ता हैं और कई मामलों पर सुनवाई झेल रहे हैं। क्या फर्क पड़ता। तेजस्वी और अन्य परिजन भी झेल लेते। लेकिन लालू को जरा भी अंदाजा नहीं था कि नीतीश अचानक पाला बदलकर पूरी बाजी ही पलट देंगे।
नीतीश भी राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी हैं। वे लालू की चाल को समझ रहे थे। इस चाल की एकमात्र काट वही थी जो उन्होंने किया। इससे लालू बौखला गए। उन्होंने बाजी हाथ से निकलने के बाद जदयू को तोड़ने के लिए शरद यादव पर डोरे डालने शुरू किए। उनकी महत्वाकांक्षा को हवा दी। सेक्युलरिज्म की दुहाई दी। लेकिन थोड़ा भ्रमित होने के बाद शरद यादव समझ गए कि उन्हें महज मोहरा बनाया जा रहा है। उन्होंने लालू के तमाम दावों को खारिज कर जदयू के साथ अपनी प्रतिबद्धता दुहरा दी। राजनीति के बिसात पर नीतीश ने लालू को मात तो दे दी लेकिन साथ ही एक मिथक भी कायम कर गए जिससे छुटकारा माने में उन्हे वक्त लगेगा।

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