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अंशुमान त्रिपाठी
नई दिल्ली। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अचानक पाला बदलकर सबको चौंका दिया। जिस नरेंद्र मोदी को वे फूटी आंखों भी देखना पसंद नहीं करते थे, आज उन्हें अपराजेय घोषित करने में जरा भी संकोच नहीं कर रहे। महागठबंधन से एनडीए में जाने का तात्कालिक कारण भले ही लालू परिवार पर भ्रष्टाचार के आरोप और लालू पुत्रों का नैतिकता के आधार पर त्यागपत्र देने से इनकार रहा हो, लेकिन सच्चाई सिर्फ यही नहीं हो सकती। लालू चाहते थे कि नीतीश अपनी छवि बचाने के लिए तेजस्वी को मंंत्रिमंडल से बर्खास्त करें और वे इसे मुद्दा बनाकर उन्हें कटघरे में खड़ा करें। जनता की सहानुभूति बटोरें और बेटों की राजनीतिक जड़ें मजबूत करें।
उधर लालू को पता था कि नीतीश एक हत्याकांड के आरोपियों में शामिल हैं और चुनाव आयोग के समक्ष इसे स्वीकार भी कर चुके हैं। दोनों नेता एक दूसरे के रग़-रग़ से वाफिक थे। इसलिए अचानक संबंधों के टूटने का कोई कारण उत्पन्न नहीं हुआ था। यह जगजाहिर है कि लालू चारा घोटाले के एक मामले में सजायाफ्ता हैं। उनपर चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध है। इसके अलावा कई संबंधित मामलों की विभिन्न अदालतों में सुनवाई चल रही है। लालू की कार्यशैली कुछ इस तरह की रही है कि उनके लिए पैसा ही सर्वोपरि है। इसके लिए उन्हें किसी सीमा तक जाने से परहेज़ नहीं है। भ्रष्टाचार उनके लिए नेताओं के मौलिक अधिकार जैसा है। उनका वश चले तो इसे कानूनी आवरण में ढकने की मुकम्मल व्यवस्था कर दें। उनके परिजन भी उदंडता को ही अपना राजनीतिक अधिकार समझते हैं।
नीतीश ने लालू पुत्रों को जो विभाग दिए थे उनमें मनमाने ढंग से काम हो रहा था। तेज प्रताप इंद्रा गांधी मेमोरियल मेडिकल संस्थान के डाक्टरों, नर्सों और एंबुलेस को अपने क्वार्टर पर तैनात रखते थे। उपमुख्यमंत्री तेजस्वी भी अपने रुत्बे के लिए किसी सीमा तक जाने से परहेज़ नहीं करते थे। लालू तो पुत्रमोह में धृतराष्ट्र बन ही चुके थे। प्रशासनिक अधिकारियों को नीतीश काम करने की पूरी छूट देते हैं जबकि लालू परिवार के लोग ब्यूरोक्रैसी को पांव तले दबाकर रखने के आदी रहे हैं। तेजस्वी प्रकरण में नीतीश धर्मसंकट में फंसे थे। वे बार-बार चीजों को स्पष्ट करने अथवा इस्तीफा देने का इशारा कर रहे थे लेकिन उन्हें बर्खास्त करने की कार्रवाई नहीं कर रहे थे क्योंकि इसका मतलब वे जानते थे। यह राजद को अमृतपान कराने जैसा होता। इधर यह बात भी वे समझ चुके थे कि महागठबंधन में उन्हें पीएम पद का उम्मीदवार नहीं बनाया जाएगा। मोदी की बढ़ती ताकत को भी वे समझ रहे थे। वे भाजपा के साथ गठबंधन सरकार चला चुके थे और उसे अछूत नहीं मानते थे। भाजपा के साथ साझा सरकार चलाने के बावजूद उनकी धर्म निरपेक्ष छवि को कहीं से आंच नहीं आई थी। उनपर किसी तरह का कोई दबाव नहीं था। इस बीच उन्हें लालू के कुछ वरिष्ठ भाजपा नेताओं के संपर्क में होने की जानकारी मिली थी। उन्हें पता था कि लालू अपने परिवार के बचाव के लिए कोई भी षड़यंत्र रच सकते थे। संभव था कि समर्थन वापस लेकर सरकार गिरा देते और मध्यावधि चुनाव की आड़ में भ्रष्टाचार के मामलों पर चल रही कार्रवाई की गति धीमी कर देते। इधर नीतीश नोटबंदी के समय से ही मोदी की कार्यशैली के पक्षधर बने हुए थे। राष्ट्रपति चुनाव के समय भाजपा से उनके संबंध और बेहतर हुए। मोदी की साफ-सुथरी छवि  के वे कायल हो चुके थे। लिहाजा लालू की चाल को विफल करने के लिए उनके पास पाला बदलने के अलावा कोई चारा नहीं था। इससे उनकी साख भी बच गई और सरकार भी। अब लालू अपने कुनबे के साथ खिसियानी बिल्ली की तरह खंभा नोचने के अलावा कुछ नहीं कर सकते।    

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