0
प्रो.भीमसिंह
भारतीय नागरिकों पर अनुच्छेद-35ए जम्मू-कश्मीर में एक दोमुंही तलवार है, जिसको आज तक देश के बुद्धिजीवियों और राजनीतिज्ञों नोटिस में नहीं लाया गया। यह थी एक साजिश जम्मू-कश्मीर के लोगों के खिलाफ, जिसकी शुरूआत हुई 14 मई, 1954 को जब भारत के राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद, जिन्होंने एक अध्यादेश जारी करके अनुच्छेद-35 के साथ ह्यएह्य जोड़ दिया। भारतीय संविधान के अध्याय-3 में भारतीय नागरिकों को जो मानव अधिकार दिए गए हैं, वे जम्मू-कश्मीर में भी लागू हो सकते थे, लेकिन उन्हें अनुच्छेद-35ए के अनुसार जम्मू-कश्मीर में दबोच कर रख दिया गया और 14 मई, 1953 के बाद शेख मोहम्मद अब्दुल्ला पर कई प्रकार के मामले चलाकर जम्मू-कश्मीर की जनता को मानव अधिकारों से वंचित कर दिया गया। इसमें उन पर जुल्म ढाए गए जो जम्मू-कश्मीर में सत्य और न्याय का नारा देते थे क्योंकि कारण यह था कि जो मानव अधिकार पूरे भारत के नागरिकों को प्राप्त थे उन अधिकारों से जम्मू-कश्मीर के लोगों को वंचित कर दिया गया। अनुच्छेद 35(ए) के अध्यादेश के कारण केवल शेख मोहम्मद अब्दुल्ला को 12 साल की कैद नहीं झेलनी पड़ी, इससे हजारों जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक कार्यकर्ता प्रभावित हुए। मैं अपना उदाहरण दे रहा हूं कि लगभग साढ़े आठ साल जम्मू-कश्मीर की जेलों मे मुझे भी रहना पड़ा। जब मैं 1977 मे कांग्रेस का विधायक में बना तो लगभग साढ़े तीन साल जम्मू-कश्मीर के नेशनल कांफ्रेंस के बनाए हुए कानून यानी जनसुरक्षा कानून के तहत मुझे भी जेल में बगैर मुकदमे के जेल की सलाखों के पीछे रहना पड़ा। मैं कांग्रेस पार्टी का विधायक था और कांग्रेस पार्टी भी मेरे खिलाफ थी, क्योंकि मैंने आवाज उठाई थी जम्मू-कश्मीर के मजलूम बेरोजगार युवाओं और छात्रों की। पुंछ से लेकर किश्तवाड़ तक मैं और मेरे साथी जेल में बंद कर दिए गए और ये कहानी थी 1977 से 1982 तक जब शेख मोहम्मद अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री थे। कमाल तो यह है कि केवल 35 (ए) के तहत शेख मोहम्मद अब्दुल्ला को सलाखों के पीछे रखा गया, इसी कानून के तहत मैं और हजारों मेरे साथी जिनमें ज्यादातर छात्र शामिल थे, वे भी जेलों में बंद रहे।
शेख मोहम्मद अब्दुल्ला को 1975 में मुख्यमंत्री के ताज से नवाजा गया और उनके बेटे डा. फारूक अब्दुल्ला को बिलायत की नागरिकता प्राप्त प्राप्त कर चुके थे वापस जम्मू-कश्मीर बुलाया गया और शेख साहब के बाद 1982 में मुख्यत्रमंी भी बनाया गया। शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने उन्हीं के कुचलने वाले कानून को जम्मू-कश्मीर के उन लोगों के खिलाफ इस्तेमाल किया जो शेख मोहम्मद अब्दुल्ला का विरोध करते थे, जिसकी त्रासदी इस लेखक ने भी झेली है। कितने ही जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक कार्यकर्ता इस अत्याचार के दौर में इससे प्रभावित हुए। 1966 में जम्मू सांइसा कालेज में कांग्रेस की सरकार के दौरान चार छात्रों को कालेज परिसर में शहीद कर दिया गया जो रिपोर्ट मुखर्जी आयोग ने पेश की थी। ये कहानी सिर्फ जम्मू साइंस कालेज की नहीं थी, बल्कि जम्मू-कश्मीर के कई क्षेत्रों में लोगों को अधिकार व न्याय बंदूक की नोक पर ही मिलता था। यह था कमाल अनुच्छेद-35ए का और उसके साथ अनुच्छेद 370 का, जो एक अस्थायी कानून था और 63 वर्षों से लोगों के गले में तलवार बनकर लटका हुआ है। जम्मू, कश्मीर और लद्दाख के लोगों पर कितने अत्याचार किए गए, हजारों लोगों को जेलों में बंद कर दिया गया और हजारों युवा और छात्र सरकार की गोलियों से शहीद भी हुए। यह एक लंबी कहानी है जिसका जिक्र एक न एक दिन जम्मू-कश्मीर के इतिहास में जरूर होगा।
1982 में इस लेखक ने कांग्रेस पार्टी छोड़ दी और उसके विधायक पद से भी इस्तीफा दे दिया तथा उसी वर्ष 23 मार्च को जम्मू-कश्मीर नेशनल पैंथर्स पार्टी की स्थापना की, जिसका उद्देश्य था--जम्मू-कश्मीर के हर नागरिक के लिए अधिकार और न्याय, समता, समानता और शांति। इसके बदले में इस लेखक और उसके साथियों को कितने वर्षों जेल की सलाखों के पीछे रहना पड़ा।  50 बार तो सुप्रीम कोर्ट ने इस लेखक को राहत दी और 1984 में जब सरकार ने इसे विधानसभा में जाने की अनुमति नहीं दी और गिरफ्तार कर लिया तो सर्वोच्च न्यायालय की अधिवक्ता श्रीमती जय माला की याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने जम्मू-कश्मीर सरकार पर पचास हजार रुपये का जुमार्ना थोपा और जो मेरी गिरफ्तारी के लिए मुआवजा था।
यह एक वास्तविकता है कि जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह ने 26 अक्टूबर, 1947 को भारत संघ से विलयपत्र पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन इस विलयपत्र को भारतीय संसद ने आज तक अमलीजामा नहीं पहनाया। जबकि 577 रियासतों को भारत संघ में शामिल किया गया, जिनमें दो रियासतें हैदराबाद और जूनागढ़ भी शामिल हैं, जिन्होंने विलयपत्र पर हस्ताक्षर ही नहीं किए थे, जम्मू-कश्मीर को अलग रखा गया और जम्मू-कश्मीर का एकीकरण आज तक नहीं हो सका है। अनुच्छेद 370 को अस्थायी तौर पर भारतीय संविधान में जोड़ना जम्मू-कश्मीर के लोगों के साथ एक बहुत बड़ा धोखा है यानी 35(ए) एक गैरकानूनी कदम था और न ही राष्ट्रपति को भारतीय संविधान के तहत ऐसा कानून बनाने की अनुमति थी। राष्ट्रपति केवल अनुच्छेद 370 के तहत कार्रवाई कर सकते थे। दूसरी त्रासदी यह है कि अनुच्छेद 370 के खंड (3) में जिसके तहत राष्ट्रपति के बनाए हुए कानून के लिए जम्मू-कश्मीर संविधान सभा से अनुमति लेना आवश्यक था, लेकिन इस पर अमल नहीं किया गया और यह प्रावधान भी 26 जनवरी, 1957 को कानूनी दायरे से गायब हो चुका था, क्योंकि जम्मू-कश्मीर में उस दिन एक नया संविधान लागू किया गया था और संविधान सभा उसी दिन निष्फल हो गई।
यह एक ऐतिहासिक घटना है कि शेख मोहम्मद अब्दुल्ला को 20 अगस्त, 1952 को जम्मू-कश्मीर के सदर-ए-रियासत डा. कर्णसिंह ने पंडित जवाहरलाल नेहरू की सलाह पर सत्ता से हटाकर जेल में बंद कर दिया और बख्शी गुलाम मोहम्मद को जम्मू-कश्मीर का प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया। बख्शी गुलाम मोहम्मद के लिए कश्मीर के लोगों की आवाज को नियंत्रण में करना सम्भव नहीं था, उनके कहने पर पं. जवाहरलाल नेहरू ने भारत के राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद से 35(ए) लागू करवाया। कर दिए सब दरवाजे बंद उन हवाओं के जो हवाएं  भारतीय संविधान से मानवाधिकार लेकर आयी थीं यानी जम्मू-कश्मीर में कोई मानवाधिकार नहीं रहा और कानून के शासन की जगह स्थापित हुआ बंदूक का शासन।
शेख मोहम्मद अब्दुल्ला 1964 में जेल से रिहा हुए पं. जवाहरलाल नेहरू भी इस दुनिया से विदा हो गये। इंदिरा-शेख समझौता हुआ और शेख मोहम्मद अब्दुल्ला 1975 में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री मनोनीत हुए और जो कानूनी तलवार शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ृऔर उनके साथियों को कुचलने के लिए बनाई गई थी उसी तलवार का सहारा लेकर शुरूआत हुई शेख मोहम्मद अब्दुल्ला और उनके परिवार की सत्ता के साथ। 1975 में शेख मोहम्मद अब्दुल्ला फिर बने मुख्यमंत्री (प्रधानमंत्री नहीं) उनके साथ कई राजनीतिक समझौते जनता के नोटिस में आ गए और कई अभी भी राजनीतिक फाइलों के कब्रिस्तान में दबे हुए हैं दिल्ली और कश्मीर में। 26 जनवरी, 1957 को जम्मू-कश्मीर के संविधान को थोपा गया और यह कमाल था कि संविधान में मानव अधिकारों का नाम तक नहीं है और न ही ये आवाज कहीं से उठी। जम्मू-कश्मीर संविधान को श्रीनगर और दिल्ली में उछाला गया जैसे वह जम्मू-कश्मीर के लोगों की स्वतंत्रता का स्तंभ था। ये सब राजनीतिक वादे अनुच्छेद 370 में किए गए जो उस समय भी अस्थायी थे और आज भी अस्थायी हैं। इन दिनों डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जम्मू-कश्मीर में पंजाब से बिना परमिट के प्रवेश कर गए। जम्मू से साढ़े तीन सौ किमी की दूरी पर उन्हें श्रीनगर जेल में बंद कर दिया। दिल्ली में सरकार थी कांग्रेस और जम्मू-कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस के प्रधानमंत्री थे शेख मोहम्मद अब्दुल्ला। यह था माजरा 1953 का। जम्मू-कश्मीर का झंडा अलग, संविधान अलग और हाईकोर्ट अलग।
राष्ट्रपति सरकार को अनुच्छेद 370 (3) के तहत और ज्यादा शक्तियां दी गयीं कि वे 370 में दिए गए विशेष अधिकार जम्मू-कश्मीर सरकार से कभी भी ले सकते थे। यहां तक 370 (3) में एक प्रावधान (प्राइविजो) जोड़ दिया गया कि राष्ट्रपति 370 में कोई भी संशोधन कर सकते हैं। बशर्ते यह कि उन्हें जम्मू-कश्मीर संविधान सभा इसकी अनुमति दे दे। यह प्रावधान उस दिन ही समाप्त हो गया जिस दिन जम्मू-कश्मीर में यानी 26 जनवरी, 1957 में अपना संविधान लागू हुआ और आज के दिन इसका कोई भी सदस्य भी जिंदा नहीं है। इसलिए ये प्रावधान इसी दिन निष्फल हो गया जिस दिन जम्मू-कश्मीर में अपना संविधान लागू हुआ। आज के दिन राष्ट्रपति जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 में बिना मंत्रिमंडल की सिफारिश के संशोधन करने में सक्षम हैं और अनुच्छेद 370 की कमान के तहत कोई भी नोटफकेशन जारी कर सकते हैं। 370 लगभग 70 वषों से अस्थायी चल रही है और आज यह भारत की राष्ट्रीय एकता की मजबूती के लिए आवश्यक है। राष्ट्रपति अपने नोटिफिकेशन से कम से कम तीन विषयों, रक्षा, विदेश मामले, संचार इत्यादि के बारे में कोई भी कानून बनाने का अधिकार भारतीय संसद को दे सकते है और बाकी विषय के बारे में जम्मू-कश्मीर के लोगों की राय ली जा सकती है।

Post a Comment Blogger Disqus

 
Top