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नई दिल्ली। जेडीयू ने शनिवार को अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में प्रस्ताव पारित कर पार्टी को एनडीए में औपचारिक तौर पर शामिल कर लिया। वहीं शरद यादव ने पार्टी के बागी नेताओं के साथ अलग बैठक साफ कर दिया है कि वे नीतीश कुमार के फैसले के साथ नहीं हैं।
पटना में नीतीश और शरद यादव की अगुवाई में दो अलग बैठकें होने के बाद लगभग साफ हो गया है कि जनता परिवार एक बार फिर से टूटेगी। नीतीश कुमार और शरद यादव के हाल के बयानों पर गौर करें तो दोनों नेताओं ने बिना एक-दूसरे का नाम लिए जुबानी हमले किए हैं। जनता परिवार के इतिहास पर नजर डालें तो इनके नेता हमेशा जनता के बीच से उठे हैं, लेकिन निजी स्वार्थों के चलते या अहम की लड़ाई के नाम पर आपस में टूटते रहे हैं। गौर करें तो जनता परिवार एक-दो बार नहीं पूरे 11 बार पहले ही टूट चुकी है। अगर शरद यादव नई पार्टी बनाते हैं तो यह करीब 29 साल में 12वीं टूट होगी। 11 अक्टूबर 1988 को उत्तर प्रदेश के राजपरिवार से आने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जनता दल का गठन किया था। यह तीन पार्टियों जनता पार्टी, जनमोर्चा और लोकदल को मिलाकर बनाया गया था। उस वक्त जनता परिवार के बड़े चेहरों में उत्तर प्रदेश के चंद्रशेखर और हरियाणा के देवीलाल रहे। पीएम पद को लेकर शुरू हुआ झगड़ा: 1989 लोकसभा चुनाव में जनता परिवार को 142 सीटें आईं, जबकि कांग्रेस ने 195 सीटें हासिल की। जनता दल को दूसरे दलों का समर्थन मिलने के बाद सरकार बनाने का मौका मिला। जनता दल में प्रधानमंत्री पद के तीन दावेदार थे। वीपी सिंह ने चुनाव में पार्टी की अगुवाई की थी, वहीं देवीलाल और चंद्रशेखर जनता के बीच काफी लोकप्रिय नेता थे।
प्रधानमंत्री को चुनने के लिए जनता दल के सभी नेता संसद भवन के सेंट्रल हॉल में इक्ट्ठा हुए थे। पब्लिक परसेप्शन था कि वीपी सिंह पीएम चुने जाएंगे, लेकिन वहां कुछ और ही हुआ। बैठक में खुद वीपी सिंह ने पीएम पद के लिए देवीलाल का नाम प्रस्तावित कर दिया। चंद्रशेखर ने भी इसका समर्थन कर दिया। तभी देवीलाल खड़े हुए और वीपी सिंह को ही प्रधानमंत्री बनाए जाने की बात कह दी। चौधरी चरण सिंह के बेटे अजित सिंह ने भी वीपी सिंह का समर्थन कर दिया। इस तरह चंद्रशेखर के न चाहते हुए भी वीपी सिंह जनता दल की ओर से प्रधानमंत्री बने।

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