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सत्यनारायण मिश्र
गुवाहाटी।  मुख्यमंत्री सवार्नंद सोनोवाल के बयान और तदनुरूप सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रतीक हाजेला की परिवर्तित रिपोर्ट पर अदालत के आदेश के बाद ड्राफ्ट एनआरसी प्रकाशन पहले से टेढ़ी खीर होती नजर आ रही है। पिछले डेढ़ साल से ठप-सी पड़ी और आर्थिक संकटों से जूझती यह प्रक्रिया महज पांच माह में कैसे पूरी हो जाएगी, सवा तीन करोड़ असम वासियों के अस्तित्व से जुड़ा अहम सवाल है।
अदालत ने कह दिया है- जैसा हो वैसा रहने दें, राज्य संयोजक के बयान अनुसार हम अब यह समझ रहे हैं कि ड्राफ्ट एनआरसी प्रकाशन की तिथि 31 दिसंबर 2017 है। अदालत ने ताकीद की है कि तदनुसार संबंधित रिपोर्ट में वर्णित तमाम बजटीय संशोधन स्वीकृत और लागू होने के साथ वांछित कोष उपलब्ध हो जाना चाहिए। ताकि 31 दिसंबर 2017 या उसके पहले ड्राफ्ट एनआरसी प्रक्रिया पूरी हो जाए।
राज्य में नई सरकार आने के बाद पिछले तकरीबन डेढ़ साल से समस्या यहीं तो जटिल होती रही है। इस दौरान ना जाने कितनी बार धनाभाव के कारण एनआरसी राज्य संयोजक कार्यालय दिशाहारा स्थिति में नजर आया है। देश की सबसे बड़ी अदालत की सीधी निगरानी में होने वाली राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षा से भी काफी हद तक जुड़ी एनआरसी अद्यतन प्रक्रिया, केंद्र से जरूरी धन नहीं उपलब्ध हो पाने के कारण, एक तरह से ठंडे बस्ते में पड़ी है।
इस बीच काफी कुछ मीडिया के माध्यम से सामने आ चुका है। इसलिए पिष्टपेषण की आवश्यकता नहीं है। राज्य सरकार की भी अपनी सीमाएं हैं। इनकार नहीं किया जा सकता। आफ द रिकार्ड वातार्ओं के अनुसार केंद्र से समय पर धन नहीं मिल पा रहा। मुख्यमंत्री से लेकर वर्तमान राज्य सरकार के लगभग सभी मंत्री आदि ऐतिहासिक असम आंदोलन से जुड़े रहे हैं। विदेशी मुक्त असम उस अतुलनीय आंदोलन का मूलाधार रहा है। 858 शहीद हो गए।
उस असम आंदोलन का एक युवा इस समय मुख्यमंत्री है। मगर कितना बेचारा-सा है। विदेशी पहचान के सबसे प्रभावी तंत्र एनआरसी अद्यतन को जल्द से जल्द कराने को ले कोई स्वतंत्र बयान भी नहीं दे सकता।
एनआरसी प्रक्रिया को पूरी निष्पक्षता से संपन्न कराने में सक्रिय सुप्रीम कोर्ट ने राज्य एनआरसी संयोजक को आदेशित किया है कि इस प्रक्रिया में अन्य किसी प्राधिकार (रियों) की ओर से होने वाले हस्तक्षेप सहित किसी भी तरह की परेशानी की जानकारी अदालत को समुचित आदेश के लिए संसूचित की जाए। दिसपुर सत्ता गलियारे में इसे मुख्यमंत्री के बयान से जोड़ कर देखा जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल 8 मार्च और फिर 20 अप्रैल के अपने पूर्व आदेशों का भी हवाला दिया है। अदालत को उम्मीद थी कि पश्चिमी फ्रंट की सीमा-बंदी की निगरानी करने वाली पूर्व गृह सचिव मधुकर गुप्त की अध्यक्षता में गठित कमेटी भारत-बांग्लादेश सीमा के मामले को भी देखेगी। हालांकि मधुकर गुप्त ने निजी कारणों का हवाला देते हुए अपनी अनुपलब्धता जता दी थी। अदालत ने इसके बाद नई कमेटी गठित करने के लिए सालिसिटर जनरल और सभी प्रतिस्पर्द्धी पार्टियों से नामों के सुझाव मांगे हैं।
आगामी 21 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ के सामने ये सुझाव विवेचित होंगे। तदनुरूप गठित कमेटी को अंतिम रूप दिया जाएगा। उसी दिन विचार पीठ कमेटी की भूमिका के बारे में अगला आदेश पारित करेगी।
न्यायमूर्ति रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति रोहिंटन फाली नरीमन की पीठ ने यह भी साफ किया है कि कमेटी की रिपोर्ट पेश होने के बाद मामला खुली अदालत में सूचीबद्ध किया जाएगा। आदेश में साफ कर दिया गया है कि सभी आवेदन लागू होने के लिए संविधान पीठ के समक्ष पेश किए जाएंगे। मामला कितना संवेदनशील इसे इससे इसे भी समझा जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट के संबंधित ताजा आदेश में तकरीबन 168 पक्षकार हैं।

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