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अंशुमान त्रिपाठी
भ्रष्टाचार, धर्म निरपेक्षता और जातिवाद का भारतीय राजनीति में इस कदर घालमेल हो चुका है कि आम आदमी भ्रमित हो जा रहा है। लालू प्रसाद के परिवार के खिलाफ सीबीआई की कार्रवाई को भी राजनीतिक रंग देने की कोशिश की जा रही है। कांग्रेस लालू प्रसाद के पक्ष में खुलकर सामने आ गई है। राजद इस मामले को लेकर बड़ी रैली निकालने की घोषणा कर चुकी है। सवाल यह है कि यह रैली भाजपा के खिलाफ होगी या ईडी और सीबीआई के खिलाफ? भ्रष्टाचार के इस मामले को राजनीतिक  मुद्दा बनाने की कोशिश की जा रही है। कारण यह है कि तेजस्वी यादव को तत्काल उप मुख्यमंत्री के पद से हटना पड़ सकता है। लालू प्रसाद सत्ता को हाथ से निकलते नहीं देख सकते। चारा घोटाले के उजागर होने के बाद जब उनके जेल जाने की नौबत आई थी तो उन्होंने बड़े सहज भाव से पूछा था कि भारतीय संविधान में कहां लिखा है कि जेल से सरकार नहीं चलाई जा सकती। जब उनके इस तर्क को नहीं माना गया और इस्तीफा देने की विवशता आई तो उन्होंने राजद के सक्षम नेताओं के मौजूद होने के बावजूद अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठा दिया ताकि सत्ता की कमान उनके परिवार के पास ही रहे। अभी उनपर चुनाव लड़ने पर कानूनी प्रतिबंध है। लेकिन अपने दो बेटों को नीतीश मंत्रिमंडल में प्रमुख पद दिलाने और बेटी को लोकसभा सदस्य बनवाने में सफलता मिली है। अभी जो घटनाक्रम चल रहा है उसमें सत्ता उनके परिवार के हाथ से बाहर जा सकती है। बौखलाहट का यही बड़ा कारण है। नीतीश के समक्ष धर्म संकट है। अगर वे लालू पुत्रों को कैबिनेट से बाहर करते हैं तो लालू के साथ रंजिश बढ़ेगी और कोई कार्रवाई नहीं करते तो उनकी अपनी छवि दागदार होगी। लालू सीबीआई की पूरी कार्रवाई को नरेंद्र मोदी और अमित शाह की बदले की कार्रवाई बता रहे हैं। सीधी सी बात है कि अगर कोई घोटाला नहीं हुआ है। लालू परिवार के सदस्यों का उसमें कोई हाथ नहीं है तो फिर तिलमिलाहट किस बात की। जांच होने दीजिए। कोर्ट में अपने पक्ष में साक्ष्य रखिए। दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा। लालू कोई इतनी छोटी और कमजोर हस्ती तो नहीं कि कोई अकारण उनसे उलझने की हिमाकत करेगा। जहां तक सीबीआई का सवाल है यूपीए शासनकाल में उसके दुरुपयोग के आरोप लगे हैं, लेकिन मोदी सरकार भी इस एजेंसी का उसी तरह इस्तेमाल कर रही जैसे कांग्रेस करती आई है, ऐसा आरोप अभी तक नहीं लगा है। दूसरी बात यह कि सीबीआई बिना किसी साक्ष्य के किसी बड़ी राजनीतिक हस्ती पर सिर्फ किसी के कहने पर तो हाथ नहीं डाल सकती है। लिहाजा जातिवाद, धर्म निरपेक्षता जैसी राजनीतिक शब्दावलियों का इस्तेमाल करने की जगह ठोस साक्ष्यों के आधार पर अपनी बात रखनी चाहिए।  

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