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कैंब्रिज यूनिवर्सिटी की मोलिक्यूलर बायोलोजी प्रयोगशाला में मानव की चमड़ी से मानव का मस्तिष्क बनाने की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। यहां मस्तिष्क का विकास गर्भ में पल रहे भ्रूण की तरह किया जा रहा है।
फर्क मात्र इतना है कि मां के पेट में मस्तिष्क का विकास खून की आपूर्ति से होता है। मां जो पोषक तत्व लेती है वही बच्चे को मिलते हैं। वहीं, इस प्रयोगशाला में जिस मस्तिष्क को बनाया जा रहा है, उसे जरूरी चीजें दूसरी शक़्ल में मुहैया कराई जा रही हैं। इस बात का विशेष ध्यान जा रहा है कि परखनली में उपज रहे मस्तिष्क को इन्फेक्शन न हो जाए। इसीलिए जिस माहौल में विकसित होते नन्हे मस्तिष्क रखे जाते हैं, उस पर खास निगरानी होती है। जिस चीज में इन नन्हे मस्तिष्कों को रखा जाता है, पहले उसे अल्कोहल से साफ किया जाता है, ताकि कोई इन्फेक्शन न हो।
प्रयोगशाला में तैयार किए जा रहे मस्तिष्क देखने में ज्यादा आकर्षक नहीं हैं। क्योंकि अभी वो पूरी तरह से विकसित नहीं हुए हैं। हल्के पीले और गुलाबी रंग के लिक्विड में पानी के बुलबुले जैसी कोई चीज तैरती दिखती है। लेकिन ये बिल्कुल ऐसे ही विकसित हो रहे होते हैं जैसे किसी भी मानव का मस्तिष्क मां के गर्भ में विकसित होता है।
जिस तरह मानव के मस्तिष्क के अलग अलग हिस्से होते हैं, उसी तरह प्रयोगशाला में विकसित हो रहे इस मस्तिष्क के भी कई हिस्से हैं। जैसे इसमें जो सुरमई हिस्सा है वो न्यूरॉन्स से बना है। और जहां आपको थोड़े मोटे टिशू नजर आंगे वहां उसकी एक छोटी सी दुम विकसित हो रही है। इसका सीधा ताल्लुक रीढ़ की हड्डी से है। दरअसल मानव के मस्तिष्क में ये वो हिस्सा होता है जहां भाषा को समझने की विशेषता होती है। और सोचने की प्रक्रिया मस्तिष्क के इसी हिस्से में होती है।
दूसरा हिस्सा है हिप्पोकैंपस। ये मस्तिष्क का वो हिस्सा है जो स्मृति और भावनाओं को नियंत्रण करता है। ये सभी हिस्से प्रयोगशाला में विकसित हो रहे इस मस्तिष्क में भी हैं। पूरी तरह से तैयार होने पर ये बिल्कुल ऐसे ही लगेगा जैसे एक नौ महीने के बच्चे का मस्तिष्क लगता है।
मानव मस्तिष्कों की ये खेती कैसे की जा रही है?
प्रश्न ये है कि आखिर मानव मस्तिष्कों की ये खेती कैसे की जा रही है? विशेषज्ञों का कहना है कि प्रयोगशाला में मस्तिष्क बनाना कोई इतना कठिन कार्य नहीं, जितना देखने, सुनने में लगता है।
सबसे पहले उसके लिए कुछ कोशिकाओं की आवश्यकता है। कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में इन मस्तिष्कों को तैयार करने वाली टीम की प्रमुख हैं मैडेलीन लैंकेस्टर।
लैंकेस्टर का कहना है इस काम के लिए नाक, जिगर, पैर के नाखून की कोशिकाएं ली जा सकती हैं। हालांकि उनमें से स्टेम कोशिकाओं को अलग करना होगा। क्योंकि इन्हीं से मानव के बदन के बाकी अंग विकसित किए जा सकते हैं।
आप प्रयोगशाला में परखनली में पल रहे मस्तिष्कों को देखेंगे तो आपको एक कोमा के साइज का सफेद डॉट नजर आएगा।
ये बिल्कुल ऐसा ही है जैसा एक भ्रूण का मस्तिष्क होता है। आपने जिस स्टेम कोशिकाओं का इस्तेमाल मस्तिष्क विकसित करने में किया है। वो कुछ दिनों तक पोषक तत्व दिए जाने पर छोटी गेंदों जैसे दिखने लगते हैं। इन्हीं के बीच मस्तिष्क कोशिका या वो कोशिकाएं होती हैं जो आगे चलकर मस्तिष्क के तौर पर विकसित होंगी।
अगला पड़ाव होगा कि बाकी कोशिकाओं को खत्म करके, सिर्फ़ मस्तिष्क बनाने वाली कोशिकाओं को बचाया जाए। इसके लिए वैज्ञानिक इस गेंद जैसी चीज को खाना-पीना देना बंद कर देते हैं। इससे ज्यादातर कोशिकाएं मर जाती हैं। मगर जिन कोशिकाओं से मस्तिष्क बनना होता है, उनमें संकट झेलने की शक्ति अधिक होती है। इसलिए वो बच जाती हैं। फिर इन्हें अलग करके दूसरी डिश में रखा जाता है।
ं१३्रा्रू्रं’ु१ं्रल्ल5प्रोफेसर मैडलीन लैंकेस्टर कहती हैं इन शिशु मस्तिष्क को विकसित करने वाली टीम एक फिक्रमंद माता पिता की तरह ही इनकी देखभाल करती है। जब एक खास स्तर तक ये ब्रेन कोशिकाओं विकसित हो जाते हैं तो उन्हें एक जेली जैसे द्रव में डाल दिया जाता है। जो इस शिशु मस्तिष्क के चारों तरफ सुरक्षा घेरा बना लेती है। इसके बाद इस मस्तिष्क को जरूरी पोषक चीजें दी जाती हैं। करीब तीन महीने में ये शिशु मस्तिष्क तैयार हो जाते हैं। तीन महीनों में ये मस्तिष्क करीब चार मिलीमीटर को हो जाता है और इसमें करीब बीस लाख तंत्रिकाएं होती हैं। आम तौर पर एक चूहे के मस्तिष्क में इतने ही न्यूरॉन होते हैं।
लैंकेस्टर अपने काम को बहुत बड़ी सफलता नहीं मानती हैं।
वो कहती हैं कि ऐसे शिशु मस्तिष्क से हम आम मानव के मस्तिष्क जैसा काम नहीं ले सकते। क्योंकि ये सोचने की क्षमता नहीं रखता है। हालांकि इससे हमें ये समझने में मदद मिलती है कि हमारा मस्तिष्क काम कैसे करता है।
प्रोफेसर मैडलीन लैंकेस्टर कहती हैं प्रयोगशाला में एक पूरी तरह विकसित मस्तिष्क बनाना उनका मकसद नहीं है। बल्कि इस खोज के जरिए वो मानव और बाकी जानवरों के मस्तिष्क के काम की तुलना करना चाहती हैं। असल में एक चिंपैंजी और मानव के मस्तिष्क में जो जेनेटिक फर्क़ है वो बेहद कम है। फिर भी चिंपैंजी और मानव के विकास में एक बहुत बड़ा फासला हो गया है।
इसे समझने के लिए मैडलीन और उनकी टीम ने मानव और चिंपैंजी के जीन से नया मस्तिष्क विकसित किया। इस अनुभव में पाया गया कि चिंपैंजी के जीन वाले हिस्से में जो तंत्रिकाएं विकसित हुईं वो मानव जीन से बनी कोशिकाओं के मुकाबले काफी कमजोर थीं।
वैसे, प्रयोगशाला में बनाए जा रहे इस कृत्रिम मस्तिष्क से हमें आॅटिज्म और शिजोफ्रेनिया जैसी बीमारियों से निपटने में मदद मिल सकती है। पिछले साल ही वैज्ञानिक ये पता लगाने में कामयाब रहे कि आॅटिज्म की असल वजह मस्तिष्क में दो तरह के न्यूरोन में ठीक तालमेल नहीं होना है। इस रिसर्च के बाद ही वैज्ञानिक ये भी जान पाए कि जब भ्रूण का मस्तिष्क विकसित हो रहा हो तभी ये बीमारी पकड़ी जा सकती है।
लैंकेस्टर कहती हैं प्रयोगशाला में मस्तिष्क विकसित करने के बाद मानव के मस्तिष्क को समझने की वैज्ञानिकों की समझ बढ़ी है। और इस दिशा में तेजी से काम आगे बढ़ रहा है।
वैज्ञानिकों का मकसद अब प्रयोगशाला में बड़े आकार का मस्तिष्क विकसित करना है। जिससे इन मस्तिष्कों को प्रयोगशाला में उसी तरह काट-पीटकर समझा जा सके, जैसे वैज्ञानिक चूहों के मस्तिष्क के साथ करते हैं।

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