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देवेंद्र गौतम
नई दिल्ली। अपने बेटों को बिहार की राजनीति में स्थापित करने का एक बड़ा मौका लालू प्रसाद चूक गए। अगर उन्होंने नैतिकता के आधार पर तेजस्वी और तेजप्रताप का इस्तीफा दिलवा दिया होता तो उनका राजनीतिक कद किस ऊंचाई तक पहुंच जाता लालू प्रसाद इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। इससे महागठबंधन भी बच जाता और भ्रष्टाचार के आरोपों की झड़ी भी कुछ समय के लिए थम जाती। राजद, लालू और उनके पुत्रों की तरफ से इस्तीफा देने से इनकार के जो तर्क पेश किए गए वे बेहद बचकाने और हास्यास्पद रहे। नीतीश ने इस्तीफा नहीं मांगा तो क्यों देता, कहने का कोई तुक नहीं हैं। राजनीति के कुछ मूल्य होते हैं, कुछ मर्यादाएं होती हैं। लालू ने स्वयं कभी इनका पालन नहीं किया। यदि अपने पुत्रों से इनका मान रखवा देते तो उनकी छवि वही बनती जो उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की बनी है। चुनावी जीत-हार अलग चीज है और अपनी छवि अलग चीज। सत्ता आती जाती रहती है। आज उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार नहीं है लेकिन अखिलेश की छवि सपा की पारंपरिक छवि से अलग तो दिखती है। दो पीढ़ियों की सोच का अंतर तो दिखता है। जो लोग मुलायम सिंह यादव और शिवपाल की राजनीतिक शैली को पसंद नहीं करते वे भी अखिलेश के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं। लालू बिहार के लोगों को यह दिखला सकते थे कि राजद की पुरानी और नई पीढ़ी में अंतर है। लेकिन राजनीति का यह संदेश देने की जगह उन्होंने येन-केन-प्रकारेण हासिल की हुई संपत्ति पर कुंडली मारकर बैठे रहना बेहतर समझा। बेटी मीसा तो शुरुआती अकड़ के बाद शांति से जांच कार्रवाई का सामना कर रही है लेकिन उनके दोनों मंत्री पुत्रों ने अनाप-शनाप बयान देकर यह साबित कर दिया कि उन्हें राजनीति की बुनियादी समझ भी नहीं है। वे पिता की उंगलियां पकड़कर सत्ता के गलियारे में टहल सकते हैं लेकिन अपनी कोई अलग हैसियत नहीं बना सकते। लालू ने जिस जमाने में राजनीतिक शुचिता की धज्जियां उड़ाईं वह समय गुजर चुका है। अब उस तरह के अक्खड़पन के लिए राजनीति में कोई जगह नहीं बची है। लालू प्रसाद इस बात को समझ नहीं पाए। उनके पुत्रों में इसे समझने का माद्दा ही नहीं है।

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