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अंशुमान त्रिपाठी
नई दिल्ली। रामनाथ कोविंद यूपी की पृष्ठभूमि के पहले राष्ट्रपति हैं। उन्हें दलीय भावनाओं से ऊपर उठकर जिस तरह व्यापक समर्थन मिला वह ऐतिहासिक है। उनकी जीत के बाद पूरे देश में जश्न का माहौल रहा लेकिन उत्तर प्रदेश और खासतौर पर उनके गांव के लोगों को सर गर्व से ऊंचा हो गया। उन्होंने गरीबी देखी है और जीवन में संघर्ष के जरिए कामयाबी हासिल की है। वे इस बात की मिलाल हैं कि सफलता के लिए चांदी का चम्मच मुंह में लेकर जन्म लेना जरूरी नहीं होता। वे इंडिया के नहीं भारत के नागरिक रहे हैं। आम जन-जीवन को उन्होंने करीब से देखा है। जीवन का संघर्ष क्या होता है, उनसे बेहतर कोई नहीं जानता। दलित परिवार से आए होने के नाते उन्होंने सामाजिक विषमता को महसूस किया होगा। उनकी छवि साफ सुथरी रही है। उनके बिहार का राज्यपाल होने पर भी उनके परिजन कड़ी मेहनत के जरिए जीवन यापन करते रहे। इस मामले में उनका रुख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समान रहा है। ऊंचे पद पर जाने के बाद उन्होंने अपने परिजनों को लाभ पहुंचाने के बारे में कभी नहीं सोचा। एक तरफ देश में लालू प्रसाद, मुलायम सिंह यादव जैसे नेता हैं जो अपने कुनबे के फलने-फूलने के लिए मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ जाते हैं। बेशर्मी की राजनीति के नए कीर्तिमान गढ़ते हैं। आरोप लगने पर नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देने की परंपरा पर विश्वास नहीं करते बल्कि राजनीतिक विरोध की आड़ के बचाव के रास्ते तलाशते हैं। परिवारवाद को बढ़ावा देते हैं। मायावती जैसी नेत्री जो माया को ही अपना ईश्वर मानती है। दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी और रामनाथ कोविंद जैसे नेता जो राजनीति शुचिता के नए मापदंड प्रस्तुत कर रहे हैं। संसदीय राजनीति के आदर्श मूल्य गढ़ रहे हैं। उनकी पृष्ठभूमि से वाकिफ लोगों के मन में उनके प्रति स्वाभाविक रूप से श्रद्धा उपजती है। यही कारण है कि एनडीए के उम्मीदवार के रूप में उनकी घोषणा के साथ ही उन्हें पूरे देश में समर्थन मिलना शुरू हो गया। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तो उनका नाम आते ही समर्थन देने का ऐलान कर दिया। उस समय तक महागठबंधन का राष्ट्रपति चुनाव में हिस्सा लेना भी तय नहीं था। बाद में जब महागठबंधन के उम्मीदवार के रूप में मीरा कुमार के नाम की घोषणा हुई तो भी वे अपनी बात से डिगे नहीं। भले ही इसके लिए उन्हें आलोचना का शिकार भी होना पड़ा। चुनाव का नतीजा तो पहले से ही ज्ञात था सिर्फ हार और जीत के बीच का फासला तय होना था। श्री कोविंद का राष्ट्रपति बनना आजाद भारत के लिए एक एतिहासिक घटना है। ररबन मीडिया जीत पर उन्हें बधाई देता है और उनके कार्यकाल को स्वर्णिम कार्यकाल होने की उम्मीद करता है।

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