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लालू प्रसाद शगूफे छोड़ने में माहिर हैं। अभी वे 2019 के चुनाव में भाजपा को परास्त करने का फार्मूला तलाश रहे हैं। उनका मानना है कि मायावती , अखिलेश, केजरीवाल, ममता, प्रियंका और राबर्ट बाड्रा साथ मिलकर चुनाव लड़ें तो भाजपा को शिकस्त दी जा सकती है। उन्होंने राहुल गांधी और नीतीश का नाम लेने की जरूरत नहीं समझी। जाहिर है कि उन्होंने प्रतिभा नहीं अपनी पसंद के आधार पर नाम गिनवाए। लालू प्रसाद संभवत: भूल गए कि 2019 का चुनाव बिहार की तर्ज पर नहीं होने वाला। उन्होंने जो नाम गिनाए उनमें अधिकांश भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हैं। उन्हें राहुल में नेतृत्व के गुण नहीं दिखते जबकि राबर्ट बाड्रा में संभावनाएं दिखती हैं। बाड्रा का राजनीति से कुछ लेना-देना नहीं रहा है। उनकी एकमात्र खूबी यही है कि वे नेहरू-गांधी परिवार के दामाद हैं और कुछ जमीन घोटालों को लेकर चर्चे में हैं। प्रियंका गांधी की छवि पर वे एक ग्रहण की तरह हैं। उनके कारण ही प्रियंका राजनीति में खुलकर नहीं आ पातीं। प्रियंका जानती हैं कि भारत के लोग जहां उनके अंदर इंदिरा गांधी की झलक देखते हैं, वहीं बाड्रा की छाया भी उनके तेज़ को धूमिल करती दिखाई देती है।
यह सही है कि मोदी सरकार विदेश नीति के मामले में जितनी प्रखर दिखाई देती है, घरेलू मोर्चे पर उसके ठीक विपरीत स्थिति दिखती है। शासन प्रणाली को सुधारने के जो प्रयास उनकी सरकार कर रही है, उससे आम जनजीवन में उथल-पुथल मच चुकी है। घरेलू मोर्चे पर लोग मोदी सरकार के नए-नए नियमों से परेशानी महसूस कर रहे हैं। मध्यम और निम्न वर्ग का जीना मुहाल हो गया है। लेकिन लोग यह भी महसूस कर रहे हैं कि यह सरकार जो कुछ भी कर रही है, देश के भले के लिए कर रही है। इसमें उसका अपना कोई निहित स्वार्थ नहीं है। दूसरी बात यह कि अभी तक मोदी सरकार के किसी मंत्री पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा है। ऐसा नहीं कि महागठबंधन में साफ सुथरी छवि वाले नेता नहीं हैं। लेकिन उनमें से अधिकांश का राजनीतिक कद नरेंद्र मोदी को घुटने तक भी नहीं पहुंचता। विपक्ष के कुछ साफ सुथरी छवि वाले नेता मोदी के मुकाबले कुछ हद तक मैदान में खड़े भी रह सकते हैं तो वे लालू के पसंदीदा नहीं हैं। उनका वश चले तो वे अपने होनहार पुत्रों की अगुवाई में भाजपा का मुकाबला करने पर विचार करें। व्यावहारिकता से तो उनका कुछ लेना-देना नहीं है। दरअसल जातीय और राजनीतिक समीकरण के जोड़-घटाव के जरिए भाजपा का मुकाबला करने की सोच मुंगेरीलाल के हसीन सपने जैसा है। सत्तापक्ष को पटकनी देने पर विचार करना, उसके उपाय ढूंढना विपक्ष का राजनीतिक धर्म है। लेकिन कोई भी योजना ठोस सच्चाइयों को ध्यान में रखकर बने तभी सफलीभूत हो सकती है। आज का मतदाता 1990 का मतदाता नहीं है कि मंडल-कमंडल में उलझकर अपने वोट जाया करे। 2019 के भारतीय मानस को पढ़ने की जरूरत है। मोदी को कोई नया चेहरा ही परास्त कर सकता है। जनता जिन चेहरों को आजमा चुकी है और छली जा चुकी है, उन्ही के हाथ में सत्ता की बागडोर सौंपने की भूल शायद ही करे।
-देवेंद्र गौतम

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