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अभी तक बंदर अथवा वनमानुष को मानव जाति का पूर्वज माना जाता था। लेकिन दक्षिण अफ्रीका में वैज्ञानिकों ने कुछ समय पूर्व गुफाओं में बनी कब्रों में मानव जैसी नई प्रजाति खोजने में सफलता पाई है। वैज्ञानिकों ने 15 आंशिक कंकाल पाए हैं, जिसे में इस तरह की अब तक की सबसे बड़ी खोज माना जा रहा है। शोधकर्ताओं का दावा है कि ये खोज हमारे पूर्वजों के बारे में अब तक की हमारी सोच को ही बदल देगी। ये 15 आंशिक कंकाल अलग-अलग उम्र के पुरुष, महिला, बुजुर्ग और शिशुओं के हैं। ये अध्ययन एक विदेशी जनरल में छपा था। इस प्रजाति का नाम नलेदी बताया गया और इनका वर्गीकरण, होमो समूह में किया गया है। मानव इसी समूह में वर्गीकृत किए जाते हैं। हालांकि इस प्रजाति की खोज करने वाले शोधकर्ता अभी तक इस बात का पता नहीं लगा पाए हैं कि ये प्रजाति कितने समय तक जीवित रही। इस शोध का नेतृत्व करने वाले प्रोफेसर ली बर्जर का मानना है कि ये मानव के पूर्वज हो सकते हैं और संभवत: ये अफ्रीका मे 30 लाख साल पहले तक रहे हों। प्रोफेसर बर्जर का कहना है कि नलेदी को दो पांव पर चलने वाले प्राचीन नरवानर और मानव के बीच एक पुल के तौर पर देखा जा सकता है। प्रोफेसर बर्जर के अनुसार वो वहां गए तो उन्हें उम्मीद थी कि एक जीवाश्म मिल सकता है, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें वहां कई जीवाश्म मिले और आखिर में उन्हें ढेर सारे कंकाल मिल गए। उनके अनुसार 21 दिनों के अनुभव के अंत में उन्हें सबसे बड़ा मानव जीवश्म मिला जिसे अफ्रीकी महाद्वीप के इतिहास में सबसे बड़ी खोज माना जा रहा है। नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम के प्रोफेसर क्रिस स्टिंगर का कहना है कि नलेदी एक महत्वपूर्ण खोज है। प्रोफेसर बर्जर के अनुसार, हम प्रजाति के बारे में सबकुछ जान पाएंगे। हम ये जानेंगे कि बच्चों का कब जन्म हुआ, उनका विकास कैसे हुआ, किस गति से उनका विकास हुआ और शिशु के पैदा होने के बाद किसी पुरुष और महिला के बीच हर स्तर पर कैसे विकास हुआ। जोहानिसबर्ग से 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित राइजिंग स्टार गुफा में ये हड्डियां पाई गईं। खोजकतार्ओं ने हड्डियों के 1,500 से अधिक टुकड़े पाए, जो कम से कम 15 लोगों के हैं। ये अवशेष शिशुओं, किशोरों व एक बेहद बुजुर्ग के हैं। गुफा में अभी भी हड्डियों के एक हजार टुकड़े मौजूद हैं, जो धूल से ढके हैं। नैशनल जियोग्राफिक द्वारा वित्त पोषित परियोजना के कर्मियों का मानना है कि ये अवशेष प्राचीन मानव की नई प्रजातियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इंसान की तुलना में उंगलियां छोटी और टेढ़ी हैं। उन्होंने इनका नाम होमो नालेदी रखा है, जिसमें नालेदी का मतलब तारा होता है और यह दक्षिण अफ्रीका की स्थानीय भाषा का एक शब्द है।
शोधकतार्ओं का मानना है कि यह मानव प्रजाति जिसे नलेदी कहा जा रहा है अपने मृतको को दफनाती थी। इससे पहले यह माना जाता था कि यह व्यवहार केवल मानवो मे ही था। शोधकर्ता इस निष्कर्ष पर एक गुफा मे एक साथ पाये गये नवजात, बच्चो, युवा और बुढे व्यक्तियों के कंकालो के आधार पर पहुंचे है। यह गुफा जमीन की सतह के तीस मीटर नीचे पायी गयी है। शायद होमो नालेदी इस गुफा मे प्रकाश के लिये आग का प्रयोग करता रहा होगा। इन जीवश्मो पर किसी नरभक्षी प्राणी के हमले के कोई निशान नही है, जिससे कीसी नरभक्षी प्राणी द्वारा इन अवशेषो को गुफा मे लाये जाने की संभावना समाप्त हो जाती है। इस गुफा मे ये कंकाल इन व्यक्तियों की मृत्यु के पश्चात दफनाने की वजह से ही आ सकते है। इस गुफा मे इन कंकालो का एक साथ पाये जाने का कोई और कारण शोधकर्ता को दिखायी नही दे रहा है।
होमो नालेदी पाषाण युगीन मानव प्रजाती और आधुनिक मानव प्रजाति का खूबसूरत मिश्रण हओ। नलेदी का मस्तिष्क संतरे के आकार का रहा होगा। उसके हाथ मानव के जैसे ही है लेकिन उंगलियों मे वक्रता है। जो कि वृक्ष पर चढ़ने वाली प्रजातियों मे देखी जाती है। नलेदी की उंचाई पांच फीट रही होगी, जोकि वानरो की तुलना मे अधिक है। उसके पैर और पंजे मानवो के जैसे ही है, इससे प्रतीत होता है कि वे दोनो पैरो पर खड़े होकर लंबी दूरियां तय करते रहे होंगे। वैज्ञानिको के अनुसार होमो नलेदी हमारी प्रजाति का सबसे प्राथमिक सदस्य लगता है जिसमे इतने मानव के जैसे गुण है कि उसे होमो जीनस मे रखा जा सकता है। वहीं मानव उत्पत्ति पर शोध करने वाले अन्य विशेषज्ञों का कहना है कि अब तक मिले सबूतों के आधार पर यह दावा अनुचित है। हड्डियों के बारे में उनका तर्क है कि ये मानव की हड्डियों के समान हैं। इसके दांत साधारण व छोटे हैं। छातियां प्राचीन व लंगूरों की तरह हैं, लेकिन हाथ बेहद आधुनिक हैं। हड्डियों की माप से यह बात सामने आई है कि ये प्राणी प्राचीन लंगूरों व आधुनिक मानव के मिले-जुले रूप हैं। इसका मस्तिष्क छोटा है और गोरिल्ला के आकार का है। ऐसी रचनाएं लंगूरों में देखी जाती है, जो अपना अधिकांश समय पेड़ पर व्यतीत करते हैं।

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