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अंशुमान त्रिपाठी
नई दिल्ली। विपक्षी दलों के विधायकों के इस्तीफे का सिलसिला जारी है। गुजरात में शंकर वाघेला के इस्तीफे और बिहार में नीतीश कुमार के पाला बदलने के बाद यह सिलसिला और तेज हो गया है। इसका संबंध कहीं न कहीं राज्यसभा चुनाव से जुड़ता दिख रहा है। गुजरात में कांग्रेस के राज्यसभा प्रत्याशी अहमद पटेल के लिए जीत का आंकड़ा जुटाना कठिन हे चुका है। अब उत्तर प्रदेश में भी बसपा के एक और सपा के दो विधान पार्षदों के इस्तीफे के बाद इसका दायरा बढ़ता चला जा रहा है। इस तरह इस्तीफों की बाढ़ जारी रही तो विपक्ष के किसी उम्मीदवार का राज्यसभा में जाना संदिग्ध हो जाएगा। विपक्षी नेता इसे भाजपा की तोड़फोड़ की नीति का परिणाम बता रहे हैं। लेकिन इसे पूर्ण सत्य नहीं माना जा सकता। किसी घर में सेंध तभी लगती है जब उसकी दीवारों का कोई हिस्सा कमजोर पड़ने लगता है। सच्चाई तो यही है कि फिलहाल विपक्षी दलों के अधिकांश कार्यकर्ताओं और नेताओं को 2019 के लोकसभा चुनाव में भी बाजी विपक्ष के खाते में आने की दूर-दूर तक संभावना नहीं दिखती। इसे चाहे खुलकर स्वीकार न करें लेकिन 2024 से पहले मोदी का तिलस्म टूटने की कोई उम्मीद स्वयं शीर्ष विपक्षी नेताओं को भी नहीं दिख रही। बिहार की राजनीतिक परिघटना के बाद महागठबंधन के प्रयोग की भी भ्रूणहत्या हो चुकी है। विपक्षी नेताओं के एक मंच पर आने की अब कोई उम्मीद नहीं बची है। विपक्ष के अधिकांश बड़े नेता घोटालों के आरोपों में उलझे हैं। नीतीश की छवि अपेक्षाकृत साफ सुथरी है लेकिन अन्य दलों के नेताओं का अहंकार उन्हें महागठबंधन का चेहरा बनाने के पक्ष में नहीं था। अब विपक्ष के पास साफ-सुथरे और भरोसेमंद चेहरे का अकाल है। इस स्थिति में 2024 यानी सात वर्षों का इंतजार संभव नहीं है। इतना धैर्य सत्ता की राजनीति करने वालों में नहीं होता। यही कारण है कि लोग मोदी की छत्रछाया में ही सत्ता सुख की उम्मीद देख रहे हैं। राज्यसभा चुनाव एनडीए के प्रति वफादारी दिखाने का एक बेहतरीन अवसर है। अभी खेमा बदलने का लाभ मिल सकता है। सत्तासुख की इसी लालसा के कारण ही विपक्षी दलों में भगदड़ मची हुई है। विपक्षी नेताओं के पास फिलहाल उन्हें रोक रखने का कोई ठोस आधार नहीं है। उनके घर की दीवारें खोखली हो चुकी हैं। धर्म निरपेक्षता और सांप्रदायिकता के नारे भी अपना अर्थ खो चुके हैं। शीर्ष नेताओं ने इन्हें भ्रष्टाचार और अपराध पर पर्दा डालने का हथियार बना लिया है। आम जनता भी इन नारों का असली अर्थ जान चुकी है और जन प्रतिनिधि भी। फिलहाल इस भगदड़ को रोकना संभव नहीं दिखता।

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