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-पंखुरी सिन्हा



सुनो दोस्त, हर रोज तुम्हारी दुनिया में
ये मान अपमान का क्यों होता है खेल?
क्यों बजता है नंगेपन का नगाड़ा
क्यों तुम्हारी कविता
तुम्हारी बातों में
जैसे चला आया है
न्यूडिस्ट चित्र कला का प्रभाव
उसकी हर पंक्ति में
नंगा शब्द है
कितने विशेषण बनाए जा सकते हैं उससे
कितने तरहों से प्रयोग कर
वाक्यों में उसका
जैसे जपी जा रही हो
नंगेपन की माला
खाम खाह
नंगी क्यों होती जाती है
हर किसी की भाषा
हर किसी की राजनीति
हर कोई क्यों कर रहा है
सड़क छाप राजनीति
वोट के अलावा
कितने किस्मों की है राजनैतिक जुटान
कैंपेनिंग, प्रबुद्धों के पन्नों पर
राजा से कम की वो करते नहीं भर्त्सना
कोई शोहदा छेड़ता है
गली में लड़की को
खींचता है उसका दुपट्टा
होता है बलात्कार गाडी और घर में
कैसा बलात्कार वो नहीं कहते
वो कहते हैं राजा को नंगा
ये उनकी पुरानी आदत है
प्रबुद्धों का शार्ट कट है
वो दस गालियां सुनाकर
हुक्मरान को
डकार लेते हैं अपना खाना
और लिखते हैं ऐसी भाषा
जिससे बढ़ती है वह हिंसा
जो सरे आम कर रही है
एक दूसरे को नंगा
कितनी भाव वाचक संज्ञाएं
गढ़ी जा रही हैं
नंगे शब्द से
कितनी क्रियाएं उसके इर्द गिर्द
कितने क्रिया विशेषण
कैसा व्याकरण गढ़ रहे हो मेरे दोस्त
कैसी इजात कर रहे हो भाषा?
क्या इससे बढ़ेगी नहीं
ईव टी जिंग की समस्या?
क्या उसकी बड़ी दुर्घटना बन जाने वाली
संभावना बढ़ती नहीं तुम्हारी भाषा से?

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