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नींद नहीं आने या कम आने का सबसे बड़ा कारण होता है शरीर में कम सक्रिय या अधिक सक्रिय नींद प्रणाली में जन्मजात असंतुलन। चिकित्सा विज्ञान इसका कारण आज तक खोज नहीं पाया है। इसकी शुरूआत गर्भावस्था या बचपन से होती है। जो वयस्क होने तक बनी रहती है। इस किस्म के रोगी केवल इस चिंता में नहीं सोते कि नींद नहीं आएगी। ये लोग सोने का समय नजदीक आते ही चिंताग्रस्त हो जाते हैं। न सो पाने की चिंता रहने के कारण ये बिल्कुल ही नहीं सोते हैं। यह बीमारी मनोवैज्ञानिक तौर पर ज्यादा प्रभाव डालती है। जिससे तनाव बढ़ता है। कई बच्चे माता-पिता नजदीक नहीं हो तो नहीं सोते। इसे बिहेवियर इन्सोम्निया कहते हैं। इसका उपचार है बच्चों के लिए फिक्स स्लीपिंग टाइम का सख्ती से पालन। बाहरी वातावरण या आंतरिक कारणों से अक्सर लोग पर्याप्त नींद नहीं ले पाते हैं। इसे पेराडाक्सियल कहते हैं। इसमें पीड़ित नींद लेने की अपनी समयावधि को लेकर भ्रमित रहते हैं। तनाव के कारण होने वाला यह अनिद्रा रोग अल्पकालिक होता है। तनाव खत्म हो जाने या तनाव से समझौता कर लेने पर नींद आने लगती है। यह जरूरी नहीं है इसका रोगी पर नकारात्मक प्रभाव ही होगा। इसके सकारात्मक परिणाम भी देखे गए हैं।

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