0

 9 अगस्त को खत्म होगा गाजियाबाद नगर निगम में मेयर एवं पार्षदों का कार्यकाल
 अगले एक महीने में खत्म हो जाएगा प्रदेश के सभी नगर निकायों का कार्यकाल

विजय मिश्र
लखनऊ/गाजियाबाद। प्रदेश के सभी नगर निकायों का कार्यकाल अगले एक महीने में खत्म हो जाएगा। कार्यकाल खत्म होने के बाद नगर निगमों में नगरायुक्त एवं नगरपालिकाओं में अधिशासी अधिकारी सर्वशक्तिमान हो जाऐंगे। वित्तीय अधिकार सहित समस्त अधिकारी इन अधिकारियों के पास होंगे। सरकार द्वारा इस बाबत शासनादेश जारी कर दिया गया है। शासनादेश में कहा गया है कि निकायों की कार्यावधि की गणना उनके गठन के पश्चात शपथ ग्रहण की तीथि के उपरांत हुए प्रथम बैठक की तीथि से की जाएगी। इस लिहाज से गाजियाबाद नगर निगम का कार्यकाल 9 अगस्त को समाप्त हो जाएगा और इसके बाद नगरायुक्त चंद्र प्रकाश सिंह समस्त निर्णय लेने के लिए अधिकृत होंगे।
गाजियाबाद नगर निगम में शपथ ग्रहण 17 जुलाई को एवं पहली बोर्ड बैठक 9 अगस्त 2012 को हुआ था। ऐसे में इस बात को लेकर गतिरोध बना हुआ था कि गाजियाबाद नगर निगम का कार्यकाल कम समाप्त माना जाय। कुछ जानकारों का तर्क था कि शपथ ग्रहण की तीथि को ही कार्यकाल की शुरूआत माना जाना चाहिए। इस लिहाज से 17 जुलाई 2017 को कार्यकाल खत्म माना जाये। जबकि कई जानकार निगम की पहली बोर्ड बैठक को कार्यकाल की गणना का आधार मान रहें थे। शासनादेश जारी होने के बाद इन सभी चचार्ओं पर विराम लग गया है। प्रमुख सचिव स्थानीय नगर निकाय कुमार कमलेश के हस्ताक्षर से जारी हुए शासनादेश में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश नगर पालिका अधिनियम 1916, नगर निगम अधिनियम 1959 एवं उच्च न्यायालय लखनऊ बेंच द्वारा 5 दिसंबर 2011 को पारित आदेश के अनुपालन में नगर निकायों के आगामी चुनाव होने तक अंतरिम व्यवस्था के तहत यह निर्णय लिया गया है। पूर्व में नगर निगम बोर्ड का कार्यकाल खत्म होने के बाद जिलाधिकारी को प्रशासक बना दिया जाता था। इस व्यवस्था के तहत मेयर के समस्त अधिकारी जिलाधिकारी के पास चले जाते थे और नगरायुक्त जिलाधिकारी के मातहत अधिकारी के रूप में काम करते थे। लेकिन शासनादेश जारी होने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि नगर निगम के समस्त निर्णयों के लिए नगरायुक्त ही सक्षम अधिकारी होंगे।
-----------

कार्यकाल को लेकर है विरोधाभास
नगर निगम में मेयर का पद संवैधानिक एवं प्रतिष्ठित पद है। कोलकता, दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों में मेयर का पद बेहद शक्तिशाली माना जाता है। लेकिन उत्तर प्रदेश के शहरों में मेयर का पद उतना प्रभावशाली नहीं है। इसकी वजह नगर निगम अधिनियम में व्याप्त कई खामियां हैं। उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम में कई धाराएं विरोधाभासी है। अधिनियम में निगम बोर्ड के कार्यकाल को लेकर भी विरोधाभासी बातें कही गई हैं। अधिनियम की धारा 8 के अनुसार मेयर एवं पार्षदों का कार्यकाल नगर निगम बोर्ड की पहली बैठक से माना जाना चाहिए। जबकि धारा 85 कहती है कि शपथ ग्रहण के बाद से ही कार्यकाल शुरू हो जाता है।
---------

आशु वर्मा बने रहेंगे मेयर ?
भले ही गाजियाबाद नगर निगम का कार्यकाल 9 अगस्त को समाप्त हो रहा है और निगम बोर्ड को खत्म करने को लेकर शासनादेश भी जारी हो चुका है। इसके बावजूद आशु कुमार वर्मा चाहें तो वह गाजियाबाद के मेयर बने रह सकते हैं। लेकिन इसके लिए आशु वर्मा को इलाहाबाद उच्च न्यायालय से स्टे लेना पड़ेगा। दरअसल नगर निगम अधिनियम में ऐसा प्रावधान है और इलाहाबाद हाईकोर्ट से पूर्व में इस बाबत आदेश भी आया था कि मेयर का कार्यकाल अगले मेयर की नियुक्ति तक बना रह सकता है।
नगर निगम अधिनियम के जानकार एवं वरिष्ठ पार्षद मुकेश त्यागी बताते हैं कि नगर निगम अधिनियम 1959 की धारा 15 उपधारा 3 में लिखा है कि मेयर का कार्यकाल नये मेयर के शपथ ग्रहण तक रहेगा। आशुतोश वार्ष्णेय बनाम उत्तर प्रदेश सरकार के एक मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस बाबत एक आदेश भी दिया था। इसी आदेश के आधार पर वर्ष 2011 में पूर्व मेयर दिवंगत दमयंती गोयल को इलाहाबाद हाईकोर्ट से स्टे मिला था और वह अपने पद पर बरकरार रही। ऐसे में यदि आशु वर्मा हाईकोर्ट जाएंगे तो उन्हें भी स्टे मिल सकता है। वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनैतिक विश्लेषक विद्या शंकर तिवारी कहते है कि 2011 में बसपा की सरकार थी और दमयंती गोयल भाजपा से मेयर थी। लेकिन अब परिस्थिति अलग है। प्रदेश में भाजपा की सरकार है और यदि आशु वर्मा कोर्ट जाते हैं तो उन्हें सरकार एवं पार्टी विरोधी माना जाएगा। ऐसे में आशु वर्मा को कोई राजनैतिक जोखिम नहीं लेना चाहिए। विद्या शंकर तिवारी बताते हैं कि लखनऊ के तत्कालीन मेयर और वर्तमान में उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा ने वर्ष 2011 में भी हाईकोर्ट जाने से इंकार कर दिया था।

Post a Comment Blogger Disqus

 
Top