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देवेंद्र गौतम
नई दिल्ली। बसपा सुप्रीमो मायावती का राज्यसभा से इस्तीफा देना महज एक सियासी नाटक है। दरअसल वह इस्तीफा देना नहीं बल्कि विपक्षी खेमे में अपना वजन बढ़ाना चाहती थीं। दलितों को हमदर्दी को संदेश देना चाहती थीं। उत्तर प्रदेश चुनाव में कमजोर प्रदर्शन के बाद वह राजनीति के हाशिये में चली गई थीं। उनके वोटों का प्रतिशत भले कम नहीं हुआ लेकिन इतनी सीटें भी नहीं मिल पाईं कि राज्यसभा में अपना एक प्रतिनिधि भी भेज पाएं। अब अप्रैल 2018 में उनका राज्यसभा का कार्यकाल खत्म हो रहा है। इसके बाद बिना बैसाखी का सहारा लिए वे वापस नहीं आ सकतीं। किसी संसदीय संस्था की सदस्यता नहीं रहने पर वे अपनी पार्टी के साथ नेपथ्य में चली जाएंगी। लालू ने उन्हें राजद के कोटे से राज्यसभा में भेजने का आश्वासन जरूर दिया है लेकिन वे भी राजनीतिक लाभ की सूरत में ही अपनी वादे पर कायम रहते। लालू का मानना है कि मायावती की मदद करने पर बिहार के दलित उनके साथ आ जुड़ेंगे। उनका वोट बैंक मजबूत होगा। इसके लिए मायावती को अपने आधार वोटरों की सहानुभूति का नवीकरण जरूरी था। दूसरी बात यह कि योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य को विधानसभा में आने पर गोरखपुर और फुलपुर संसदीय क्षेत्र खाली हो रहे हैं। वहां उपचुनाव होने हैं। मायावती फुलपुर से भाग्य आजमा सकती हैं। जीत मिली तो लोकसभा पहुंचने का रास्ता मिल सकता है। संभवत: इसी मकसद से नाराजगी और इस्तीफे का नाटक रचा गया। सहारनपुर का मुद्दा अभी राज्यसभा में उठाने का कोई मतलब नहीं था। दूसरी बात यह कि लंबे समय तक संसदीय राजनीति में सक्रिय रहने के नाते उन्हें अवश्य पता होगा कि संसदीय संस्थाओं में इस्तीफे की भाषा क्या होती है। वहां एक पंक्ति में इस्तीफा दिया जाता है। उन्होंने तीन पृष्ठों का त्यागपत्र लिखा। उन्हें पता था कि इसे मंजूर नहीं किया जाएगा। लेकिन इसके जरिए उन्होंने जो संदेश देना चाहती थीं, दे दिया। इस्तीफा देने के कुछ ही घंटे बाद लालू ने उनसे संपर्क कर अपना वादा दुहराया। मायावती उन नेत्रियों में हैं जो संसदीय व्यवस्था के बाहर जल बिन मछली की तरह तड़पने लगती हैं। राजनीतिक लाभ के लिए किसी से हाथ मिलाने में उन्हें परहेज नहीं है। उनके लिए भाजपा और गैरभाजपा में कोई फर्क नहीं है। इसीलिए महागठबंधन के घटक के रूप में उनके शामिल होने की संभावना पर भी किसी को यकीन नहीं था। अपनी इसी ढुलमुल और अवसरवादी प्रवृत्ति के कारण वे अलग-थलग पड़ती जा रही थीं। इसीलिए चर्चे में आना उनकी राजनीतिक जरूरत बन गई थी। ऊपरी सदन में उनके सियासी नाटक का सबब यही था। उनके सदन से बायकाट करने के बाद कांग्रेस और कुछ अन्य दलों के लोग भी सदन से बाहर निकल आए। यही तो वे चाहती थीं। अब वे महागठबंधन में शामिल होकर राज्यसभा में वापसी का रास्ता सुनिश्चित कर सकती हैं। हालांकि महागठबंधन में उनके शामिल होने के रास्ते में समाजवादी पार्टी अड़चन डाल सकती है। फिलहाल थोड़े मान-मनौव्वल के बाद कार्यकाल पूरा होने तक राज्यसभा में बने रहने पर राजी होने का रास्ता भी खुला हुआ है।

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