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फिलिस्तीन को दरकिनार कर सीधे पहुंचे इजरायल


नई दिल्ली। बीते 25 बरस में कभी ऐसा हुआ नहीं कि फिलिस्तीन को छोड़ सिर्फ इजरायल की यात्रा की गई हो। पीएम मोदी पहले शख्स हैं जो सिर्फ इजरायल पहुंचे जहां उनका जबर्दस्त स्वागत किया गया।
दो साल पहले राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी इजरायल के एयरपोर्ट पर उतरे जरूर लेकिन पहले फिलिस्तीन गए, फिर इजरायल दौरे पर गए। पिछले साल जनवरी में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज फिर पहले फिलिस्तीन गईं, उसके बाद इजरायल गईं लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इजरायल पहुंचेंगे तो तीन दिन इजरायल में ही गुजारेंगे। तो क्या प्रधानमंत्री इजरायल को लेकर संबंधों की नई इबारत लिखने जा रहे हैं और भारत के उस ऐतिहासिक रुख को हमेशा के लिए खत्म कर रहे हैं, जिसकी छांव में गांधी से लेकर नेहरू तक की सोच अलग रही।
महात्मा गांधी ने 26 नवंबर 1938 को हरिजन पत्रिका में कई यहूदियों को अपना दोस्त बताते हुए लिखा था कि यहूदियों के लिए धर्म के आधार पर अलग देश की मांग मुझे ज्यादा अपील नहीं करती। फिलिस्तीन अरबों का है, जिस तरह इंग्लैंड ब्रिटिश का और फ्रांस फ्रेंच लोगों का है और अरबों पर यहूदियों को थोपना गलत और अमानवीय है।
इतना ही नहीं, 21 जुलाई 1946 को लिखे अपने एक और लेख में महात्मा गांधी ने लिखा- दुनिया ने यहूदियों के साथ बहुत क्रूरता की है। अगर उनके साथ क्रूरता नहीं हुई होती तो उनके फिलिस्तीन जाने का सवाल ही नहीं उठता।
लेकिन महात्मा गांधी के विचार भारत की आजादी से पहले के थे। भारत की आजादी के बाद 29 नवंबर 1947 के बाद संयुक्त राष्ट्र में इजरायल के मुद्दे पर वोटिंग होनी थी। उससे पहले भारत का समर्थन जुटाने के लिए इजरायल ने उस वक्त के सबसे बड़े यहूदी चेहरों में से एक दुनिया के महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टाइन को मैदान में उतारा। आइंस्टाइन नेहरू के प्रशंसक और कुछ हद तक मित्र भी थे। नेहरू भी उनका बहुत सम्मान करते थे। 13 जून 1947 को अपने चार पेज के खत में आइंस्टाइन ने नेहरू को लिखा-प्राचीन लोग, जिनकी जड़ें पूरब में है, अरसे से अत्याचार और भेदभाव झेल रहे हैं। उन्हें न्याय और समानता चाहिए।
इस खत में यहूदियों पर हुए अत्याचारों का विस्तार से जिक्र था। इसके अलावा कई तर्क थे कि क्यों यहूदियों के लिए अलग राष्ट्र चाहिए। नेहरू ने करीब एक महीने तक खत का जवाब नहीं दिया। फिर 11 जुलाई 1947 को जवाब देते हुए लिखा- मैं स्वीकार करता हूं कि मुझे यहूदियों के प्रति बहुत सहानुभूति है तो अरब लोगों के लिए भी है। मैं जानता हूं कि यहूदियों ने फिलिस्तीन में बहुत शानदार काम किया है और उन्होंने वहां के लोगों का जीवनस्तर सुधारने में बड़ा योगदान दिया है लेकिन एक सवाल मुझे परेशान करता है। आखिर इतने बेहतरीन कामों और उपलब्धियों के बावजूद वो अरब का दिल जीतने में क्यों कामयाब नहीं हुए। वो अरब को उनकी इच्छा के खिलाफ क्यों अपनी मांगें मानने के लिए विवश करना चाहते हैं।
गांधी-नेहरू की ये सोच 1992 तक भारत की नीति बनी रही लेकिन 1991 में यूएसएसआर का ढहना और भारत के आर्थिक सुधार ने अमेरिका के साथ संबंधों के दरवाजे खोले और उसमें इजरायल से करीबी अमेरिकी संबंधों तले जरूरत बनी। 29 जनवरी 1992 को फिलिस्तीन राष्ट्रपति यासिर अराफात की सहमति के बाद भारत ने इजरायल के साथ राजनयिक संबंध पूर्ण रूप से बहाल किया।

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