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आज बात एक खास शख्सियत कीl एक ऐसी शख्सियत, जिसे इस देश में उत्तरार्ध गांधी कहा जाता हैl सीधे सादे लिबास में रहकर देश-दुनिया में बड़ा काम करने वाले यह शख्स हैं - डॉl बिंदेश्वर पाठकl शायद पहले ऐसे जीवित महापुरुष, जिनके नाम पर अमरीका में बिंदेश्वर पाठक दिवस मनाया जाता हैl सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक बिंदेश्वर पाठक को पिछले साल इसी महीने में 14 अप्रैल को न्यूयॉर्क के मेयर ने इस अनूठे सम्मान से नवाजा था। अप्रैल का यह महीना और भी खास हैl क्योंकि इसी महीने में 2 अप्रैल 1943 को विश्वविख्यात भारतीय समाजिक कार्यकर्ता एवं उद्यमी डॉ बिंदेश्वर पाठक का जन्म भारत के बिहार प्रान्त के रामपुर में हुआ था। 

चार दशक पहले जब बिंदेश्वर पाठक ने शौचालय पद्धतियों में बदलाव लाने के लिए काम शुरू किया था, तो लोगों में कई तरह की आशंकाएं थींl तब न नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री थे और न राष्ट्रीय स्तर पर स्वच्छता की बात करने वाला कोई राष्ट्रीय नेता l बिंदेश्वर पाठक ने तब घर घर से मैला ढोकर ले जाने की परंपरा को खत्म करने का बीड़ा उठायाl खुले में शौच से मुक्ति दिलाने का राष्ट्रव्यापी अभियान छेड़ा, जो आज भी जारी हैl सन 1964 में समाज शास्त्र में स्नातक की उपाधि लेने के बाद बिंदेश्वर पाठक का मन समाज और देश के लिए कुछ करने को अकुला रहा थाl इस उहापोह में कई साल गुजर गयेl
एक पारंपरिक ब्राह्मण परिवार में जन्मे और बिहार में पले बढे डॉ॰ पाठक ने सन 1967 में बिहार गांधी जन्म शताब्दी समारोह समिति में एक प्रचारक के रूप में कार्य किया था। वे 1968 में भंगी मुक्ति कार्यक्रम से जुड़े रहे और उन्होंने तब इस सामाजिक बुराई और इससे जुड़ी हुई पीड़ा का अनुभव किया। इसके बाद ही अपने दृढ निश्चय और बिहार सरकार के तत्कालीन मंत्री श्री शत्रुध्न शरण सिंह के सुझाव पर उन्होंने 1970 में सुलभ शौचालय संस्थान जैसी संस्था की स्थापना करते हुए भारत के इतिहास में एक अनोखे आंदोलन का शुभारंभ किया।

बिहार से यह अभियान शुरू होकर बंगाल तक पहुंच गया। वर्ष 1980 आते आते सुलभ भारत ही नहीं विदेशों तक पहुंच गया। और फिर सन 1980 में इस संस्था का नाम सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस आर्गनाइजेशन हो गया। आज सुलभ इंटरनेशनल एक ब्रांड बन चुका हैl डॉ. पाठक के निर्देशन में सेवारत सुलभ संस्थान के लिए अन्तर्राष्ट्रीय गौरव उस समय प्राप्त हुआ, जब संयुक्त राष्ट्र संघ की आर्थिक एवं सामाजिक परिषद द्वारा सुलभ इण्टरनेशनल को विशेष सलाहकार का दर्जा प्रदान किया गया।

इस बीच बिंदेश्वर पाठक की शिक्षा जारी रहीl सन 1980 में उन्होंने स्नातकोत्तर तथा सन 1985 में पटना विश्वविद्यालय से पीएच डी की उपाधि अर्जित की। उनके शोध-प्रबन्ध का विषय था  बिहार में कम लागत की सफाई-प्रणाली के माध्यम से सफाईकर्मियों की मुक्ति (लिबरेशन आफ स्कैवेन्जर्स थ्रू लो कास्ट सेनिटेशन इन बिहार)।

सन 2009 का स्टॉकहोम वाटर प्राइज पाने वाले पाठक को पिछले साल रेल मंत्रालय ने पद्म भूषण डॉ. बिंदेश्‍वर पाठक को भारतीय रेलवे के स्‍वच्‍छ रेल मिशन का ब्रांड एंबेसडर नियुक्‍त किया है।

सुलभ की सफलता की कहानी बताते हुए उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा है कि वे 1972 में रामेश्वर नाथ के साथ हुई मुलाकात कभी नहीं भूल सकतेl एक आईएएस अधिकारी के रूप में उन्होंने अस्वच्छ शौचालय प्रथाओं के प्रति समाज का नजरिया बदलने के प्रस्ताव वाली हमारी फाइल को अच्छी तरह पढा, और उन्होंने कहा, एक दिन हमारा कार्यक्रम बडा प्रभाव छोडेगाl लेकिन यह शुरुआत में ही बंद होने वाला उद्यम साबित हो सकता है अगर यह अनुदान पर निर्भर रहाl इसका एक विकल्प है- लाभार्थियों से पैसा जुटानाl और हमने यही कियाl मॉडल को व्यवसायिक रूप देने से ही हमारा मॉडल सफल हो पाया।"

जब उनसे पूछा गया कि क्या पैसे लेने से उपयोगकर्ताओं की संख्या घटी? तो उन्होंने कहा कि कि "यह सही नहीं हैl कोई भी गरीब नहीं कहलाना चाहता, लोग भुगतान कर सकते हैं और करने के लिए तैयार भी हैंl लेकिन कुछ लोग ऐसे हो सकते हैं जो ज्यादा गरीबी में जी रहे होंl अगर कोई यह कहता है कि उसके पास पैसे नहीं हैं तो मैं उसे प्रसाधन सुविधाओं के उपयोग से वंचित नहीं कर सकताl सेनिटेशन सामाजिक प्रतिबद्धता का विषय हैl अगर प्राकृतिक जरूरतों के लिए शुद्ध व्यवसायिक नजरिया अपनाया जाय तो यह गलत होगाl"  

उनका कहना है कि "सुलभ शौचालय ड्रेनेज सिस्टम से नहीं जुडे हुए हैंl अगर कोई सुलभ शौचालयों को ड्रेनेज सिस्टम से जोडता है तो यह गलत हैl सुलभ तकनीकों का पेटेंट नहीं कराया गया हैl ऐसे में 1,000-2,000 सार्वजनिक शौचालय परिसर अन्य गैर सरकारी संगठनों और नागरिक निकायों द्वारा संचालित हो रहे हैं और वे हमारा नाम इस्तेमाल कर रहे हैंl सुलभ नाम के साथ विश्वसनीयता जुडी हुई हैl लेकिन कई बार इसमें बदनामी का भी जोखिम रहता है"l 

इस सवाल पर कि क्या सुलभ इकॅलॉजिकल सेनिटेशन की शर्तें पूरी करता है? वे कहते हैं - "हमारी तकनीक खुद बोलती हैl मैं आपको एक उदाहरण देता हूं- आदमी के मलमूत्र से मीथेन(एक ग्रीनहाउस गैस) उत्पन्न होती हैl सुलभ शौचालयों में इस गैस को रिसायकिल कर इसका इस्तेमाल खाना पकाने, लैंप जलाने या हीटर इत्यादि के लिए किया जाता हैl जहां तक मैं जानता हूं सुलभ शौचालय पर्यावरण सेनिटेशन की सभी शर्तों को पूरा करता हैl" 
उन्होंने तब यह भी कहा था कि "पिछले 35 सालों में हमने 12 लाख शौचालय स्थापित किए और भारत सरकार ने हमारे डिजाइन वाले 40 लाख सुविधाओं की स्थापना कीl जाहिर है यह काफी नहीं हैl 2013 में मैंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से कहा था कि शौचालय के लिए नई तकनीक आ गई हैl लेकिन केंद्र सरकार के फंड भारत में सेनिटेशन की मांगों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं हैंl राष्ट्रीयकृत बैंकों को शौचालय बनाने के लिए ऋण देना चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे वे उर्वरक और बीज की खरीद के लिए ऋण मुहैया कराते हैंl लड़के और लड़कियों को सुलभ प्रौद्योगिकी के बारे में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए और उन्हे इन कार्यक्रमों को लागू करने के लिए कहना चाहिएl "

इसे सीवर प्रणाली से जोड़ने के बारे में आपका क्या ख्याल है? यह पूछे जाने पर उनका जवाब था कि "आदर्श स्थिति में शौचालय सीवरेज नेटवर्क से जरूर जोड़ा जाना चाहिएl लेकिन 2001 की जनगणना के अनुसार देश के 5,161 शहरों में केवल 232 में आंशिक कवरेज वाला सीवर नेटवर्क हैl इस प्रणाली को तब तक पूरा नहीं माना जा सकता जब तक यह मलजल उपचार संयंत्र से न जुड़ा होl अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका जैसे देशों में व्यापक सीवरेज नेटवर्क तैयार करने के लिए पर्याप्त धन नहीं हैl सीवरेज आधारित शौचालय तक अधिकांश लोगों की पहुंच नहीं है, ऐसे में चुनौती यह है कि ऐसे शौचालय बनाए जाएं जो सस्ते, उन्नयन के लायक और आसानी से संचालित हो सकेंl हमारे शौचालय को यूएनडीपी का ग्लोबल बेस्ट प्रैक्टिस रिकमैंडेशन मिला है"l  

जिस देश का रक्षा बजट करीबन तीन लाख करोड़ रुपये हो, जो देश मंगल तक पहुंच गया हो, जो देश 21वीं सदी में सुपर पावर बनने का सपना देख रहा हो वो जमीन पर कहां है। इन शंकाओं और धारणाएं बदलने के बारे में वे कहते हैं - नए विचार को लेकर हमेशा आशंकाएं रहती हैंl चार दशक पहले जब हमने शुरुआत की थी इंजीनियर हमारी प्रौद्योगिकी को लेकर संदेह कर रहे थेl मैं 1975 से ही दोहरी पिट वाले फ्लश सिस्टम को लोकप्रिय बनाने के लिए प्रयास कर रहा हूंl सुलभ प्रौद्योगिकी एक सरल साधन हैl इसमें दो गड्ढ़े होते हैं जिन्हें वैकल्पिक रूप से प्रयोग किया जाता हैंl जब एक पिट भर जाता है तो मलमूत्र को दूसरे गड्ढे में डाला जाने लगता है, ऐसे में पहले गड्ढे के मलमूत्र को बिना गंध वाले ठोस रोगाणु मुक्त खाद में बदला जाता हैl इससे मलमूत्र के मैनुअल सफाई की आवश्यकता नहीं होतीl  पारंपरिक 10 लीटर वाले फ्लश के मुकाबले इसे फ्लश करने में 1.5 लीटर पानी की आवश्यकता होती हैl अब दुनिया इसे स्वीकार करने लगी हैl अभी भी भारत में 5,00,000 सफाईकर्मी अपने हाथों से शौचालय की सफाई कर रहे हैंl सामाजिक न्याय मंत्रालय ने उनके पुनर्वास के लिए चार महीने का प्रशिक्षण का कार्यक्रम रखा हैl उनके पुनर्वास के लिए अतिरिक्त धन की जरूरत हैl लेकिन इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता हैl जानकारी के दरवाजे लोगों के लिए खोले जाने चाहिएl 

बिंदेश्वर पाठक को उनके असाधारण, अतुलनीय और अनुकरणीय कार्य के लिए वैसे तो  देश और दुनिया भर में अनेकों सम्मान और पुरस्कार मिले हैं, किंतु बीते वर्ष 2016 में अमरीका में उन्हें ऐसे सम्मान से नवाजा गया, जिसे किसी जीवित भारतीय को मिला अतुलनीय सम्मान कहा जा सकता हैl न्यूयॉर्क के मेयर बिल ड ब्लासियो ने 14 अप्रैल वर्ष 2016, को बिंदेश्वर पाठक दिवस घोषित करते हुए कहा कि श्री पाठक को यह सम्मान सबसे अमानवीय स्थिति में काम करने वाले लोगों के जीवन को सुधारने की दिशा में किए गए योगदान की मान्यता देते हुए दिया जा रहा है। ब्लासियो ने कहा, ‘स्वास्थ्य एवं स्वच्छता और दुनिया को आगे की दिशा में ले जाने की खातिर पाठक ने असाधारण योगदान दिया है। इस दौरान मेयर ने कहा, पाठक एक ऐसे व्यक्ति हैं जिसने समाज में घोर अन्याय देखा, ऐसी चीज देखी जो बहुत सारे लोगों के लिए अव्यवहारिक एवं स्थायी है और जिसमें बदलाव लाने के लिए रचनात्मकता, ऊर्जा, प्रेरणा तथा उम्मीद थी। पाठक को बीते साल इसी हफ्ते यहां इससे पहले न्यूयार्क ग्लोबल लीडर्स डायलॉग ह्यूमेनिटैरियन अवार्ड भी दिया गया था। मेयर ने कहा कि पाठक ने अपनी दृष्टि से शोषित वर्ग की मदद की और अपने काम एवं संगठन के जरिये नई प्रौद्योगिकी का निर्माण किया जिसने सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा पर्यावरण में सुधार किया और कई समुदायों के लिए मूल रूप में वास्तविकता बदल दी। ब्लासियो ने 14 अप्रैल, 2016 को बिंदेश्वर पाठक डे घोषित करने से जुड़ा उद्घोषणा पत्र पाठक को भेंट करते हुए कहा कि उन्होंने सामाजिक सुधारों के लिए अभियान चलाकर तथा नवीन एवं पर्यावरण की दृष्टि से लाभकारी स्वच्छता तकनीकों का विकास कर भारत में मानवाधिकारों की वकालत में करने वाले अगुवा होने के लिए पाठक को यह सम्मान दिया।

इसे बाद डॉ. पाठक को भारत सरकार द्वारा 1991 में पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सन् 2003 में पाठक का नाम विश्व के 500 उत्कृष्ट सामाजिक कार्य करने वाले व्यक्तियों की सूची में भी प्रकाशित किया गया। डॉ. पाठक को एनर्जी ग्लोब पुरस्कार भी मिला और इंदिरा गांधी पुरस्कार, स्टाकहोम वाटर पुरस्कार इत्यादि सहित अनेक पुरस्कारों द्वारा सम्मानित किया गया है। उन्होंने पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने के लिये प्रियदर्शिनी पुरस्कार एवं सर्वोत्तम कार्यप्रणाली (बेस्ट प्रक्टिसेस) के लिये दुबई अन्तरराष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त किया है। इसके अलावा उन्हें सन 2009 में अंतर्राष्ट्रीय अक्षय ऊर्जा संगठन (आईआरईओ) का अक्षय उर्जा पुरस्कार भी प्रदान किया गया था।

आज सुलभ इण्टरनेशनल ने जनसाधारण की सुविधा के लिए व्यस्त और वाणिज्यिक क्षेत्रों में बहुत से सुलभ सामुदायिक परिसर भी स्थापित किए हैंये लोगों को राहत पहुँचाने के साथ-साथ शहरों को प्रदूषण से बचाने में भी काफी हद तक सफल रहे हैं। अल्प अवधि में ही सुलभ इण्टरनेशनल सामाजिक परिवर्तन के उत्प्रेरक और अभिकर्ता के रूप में उभरकर सामने आया है जिसने लाखों कमाऊ शौचालयों को सुलभ शौचालय़ों में परिवर्तित किया है। साथ ही देश भर में सैकड़ों सुलभ सामुदायिक परिसर बनाए गए हैं। परिणाम स्वरूप हजारों सफाईकर्मियों मुक्त कराये जा चुके हैं। सुलभ इण्टरनेशनल ने मुक्त हुए सफाईकर्मियों को अलग-अलग व्यवसाय सिखाने का उत्तरदायित्व भी लिया है ताकि उन्हें बेकारी का सामना न करना पडे़ और वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें। सुलभ इंटरनेशनल ने राज्य और केन्द्र सरकारों, देश-विदेश से स्वयंसेवी संस्थाओं और नगरपालिकाओं तथा नगरनिगमों का ध्यान आकर्षित किया है।
ऐसे महापुरुष को वास्तव में स्वच्छता के लिए नोबल पुरस्कार मिलना चाहिए थाl लेकिन शायद इन पुरस्कारों के चयन में भी कहीं न कहीं कोई कमी हैl ऐसे जीवित महापुरुष, जिनके नाम पर अमरीका में बिंदेश्वर पाठक दिवस मनाया जाता है, आज समूचा देश भारत के इस महान सपूत के कार्यों के आगे नतमस्तक हैl उन्हें इस माह उनके जन्म दिन की कोटिश:बधाई और नमनl  
·        ओंकारेश्वर पांडेय





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