0

महाभारत में बेशक श्रीकृष्ण सच का पताका थामे पांडवों के साथ धर्म की खातिर खड़े थे लेकिन दुर्योधन उन्हें छलिया मानता था। ऐसा कई बार हुआ कि सत्तांध दुर्योधन को लगा कि मधुसूदन ही युद्ध करा रहे हैं।  दुर्योधन कभी समझ ही नहीं पाया कि भगवान पांडवों के पाले में क्यों खड़े हैं, ठीक इसी तरह से यादवी कुनबे की लड़ाई में कौन नायक है और कौन खलनायक इसका फैसला मुश्किल हो गया है। मुलायम खेमा रामगोपाल को कागजी और खलनायक मान रहा है तो अखिलेश खेमा अमर सिंह को दलाल और घरफोड़ू  मान रहा है। दोनों पक्ष समझौते के लिए तैयार है लेकिन  खलनायकों को लेकर मामला अटक गया है। मुलायम का अमर प्रेम नहीं जा रहा है तो अखिलेश किसी भी सूरत में रामगोपाल को राम-राम कहने को तैयार नहीं हैं। बताते हैं कि बाकी बातों पर काफी हद तक सहमति बन गई है और दोनों पक्ष इस बात से बखूबी वाकिफ है कि साइकिल छिनी तो दोनों को नुकसान होगा। मुलायम टिकट बंटवारे को लेकर भी मुलायम हो गये हैं और शिवपाल को राष्ट्रीय महासचिव बनाकर दिल्ली शिफ्ट करने को लेकर भी ना नुकुर के साथ रजामंदी है लेकिन मुलायम अमर को और अखिलेश रामगोपाल को छोड़ने को तैयार नहीं हैं। जबकि अखिलेश  जिद धरे बैठे हैं कि अमर ्के  पार्टी में रहते हुए कोई समझौता नहीं हो सकता, वहीं मुलायम अब रामगोपाल को लेकर नरम रुख अख्तियार करने को तैयार नहीं हैं। मुलायम खेमा मान रहा है कि पिता-पुत्र को लड़ाने वाले रामगोपाल ही हैं। यदि उन्होंने गुरुमंत्र नहीं दिया होता तो अखिलेश बाप से अध्यक्षी छीनने की जुर्रर नहीं करते अलबत्ता जोश में अखिलेश खेमा यह भूल गया कि  लड़ाई में खेमाबंदी के साथ कानूनी दांवपेंच का भी ध्यान रखा जाता है। जब रामगोपाल लिखित रुप से दूसरी बार निकाले गये थे तो उनकी वापसी भी लिखित रूप से ही होनी चाहिए थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सवाल है कि जो पार्टी में है ही नहीं वह राष्ट्रीय अधिवेशन कैसे बुला सकता है। सूत्रों की माने तो मुलायम खेमे ने वकीलों से सलाह ली है और उन्हें बताया गया है कि कानून उनके पक्ष में है। इसके बावजूद झगड़ा बढ़ने पर साइकिल जब्त हो सकती है,  मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम जैदी से जब इस बाबत पूछा गया तो उन्होंने बताया कि दोनों पक्षों ने अपनी बात रखी है और उसका अध्ययन किया जा रहा है। उचित समय पर उचि त निर्णय लिया जाएगा।
दंगल राउंड टू में कबीना मंत्री आजम खान खासे सक्रिय हैं, उनकी पहल पर मुलायम और अखिलेश की कल 4 घंटे की लंबी बैठक चली थी लेकिन समाधान नहीं निकल पाया। मुलायम के घर पर अखिलेश के साथ शिवपाल यादव भी मौजूद रहे, लेकिन तीनों नेताओं ने सुलह पर चुप्पी साधे रखी। बुधवार को फिर मुलायम सिंह के घर पर बैठक हुई, जिसमें शिवपाल यादव और आजम खान भी शामिल हुए। लंबी चली बैठक के बाद आजम खान मुलायम के घर से वापस चले गए, वह सुलह का फॉमूर्ला लेकर आए थे। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि आजम, अमर के धुर विरोधी हैं और उन्हें ठाकुर साहब फूटी आंखों नहीं सुहाते हैं। यह बात अलग है कि जब मुलायम ने अमर को राज्यसभा उम्मीदवार बनाया तो न चाहते हुए भी आजम खान ने उन्हें वोट दिया और अमर सिंह ने उनका शुक्रिया अदा किया। बताते हैं कि आजम खान ने दोनों पक्षों से थोड़ी नरमी बरतने और चुनाव के लिए मिलकर काम करने की अपील की है। इस बैठक में नारद राय और ओमप्रकाश समेत कई नेता शामिल हुए।, ये दोनों नेता मुलायम व शिवपाल के नजदीकी है और इस लड़ाई में ही दोनों की लाल बत्ती छीन गई थी, यह बात अलग है कि अखिलेश भी मानते हैं कि दोनों प्रभावशाली हंै लिहाजा उन्होंने इनके पास अपने हलकारों को दौड़ाया था और संदेशा भिजवाया था कि भले उनके साथ रहें लेकिन आपस में बातचीत होती रहनी चाहिए। आजम खान ने सुलह का जो फार्मूला निकाला है उसके मुताबिक मुलायम सिंह यादव राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रहेंगे और अखिलेश अपना दावा छोड़कर प्रदेश अध्यक्ष बन जाएंगे। शिवपाल यादव को राष्ट्रीय महासचिव बनाकर राष्ट्रीय राजनीति में शिफ्ट कर दिया जाएगा, टिकट बंटवारे में अखिलेश की चलेगी लेकिन अमर और रामगोपाल के निष्कासन पर मामला अटक गया है। अखिलेश रामगोपाल को छोड़ने और अमर सिंह को पार्टी में बनाये रखने को तैयार नहीं हैं जबकि अब मुलायम रामगोपाल को पार्टी में नहीं देखना चाहते।
अंदर की बात यह है कि  पिता-पुत्र की जोड़ी भले ही मानने को तैयार हो गये हों, लेकिन जिस चौकड़ी से दोनों घिरे हैं वो मानने को हरगिज तैयार नहीं हैं। उन्हें लगता है कि उनका करियर खत्म हो जाएगा। अंदाजा लगाइये कि जब अखिलेश-मुलायम से बात कर रहे थे उस समय दिल्ली में रामगोपाल चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटा रहे थे। फिर उन्होंने अपने घर पर बैठक भी हुई और भविष्य की रणनीति बनी।  मुलायम की कमजोरी अमर और शिवपाल हैं, तो रामगोपाल अखिलेश पर हावी हैं। इस बीच मुलायम सिंह द्वारा समाजवादी पार्टी से निकाले गए पुराने भरोसेमंद किरनमय नंदा ने जो खुलासा किया है उससे भी सिपहसलारों पर उंगली उठ रही है। इन आरोपों ने साबित कर दिया है कि मुलायम सिंह अपने फैसले खुद नहीं लेते, यहां तक कि कोई दूसरा उनका हस्ताक्षर कर रहा है। 1 जनवरी को जारी दो पत्रों में मुलायम सिंह यादव के दस्तखत अलग-अलग हैं। इस बयान के बाद हस्ताक्षर  को लेकर नया विवाद शुरू हो गया है, गौरतलब है कि 1 जनवरी को अखिलेश गुट ने लखनऊ में अधिवेशन कर अखिलेश यादव को सपा अध्यक्ष बनाने का ऐलान किया था। इसके बाद मुलायम सिंह यादव ने इस अधिवेशन को असंवैधानिक बताते हुए दो नेताओं किरनमय नंदा और नरेश अग्रवाल को पार्टी से निकालने का आदेश जारी किया था जिसमें हस्ताक्षर अलग-अलग थे।
--------------------

Post a Comment Blogger Disqus

 
Top