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राश्ट्र की रक्षा में दिये गये सर्वोच्च बलिदान हेतु, राश्ट्र हित में संपादित विविध कार्रवाईयों में अनुपम षौर्य के प्रदर्षन के लिये और अपनी विषिश्ट तथा सराहनीय सेवाओं के लिये इस वर्श गणतंत्र दिवस के अवसर पर माननीय राश्ट्रपति, भारत सरकार द्वारा सीमा सुरक्षा बल के 56 अधिकारियों व कार्मिकों को पदकों से सम्मानित किया गया।

 इनमें से 05 कार्मिक वीरता के लिये पुलिस पदक से (01 मरणोपरान्त सहित), 05 अधिकारी/कार्मिक विषिश्ट सेवा के लिये राश्ट्रपति पुलिस पदक से और 46 अधिकारी/कार्मिक सराहनीय सेवा के लिये पुलिस पदक से सम्मानित किये गये :-
                   
                  वीरता के लिये पुलिस पदक
स्वर्गीय रमेष चन्द,
मुख्य आरक्षक (मरणोपरान्त)
सहायक उप0 निरीक्षक
राजेन्द्र कुमार
मुख्य आरक्षक
महावीर सिंह

मुख्य आरक्षक
सज्जन सिंह
मुख्य आरक्षक
अभिजीत कुमार सिंह




     विषिश्ट सेवा के लिये राश्ट्रपति पुलिस पदक

श्री पंकज गूमर 
महानिरीक्षक
श्री राम अवतार,
उप महानिरीक्षक
श्री साबू ए जोसफ उप महानिरीक्षक

श्री केशवा नन्द सुयाल,
उप महानिरीक्षक
श्री धर्मपाल टोकस
कमाण्डेंट



दृश्टांत या उद्धरण

171वीं बटालियन, सीमा सुरक्षा बल


दिनांक अप्रैल 2015 को, सीमा सुरक्षा बल की 171वीं बटालियन की तैनाती घोर नक्सल प्रभावित राज्य ‘छत्तीसगढ़’ के कांकेर में थी। इस बटालियन की कमान के अंतर्गत सी.ओ.बी.‘छोटेबेठिया’ की पार्टी पैदल ही किसी ऑपेरषन में जा रही थी।

यह पार्टी, जिसकी कमान मुख्य आरक्षक रमेष चंद कर रहे थे, सावधानी से अपने गंतव्य की ओर बढ़ती जा रही थी। किंतु जैसे ही पार्टी ‘छोटेबेठिया’ के बाहरी इलाके में पहुंची, पहले से घात लगाये माओवादियों ने पार्टी पर चौतरफा फायर खोल दिया। यह फायर ऑटोमैटिक हथियारों से किया जा रहा था। 

माओवादियों द्वारा किये गये इस अचानक हमले की जद में पहली गोली मुख्य आरक्षक रमेष चंद को लगी और वे घायल होकर गिर पड़े। किंतु गोली लगने के बावजूद भी रमेष चंद ने हिम्मत नहीं हारी। घायल होने के बावजूद भी अदम्य साहस का प्रदर्षन करते हुए, लेटे लेटे ही, उन्होंने जमीनी बनावट का निरीक्षण किया और एक माकूल टैक्टिकल पोजीषन का चुनाव कर रेंगते हुए वहां पहुंचे। 

उचित पोजीषन अख्तियार करने के बाद, पेषेवर रवैया अपनाते हुए,उन्होंने पहले तो माओवादियों को आत्म समर्पण करने को कहा; किंतु इसके बाद, माओवादियों द्वारा किये जाने वाले फायर के और भी त्रीव हो जाने पर, उन्होंने भी गोलियों का जबाव गोलियों से देना षुरू किया। इस बीच उनके जिस्म से खून लगातार रिस रहा था।

अपने कमांडर के साहस और षौर्य ने पार्टी के बाकी सदस्यों को भी प्रेरित किया और मुख्य आरक्षक महावीर सिंह और मुख्य आरक्षक सज्जन सिंह ने रणकौषल का परिचय देते हुए फायर डालना षुरू किया और नक्सलियों की व्यूह -रचना को ध्वस्त करना प्रारंभ किया।

सीमा प्रहरियों के प्रत्युत्तर ने नक्सलियों के हौसले पस्त किये। इस बीच नक्सली, जो कि गिनती में 08 से 10 के करीब थे, ने पार्टी को विचलित करने के उद्देष्य से पार्टी पर ग्रेनेड से भी हमला किया।

हांलांकि माओवादी अच्छी पोजीषन में थे और बल की पार्टी को दबाव में लाने के लिये पार्टी पर ताबड़तोड़ हमले भी कर रहे थे, किंतु पार्टी इससे तनिक भी विचलित ना हुई और मोर्चे पर डटी रही।

इस दरम्यान पार्टी कमांडर ने मुख्यालय को रि-इंर्फोसमेंट की भी सूचना दे दी थी। इस सूचना के आधार पर सहायक उप निरीक्षक राजेंद्र सिंह बुलेटप्रूफ वाहन से अन्य जवानों को लेकर मौके पर पहुंचे। वहां पहुंचने पर उन्होंने देखा कि अपनी पार्टी बुरी तरह से नक्सलों के जाल में फंसने के करीब है। मौके की नजाकत को भांपते हुए उन्होंने अपना वाहन नक्सलियों और पार्टी के बीच खड़ा किया और अपनी साथियों की ढाल बन माओवादियों पर जोरदार हमला बोल दिया।

सीमा सुरक्षा बल की टुकड़ी के इस जोरदार हमले से माओवादियों में बौखलाहट मच गई और वे जमीनी बनावट का फायदा उठाकर भाग खड़े हुए।

हांलांकि मैदान छोड़ने के इस क्रम में माओवादी अपने पीछे भारी मात्रा में हथियार,  अम्युनेषन और अपने एक घायल साथी, जो बाद में मर गया, को छोड़ गये। इस साथी की पहचान दसमन सलाम के रूप में हुई।

सूत्रों के हवाले से यह भी पुश्टि हुई कि इस मुठभेड़ में घायल दो अन्य माओवादी भी जीवित नहीं रहे।
इस फायरिंग के बीच मुख्य आरक्षक रमेषचंद को निकालकर सिविलि अस्पताल बांदे ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोशित कर दिया। अचानक हमले के पश्चात भी नक्सली सीमा प्रहरियों को विचलित ना कर सके और ना ही उनकी पोजीषन बदलने को बाध्य कर सके।

इस प्रकार, अत्यंत ही निर्णायक और प्रतिकूल परिस्थितियों में जिस तरह से मुख्य आरक्षक रमेष चंद ने उच्च कोटि की नेतृत्व क्षमता, अदम्य षौर्य और अनुपम साहस का प्रदर्षन करते हुए मातृभूमि की राहों में अपने जीवन का बलिदान दिया, वह निःसंदेह अनुकरणीय और देषभक्ति के आदर्ष का जीवंत प्रतिमान है। 

इसी तरह रिफोर्समेंट पार्टी को लेकर मौके पर पहुंचे सहायक उप निरीक्षक राजेंद्र सिंह ने पार्टी को संकट में फंसे देखकर जो त्वरित निर्णय लिया, वह उनके उच्च कोटि के रण-कौषल और साथियों की जीवन रक्षा के लिये स्वयं की जान जोखिम में डालने की महान भावना का द्योतक है।

ऐसे ही मुख्य आरक्षक महावीर सिंह और मुख्य आरक्षक सज्जन सिंह समेत पूरी पार्टी ने जिस जुझारूपन और हौसले के साथ माओवादियों से लोहा लेकर उन्हें भागने पर मजबूर किया, वह साहस और कर्त्तव्यपरायणता की अनुपम मिसाल है।

सीमा सुरक्षा बल के इन जवानों की देशभक्ति, षहादत और मान्यतास्वरूप दिनांक 26 जनवरी 2016 को, गणतंत्र दिवस के षुभ अवसर पर कृतज्ञ राश्ट्र ने स्वर्गीय रमेष चंद, सहायक उप निरीक्षक राजेंद्र सिंह, मुख्य आरक्षक महावीर सिंह और मुख्य आरक्षक सज्जन सिंह को ‘ वीरता के लिये पुलिस पदक’ से सम्मानित करने का निर्णय लिया है। इन सम्मानों में स्वर्गीय रमेष चंद को यह सम्मान उनके मरणोपरांत प्रदान किया गया है।


आरक्षक अभिजीत कुमार सिंह -

मार्च 2015 के महीने में सीमा सुरक्षा बल की 50वीं बटालियन पंजाब के अमृतसर में तैनात थी।

दिनांक 28-29 मार्च 2015 की मध्य रात्रि को 0050 बजे, इस बटालियन की सीमा चौकी, ‘रतन खुर्द’ पर आरक्षक अभिजीत कुमार सिंह ‘एच.एच.टी.आई. ड्युटी पर तैनात था।

ड्युटी पर तैनाती के दौरान अभिजीत ने एच.एच.टी.आई. की स्क्रीन पर देखा कि अंतर्राश्ट्रीय सीमा पर, तारबंदी के पास, चार लोग कुछ संदिग्ध हरकत कर रहे हैं। इस हरकत के बारे में उसने मुख्य आरक्षक प्रेम चंद को तत्काल सूचित किया और बाद बिना क्षण गंवाए, टैक्टिकल पोजीषन अपनाते हुए सीमा तारबंदी के पास पहुंचा।

वहां उसने देखा कि तारबंदी के उस पार चार संदिग्ध (संभवतः पाकिस्तानी) पी.वी.सी. पाइप में कुछ डालने/निकालने का यत्न कर रहे हैं। आरक्षक अभिजीत ने उन्हें ऐसा करते देख उन्हें चुनौती प्रस्तुत की। अभिजीत की चुनौती पर संदिग्धों ने, बाद में जिनकी पुश्टि पाक तस्करों के तौर पर की गई, अभिजीत के ऊपर फायर झोंक दिया, किंतु सतर्क अभिजीत ने जवाब में अपने फायर से दो तस्करों को मौके पर ही ढेर कर दिया, जबकि बाकी अंधेरे का फायदा उठाकर वहां से भाग निकले।

सुबह जब इलाके की तलाषी ली गई, तो वहां से दो पाक तस्करों के षव तो मिले ही, 1 ए.के.47, 30 जिंदा राउंड, 1 मोबाइल फोन (सिम सहित) और तीन बैटरियों के साथ 12 किलोग्राम हेरोइन भी बरामद हुई।

आरक्षक अभिजीत ने जिस तरह से, अपनी ड्युटी को षत-प्रतिषत निभाते हुए अतिरिक्त पहल की और मौके पर पहुंच कर हथियारों से लैस तस्करों से, अकेले ही मुकाबला करते हुए, दो को ढेर तथा बाकियां को भागने पर मजबूर कर, तस्करी की एक बड़ी साजिष नाकाम की, वह कर्त्तव्यपरायणता और साहस के साथ ही रणकौषल में पारंगतता की अनुपम मिसाल है। कृतज्ञ राश्ट्र ने आरक्षक अभिजीत के षौर्य और साहस को सलाम करते हुए इस गणतंत्र दिवस पर उसे ‘वीरता के लिये पुलिस पदक’ से सम्मानित करने का निर्णय लिया है।

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