0

विद्याशंकर तिवारी
नई दिल्ली। अमर सिंह के बारे में कहा जाता है कि जहां वह शांत भी बैठे रहेंगे वहां से भी धुंआ निकलने लगता है। कांग्रेस और सपा के बीच चल रही गठबंधन की बातचीत का संदेश लेकर वह जैसे ही सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव और शिवपाल यादव से मिले यादवी कुनबे में एक बार फिर रार छिड़ गई। जो शिवपाल अखिलेश को ही मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बताकर चुनाव मैदान में कूदने और बहुमत आने पर उनके नाम का प्रस्ताव रखने की दुहाई देते नहीं थकते थे उन्होंने भी मुलायम की राह पकड़ ली कि मुख्यमंत्री का फैसला विधायक करेंगे। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर दो दिनों में ऐसा क्या हुआ कि सपा की अंदरु नी राजनीति में तूफान खड़ा हो गया।
 जानते हैं ऐसा क्यों हुआ ? पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के जन्मदिन पर दिल्ली में एक कार्यक्रम हुआ था जिसमें गैरभाजपाई दलों के नेता जुटे थे। सपा की तरफ से उसमें अमर सिंह ने शिरकत की थी, वहां पर कार्यक्रम के बाद यूपी के कांग्रेस प्रभारी और गुलाम नबी आजाद की तरफ से साफ संदेश दिया गया कि सीटों के बंटवारे के अलावा एक बात तय मानिये कि कांग्रेस सपा के साथ तभी आएगी जब उसे उप मुख्यमंत्री का पद दिया जाएगा और अखिलेश यादव को ही मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर चुनाव लड़ा जाएगा। अमर सिंह को उस डिनर पार्टी में ये भी साफ कर दिया गया की अमेठी और रायबरेली की सीट पर कांग्रेस कोई समझौता नहीं करेगी ऐसे में अमेठी से गायत्री प्रजापति की सीट जानी तय है। मुलायम सिंह ने गायत्री को राष्ट्रीय सचिव बनाकर अपनी ओर से कांग्रेस को संकेत दे दिया है। एक तरफ मुलायम सिंह यादव गठबंधन को नकार रहे है वहीं दूसरी ओर अमर सिंह गठबंधन की अड़चनों को दूर करने में भी लगे है। माना जा रहा है ये सब कुछ परदे के पीछे अमर सिंह कर रहे है ताकि कांग्रेस से गठबंधन पर मुलायम सिंह के फॉमूर्ले पर सहमति बन सके। ये भी जगजाहिर है कि अमर सिंह और पीके परदे के पीछे गठबंधन की तार जोड़ने में लगे है और कोई बात बनती है तो पूरी कोशिश है कि श्रेय मुलायम कुनबे को मिले न कि अखिलेश यादव को।
इसी बैठक की जानकारी लेकर अमर सिंह लखनऊ पहुंचे थे और शनिवार शाम लखनऊ में मुलायम सिंह के घर एक रणनीतिक बैठक हुई जिसमें मुलायम सिंह अमर सिंह और शिवपाल यादव मौजूद थे।  मीटिंग से बाहर आते ही अमर सिंह ने कहा कि गठबंधन पर कोई औपचारिक बात नहीं हुई और अगर कोई फैसला हुआ तो सिर्फ नेताजी ही फैसला लेंगे। साफ था मुलायम-शिवपाल और अमर सिंह, अखिलेश यादव के कांग्रेस के भीतर बढ़ते कद से खफा है और वह गठबंधन अपनी शर्तों पर चाहते थे ना कि अखिलेश यादव की शर्तों पर। बस इसी बात पर मुलायम सिंह यादव बिदक गये कि कांग्रेस यह तय करेगी कि सपा किसे मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करेगी। उन्हें यह बात बहुत बुरी लगी है कि कांग्रेस सपा की बजाय अखिलेश यादव को तबज्जो दे रही है। उसके बाद ही शिवपाल ने विधायकों द्वारा मुख्यमंत्री चुनने और अखिूलेश यादव ने अपने सभी 403 उम्मीदवारों की सूची नेताजी को सौंपी। इसके बाद यादवी कुनबे में एक बार फिर महाभारत छिड़ने की सुगबुगाहट शुरू हो गई है।
अखिलेश यादव ने भी मौके पर चौका मारा और जैसे ही गठबंधन पर पलीता लगता दिखा उन्होंने अपनी सभी 403 सीटों की सूची मुलायम सिंह यादव के सामने रख दी। अखिलेश यादव को भी मालूम है कि उनकी सूची मुलायम सिंह खारिज करेंगे लेकिन वो अपनी पोजिशनिंग साफ कर देना चाहते थे। रविवार को घटनाक्रम इतनी तेजी से बदला कि जानकार भी चौंक गए कि कहां कांग्रेस-समाजवादी और आरएलडी के बीच सीटों की संख्या सामने आ रही थीं और कहां अचानक मुलायम सिंह यादव ने पूरे गठबंधन को ही खारिज कर दिया। अखिलेश यादव की लिस्ट के नाम तो सामने नहीं आये लेकिन बताते हैं कि इसमें अंसारी बंधु अतीक अहमद  और अमनमणि जैसे दागदार और बाहुबलियों का नाम नहीं है। अखिलेश यादव ने अपने लिए बुंदेलखंड के महोबा जिले से एक सीट चुनी है।
राजनीति संभावनाओं का खेल है इसलिए आगे चलकर क्या होगा इसके बारे में कहना मुश्किल है लेकिन चाचा भतीजे के बीच घमासान का ये दौर सबसे अहम है। छवि की लड़ाई जीत चुके अखिलेश के लिए चुनौती है कि वह अखिरी लड़ाई कैसे जीतते हैं।

Post a Comment Blogger Disqus

 
Top