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बेटे के तेज कदमों की आहट से  ठिठके  मुलायम 
बेटे को मनाते हैं तो भाई रूठ जाता है 
भाई की तरफदारी करते हैं तो बेटा आंखें तरेरने लगता है
विद्याशंकर तिवारी
लखनऊ। कभी इमाम को मस्जिद में इमामियत करने की चुनौती देने वाले सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनके सियासी सफर में एक दिन ऐसा आएगा जब भाई और बेटा दोनों आंख दिखाएंगे। इतिहास गवाह है कि चाहरदीवारी के अंदर चलने वाली लड़ाइयों ने न सिर्फ ताज के लिए सिर बदल दिये बल्कि उसे कटवा भी दिये। देश के सबसे बड़े सियासी कुनबे में मची रार को खत्म करने के लिए बेशक शाही इमाम अहमद बुखारी ने दस्तक दी हो लेकिन यह जंग इतनी आसानी से थमने वाली नहीं है। यह लड़ाई कुर्सी से शुरू हुई है और उसी पर खत्म होगी। विधान परिषद सदस्य उदयवीर सिंह ने भले ही जोश में चिट्ठी लिखकर निजी मामले को सार्वजनिक कर दिया  हो लेकिन उनकी बात सोलह आने सच है। पार्टी और परिवार के मुखिया मुलायम सिंह यादव के लिए इधर कुंआ और उधर खाई वाली स्थिति पैदा हो गई है। बेटे को मनाते हैं तो भाई रूठ जाता है और भाई की तरफदारी करते हैं तो बेटा आंखें तरेरने लगता है।
अंदर की खबर यह है कि शिवपाल और अखिलेश दोनों ने वैकल्पिक व्यवस्था यानी कि बात न मानने पर पार्टी तोड़ने और अपने बूते चुनाव लड़ने की योजना बना रखी है। पारिवारिक विवाद जिस दिन उफान पर था उसी दिन अखिलेश ने एक टीवी कार्यक्रम में कहा था कि लड़ाई परिवार में नहीं बल्कि उस कुर्सी की है जिस पर वो बैठे हैं। फिर जब लड़ाई आगे बढ़ी और उनके सैनिक एक के बाद एक मारे जाने लगे यानी कि पार्टी से बाहर किये गये तो उन्होंने आजम खान के हाथों को दबाकर पत्रकारों से कहा कि जीतता वही है जिसके पास तुरुप का पत्ता होता है। साथ में यह भी जोड़ दिया कि वह झूठ नहीं बोलते हैं। समझदार के लिए इशारा काफी है, अखिलेश खुद यह बता चुके हैं कि अब वह बड़े हो गये हैं और अच्छी तरह जानते हैं कि कब कौन सा पत्ता चलना है। गौर करने वाली बात यह है कि दो हफ्ते पहले तक मुलायम सिंह यादव के निर्णयों पर उंगली उठाने की हैसियत न रखने की बात करने वाले रामगोपाल यादव नेताजी को अब तक का सबसे कड़ा पत्र लिखने की हिमाकत कैसे कर बैठे। जो अखिलेश यादव पिता की डांट खाने के बाद अपने पिता के दोस्तों और शुभचिंतकों से उन्हें मनाने की गुहार लगा रहे थे उसीअखिलेश ने पार्टी की रजत जयंती समारोह से किनारा कर विकास यात्रा के लिए पार्टी प्रमुख से इजाजत मांगने की चिट्ठी लिखने और उसे लीक करने की हिम्मत कैसे जुटा ली। इन कदमों के पीछे सुनियोजित रणनीति है, दबाव की राजनीति है और न मानने पर पार्टी तोड़ने की तैयारी भी। मुलायम सिंह यादव अनुभवी नेता के साथ साथ पहलवान और सुलझे हुए मुखिया हैं। बेटे अखिलेश ने अपने पैरों में पिता मुलायम के जो जूते पहने हैं उसके चाप को वह अच्छी तरह पहचानते हैं। यही वजह है कि जब अखिलेश के कदम तेजी से बढ़े तो वह ठिठक गये। शिवपाल के तरकस में भी कई तीर हैं लेकिन जब तक भीष्म रूपी भाई साथ है तब तक वह तुरीड़ के बाणों को हाथ नहीं लगा रहे हैं।
हालांकि एक बात यह भी कही जा रही है कि नाकामियों को छिपाने के लिए यह परिवार का सुविचारित ड्रामा है, राजनीति में ऐसा होता है लेकिन दीवार पर लिखी इबारत कम से कम इस ड्रामे को तस्दीक नहीं करती। अभी तक अखिलेश तीन नवंबर से यात्रा पर निकलने और मुलायम सिंह यादव व उनके छोटे भाई शिवपाल यादव पार्टी के रजत जयंती समारोह की तैयारियों में व्यस्त हैं । प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव ने शुक्रवार को पार्टी राज्य मुख्यालय पर सभी जिलाध्यक्षों की बैठक बुलायी है, वहीं राज्य कार्यकारिणी की महत्वपूर्ण बैठक शनिवार को होगी। इन बैठकों में सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव और महासचिव रामगोपाल यादव के भी शामिल होने की सम्भावना है। इसी क्रम में 24 अक्तूबर को विधायकों और मंत्रियों की बैठक भी बुलायी गई है। इन बैठकों का एक मात्र मकसद कार्यकर्ताओं का मन टटोलना और स्थिति को भांपना है अलबत्ता सबकी नजरें लगी हैं अखिलेश के कदमों पर। 

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