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   ओंकारेश्वर पांडेय
 पिछले सत्तर साल से हम यही करते आ रहे हैंl जब नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं थे तब भी और आज जब मोदी प्रधानमंत्री हैं, तब भीl एक उम्मीद प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार से जरूर थी, कि उनके कार्यकाल में हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा मिलेगा, पर नहीं मिलाl हम तो बस सितंबर का इंतजार करते हैं, जब हिंदी का उत्सव मनाने को मिलता हैl महीना शुरु होते ही देश भर में हिंदी पखवाड़ा मनाना शुरु हो जाता हैl पर आज भी खड़ी बोली वहीं खड़ी हैlसंसद के दरवाजे परl ठिठकीसहमी और सकुचायी सीl 70 साल हो गएl अंग्रेजी ने कुर्सी खाली नहीं कीl सो खड़ी ही हैlदेश के सम्मानित नेताओं ने कहा था कि जबतक हिंदी कामकाज न संभाल लेतबतक दोनों काम करेंl हिंदी कामकाज संभाल ले तो उसे पूरी तरह कुर्सी दे दी जाएगीl इसकी समय सीमा भी तय हुई कि 1965 तक हिंदी राज का काज संभाल लेगीl और तब अंग्रेजी को मुख्य राजभाषा के पद से हटा कर हिंदी को मुख्य राजभाषा का दर्जा दे दिया जाएगाl ऐसा नहीं है कि इतने सालों में हिंदी कामकाज संभालने लायक नहीं हो पायी हैl पर अंग्रेजी उसे काम करने कहां देती हैl उसे एक कोने में समेट दिया गया हैl सारा काम अंग्रेजी मेंl हिंदी में तो बस अनुवादl बातें तो कुछ हिंदी में हो भी जाएंकाम अंग्रेजी में ही होता हैl कुछ नाम मात्र के अपवाद को छोड़ दें तो संघ के समूचे कामकाज का यही हाल हैl हिंदी इस देश में आज भी राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं पा सकी हैअब भी यह सह-राजभाषा के रूप में ही संघर्षरत हैl जबकि हर ओर अंग्रेजी का बोलबाला हैसेनासरकारबाजार से लेकर शिक्षा और लोकाचार तकl पर हम तो साल में एक बार हिंदी पखवाड़ा या महीने भर का उत्सव मनाकर खुश हो लेते हैंl




हर साल की तरह भारत सरकार के राजभाषा विभाग ने इस साल भी पहले ही सभी सरकारी विभागों को आदेश जारी कर दिया थाl आदेश में कुछ खास नया तो जोड़ना होता नहीं हैl बस यह याद कराया जाता है कि - राजभाषा अधिनियम का सख्ती से पालन हो, अधिनियम 1963 की धारा 3(3) के अतंर्गत संकल्प, सामान्य आदेश, नियम, अधिसूचनाए, प्रशासनिक तथा अन्य रिपोर्टें, प्रेस विज्ञप्तियां, संसद में रखी जाने वाली रिपोर्टें, सरकारी कागजात, संविदाएं, करार, अनुज्ञप्तियां, अनुज्ञापत्र, टेंडर नोटिस तथा टेंडर फार्म आदि द्विभाषी रूप में ही जारी किये जाएंl हिंदी जानने वाले फाइलों पर हिंदी में लिखें, नहीं जानने वाले हिंदी में हस्ताक्षर करें, लिफाफों पर पते हिंदी में हों, हिंदी राज्यों को पत्र हिंदी में जाएं, रबड़ की मोहरें, साइन बोर्ड, पत्रशीर्ष, नामपट्ट, वाहनों पर कार्यालय का विवरण, विजिटिंग कार्ड, बैज, बिल्ले, लोगो, मोनोग्राम, चार्ट, नक्शे द्विभाषी हों- आदि आदिl और इसके साथ ही देश भर के सरकारी, अर्धसरकारी कार्यालय हिंदी की सेवा में जुट जाते हैंl कवियों और लेखकों की चांदी हो गयी हैl कुछ पत्रकार भी हिंदी पखवाड़े में याद कर लिये जाते हैंlहिंदी पर कवि सम्मेलन होंगे, गोष्ठियां होंगी, परिचर्चाएं होंगी और हिंदी के माथे की बिंदी लहलहा उठेगीl

अब ये दूसरा ऐतिहासिक मौका है कि हिंदी को उसका हक मिले, अपने देश में राष्ट्रभाषा का वाजिब दर्जा और संयुक्त राष्ट्र में विश्व भाषा के रूप में मान्यताl पर ऐसा क्यों लग रहा है कि शुरुआती उत्साह के बाद मोदी सरकार इस मुद्दे पर ठंढी पड़ रही हैl इस समय केन्द्र में अकेले मोदी नहीं, राजभाषा हिंदी से जुड़े कई महत्वपूर्ण पदों पर हिंदी ओढ़ने बिछाने वाले महत्वपूर्ण नेता मंत्री के रूप में बैठे हैंl

गृहमंत्री राजनाथ सिंह का तो मंत्रालय ही राजभाषा के विकास और प्रोत्साहन का काम देखता हैl सुषमा स्वराज विदेश मंत्री हैं और दुनिया भर में हिंदी के प्रचार प्रसार से लेकर संयुक्त राष्ट्र में मान्यता का मुद्दा उन्हीं का मंत्रालय देखता हैlलोकसभा की अध्यक्ष हिंदी प्रदेश के इंदौर की ताई सुमित्रा महाजन हैंl और इन सबसे ऊपर हिंदी में ही बाकायदा बिगूल फूंककर चुनाव जीतने वाले स्वयं प्रधानमंत्री मोदी तो हैं हीl निश्चित रूप से प्रधानमंत्री मोदी ने भारत सरकार की शासन प्रणाली से लेकर नीति नियामक संस्थाओं में दशकों से व्याप्त जड़ता को तोड़ा है और नयी जान फूंककर देश-दुनिया में एक विश्वास तो जगाया ही है कि वे सबसे अलग हैंl

राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ की पृष्ठभूमि से आये व गुजरात और गांधी संस्कारों से संस्कारित मोदी ने प्रधानमंत्री बनने से पहले चुनावों के दौरान दक्षिण और पूर्वोत्तर राज्यों सहित पूरे देश में हिन्दी में ही भाषण दिए थे। उनकी पार्टी भाजपा भी हिंदी की पुरजोर समर्थक रही हैl शपथ ग्रहण के बाद राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर राज्यसभा में चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री के हिन्दी में भाषण देने की सराहना सबने की थी। आज भी वे आकाशवाणी पर अपने मन की बात तो हिंदी में ही करते हैंl इसीलिए मोदी और उनकी सरकार से हिंदी को लेकर भी देश की अपेक्षाएं ज्यादा हैंl इसलिए भी क्योंकि वे लीक से हटकर काम करने वाले जबर्दस्त हिंदी प्रेमी व साहसी प्रधानमंत्री भी माने जाते हैं, जिन्होंने अभी अभी बलूचिस्तान को समर्थन देने की बात कहकर पाकिस्तान को उसी की मांद में चुनौती दे डाली है, तो मोदी को ही करनी होगी हिंदी के मन की बात. वरना आज भी हिंदी अपने भाग्य का रोना रो रही है l न तो हम अपने देश में हिंदी को राष्ट्रभाषा बना पा रहे हैं और ही संयुक्त राष्ट्र में इसे वो सम्मान दिला पा रहे हैं, जिसकी ये हकदार हैl 

पहले देश की बात करेंl मार्च 2010 को यूपीए सरकार के एक  बयान ने देश के हिंदी प्रेमियों को जोर का झटका धीरे से दिया थाl सवाल देश में हिंदी की संवैधानिक स्थिति और देश की राष्ट्रभाषा के बारे में थाl सवाल संसद में सत्यव्रत चतुर्वेदी और मोती लाल बोरा ने उठाया थाl इन दोनों नेताओं ने राज्यसभा में अपने अतारांकित प्रश्न संख्या653 में पूछा कि क्या सरकार का ध्यान हाल ही में गुजरात उच्च न्यायालय के उस वक्तव्य की ओर गया हैजिसके अनुसार भारत की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है और हिंदी अधिकारिक तौर पर राष्ट्रभाषा नहीं है और नहीं हैतो हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिए सरकार क्या कदम उठा रही हैजवाब में गृह राज्य मंत्री अजय माकन ने कहा कि हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित करने के संबंध में भारत के संविधान में कोई प्रावधान नहीं हैl संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार हिंदी संघ की राजभाषा हैl पर आश्चर्य इस बात से हुआ कि किसी ने सरकार से यह नहीं पूछा कि इस देश को उसकी राष्ट्रभाषा कब मिलेगीl

इधर वर्ष 2013 में यूपीए की सरकार के कार्यकाल में एक सरकारी आदेश जारी हुआ थाजिसमें यह लिखा गया था कि केन्द्र राज्य सरकारों से हिन्दी में पत्र व्यवहार करेगा तथा राज्य अपनी भाषा में केन्द्र से पत्र व्यवहार कर सकते हैंlलेकिन तमिल सरकार के विरोध के बाद केन्द्र सरकार ने इस आदेश को वापिस ले लियाl जबकि शासन के स्तर पर यह कोई कठिन कार्य इसलिए नहीं थाक्योंकि केन्द्र सरकार अपने यहां तमिल भाषा को समझने के लिए तमिल हिन्दी अनुवादक और तमिलनाडु की सरकार केन्द्र से आने वाले हिन्दी पत्रों को पढ़ने-समझने के लिए उसी प्रकार के अनुवादक रख सकती हैl पर ऐसा नहीं हुआl अगर ये हो जाता तो हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा मिलने का मार्ग प्रशस्त हो जाताl तो हिंदी को लेकर संकल्प शक्ति में क्या अब भी वही कमी है, जो पहले थी?

संघ-भाजपा ने हमेशा हिंदू राष्ट्र बनाने की बात की है और उसी दिशा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का वह ऐलान भी देखा जा सकता है, जिसमें वह राष्ट्रवाद के सवाल पर कोई समझौता नहीं करने की बात करते हैंl पिछले दिनों दिल्ली में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए देश के शीर्ष संपादकों का एक सम्मेलन किया था हिंदी को उसका उचित स्थान-सम्मान दिलाने के लिए अपनी गंभीरता व प्रतिबद्धता दिखायी थीl पर आगे क्या कदम उठे या उठाये गये, इसकी कोई जानकारी नहीं हैl  

अब दुनिया में अपनी भाषा की बात कर लेंl प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में आये विदेशी मेहमानों से दुभाषिए के जरिए हिन्दी में बात कर भारतवासियों को सम्मानित होने का अहसास कराया। मोदी ने यह संकल्प भी ले रखा है कि वह भविष्य में भी विदेशी मेहमानों से हिन्दी में ही बातचीत किया करेंगे। मोदी जब विदेश गये तो अनेक देशों से उनके हिंदी भाषणों के लाइव प्रसारण देखकर देश की जनता मुग्ध हुई कि चलो अब तो अपने देश की भाषा को सम्मान मिलेगाl मोदी के ये कदम पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिन्दी में दिए भाषण की याद दिलाते हैं। चन्द्रशेखर ने भी प्रधानमंत्री रहते हुए मालदीव में हुए दक्षेस सम्मेलन में हिन्दी में भाषण दिया था। पर दुर्भाग्य से हिंदी वास्तविकता के कठोर धरातल पर आज भी वहीं खड़ी है, जहां सन 2003 में थी, जब पहली बार हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ में मान्यता प्राप्त भाषा बनाने के लिए प्रयास शुरु हुएl

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का तो प्रिय विषय रहा है कि संयुक्‍त राष्‍ट्र में हिन्‍दी को कैसे लाया जाये। उनका मंत्रालय इस दिशा में काम भी कर रहा हैl लेकिन यह काम अब तक नहीं हो पाने के पीछे असली वजह यह है कि हिंदी के लिए संरा में 129 वोटों का समर्थन चाहिएl क्योंकि नियमानुसार खर्च बंटना है। अब कुछ नये पेंच भी हैंl जैसे जापान अपनी जापानी भाषा की मान्यता के लिए कह रहा है।

मगर सवाल ये भी है कि आज जब प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत का प्रभाव दुनिया भर में बढ़ रहा हैजिस तरह मोदी सरकार के प्रयासों से अन्‍तर्राष्‍ट्रीय योग दिवस में 177 देशों का समर्थन भारत ने प्राप्‍त किया, तो क्या 129 वोट भारत को हिंदी के लिए नहीं मिल सकते हैंमिल सकते हैं, पर उसके लिए फिर मोदी को ही आह्वान करना होगाl जिस तरह भारत एनएसजी और सुरक्षा परिषद में भारत की स्‍थायी सदस्‍यता के लिए कोशिश कर रहा है, उस तरह का प्रयास हिंदी को लेकर जबतक नहीं किया जाएगा, तबतक हिंदी को संयुक्‍त राष्‍ट्र में मान्यता नहीं मिल पाएगीl

एक समस्या और भी हैl जबसे देश में भोजपुरी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान दिलाने के लिए आंदोलन शुरु हुए हैं, तबसे हिंदी की कमाई पर ऐश करने वाले कुछ चुनिंदा बुद्धिजीवी देश भर में भय का एक मिथ्या माहौल बनाने में लगे हैंl सरकार को भय यह दिखाया जा रहा है कि अगर भोजपुरी, राजस्थानी जैसी भाषाओं को मान्यता मिल गयी तो हिंदी की संख्या कम हो जाएगीl उनका यह तर्क खोखला और झूठी आशंका पर आधारित हैl क्या आज मैथिली को मान्यता मिल जाने से हिंदी कमजोर हो गयी हैक्या छत्तीसगढ़ी को मान्यता मिलने से हिंदी कमजोर हो गयी है?जबकि ग्लोबल भोजपुरी मूवमेंट के नेताओं ने तो साफ ऐलान कर रखा है कि - हिंदी हमरी आन ह अउर भोजपुरी पहचान हl दरअसल भोजपुरी का विरोध कर अपनी अहमियत दिखाने वाले ऐसे हिंदी समर्थक जानबूझकर हिंदी का अहित करने में लगे हैंl उनके इस विरोध से भोजपुरी समर्थकों में गलत संदेश जा रहा हैl भोजपुरी समेत तमाम उपभाषाओं को मान्यता देकर हिंदी और मजबूत ही होगीl इस भाव को मन में रखते हुए सबके साथ मिलकर हिंदी की सेवा की जानी चाहिए ताकि हिंदी को देश और दुनिया में मान्यता दिलाने का वास्तविक लक्ष्य कहीं भटक या अटक न जाएl

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