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विद्याशंकर तिवारी

यूनेस्को विश्व धरोहर में शामिल वैदिक मंत्रोच्चार व वैदिक शिक्षा को आगे बढ़ाने की पहल के तहत सरकार संस्कृत विशेषज्ञों, वेद गुरूकुल और पाठशालाओं के प्रतिनिधियों की सलाह के मद्देनजर केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की तर्ज पर वैदिक शिक्षा बोर्ड की स्थापना पर विचार कर रही है। अभी हाल में एक कार्यक्रम में मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि सरकार इसके सभीपहलुओं को देख रही है। इस प्रस्तावित बोर्ड को मानव संसाधन विकास मंत्रालय की संस्था महर्षि संदीपनि राष्ट्रीय वेद विद्यालय प्रतिष्ठान (एमएसआरवीवीपी) के तहत आगे बढ़ाने पर काम सचिव देवी प्रसाद त्रिपाठी के नेतृत्व में चल रहा है। अभीदेश में वैदिक शिक्षा दे रहे संस्थानों में करीब 10 हजार छात्र हैं। अनुमान है कि अलग बोर्ड बनने से छात्रों की संख्या पहले साल 40 हजार तक पहुंच सकती है। एक विचार यह भीहै कि एमएसआरवीवीपी को बोर्ड का दर्जा दे दिया जाए। बोर्ड बनाने के लिए शुरूआत में 6 करोड़ रूपये की जरूरत होगी। इसकी मांग मानव संसाधन विकास मंत्री के साथ 17 जनवरी को बेंगलुरु में हई बैठक में गुरुकुलों और वेद पाठशालाओं के प्रमुखों ने की थी। एमएसआरवीवीपी की स्थापना 1987 में उज्जैन में हुई थी जो कि वैदिक शिक्षा देता है। इससे देशभर के 450 गुरुकुल और पाठशालाएं जुड़ी हुई हैं जो 10वीं,12वीं के सर्टिफिकेट जारी करते हैं लेकिन उन सर्टिफिकेट को मान्यता नहीं मिलती। वैदिक बोर्ड बन जाने से यह समस्या खत्म हो जाएगी। इसके बाद वैदिक शिक्षा के लिए नए स्कूल बनेंगे जहां वेद और संस्कृत के अलावा गणित और विज्ञान जैसे आधुनिक विषय भीपढ़ाए जाएंगे।
यदि यह बोर्ड बनता है तो निश्चित रूप से वैदिक शिक्षा और आधुनिक शिक्षा के तालमेल से ऐसे युवा तैयार होंगे जिन्हें विज्ञान, गणित व कम्प्यूटर के साथ साथ उस वेद की भीजानकारी होगी जहां से ज्ञान की गंगा निकली है। इसके अलावा मू्ल्यविहीन होती जा रही शिक्षा के और अधिक क्षरण को भीरोकने में मदद मिलेगी। लेकिन बिडंबना देखिए कि एक तरफ तो वैदिक शिक्षा बोर्ड बनाने की रही है और दूसरी तरफ लगभग एक दशक पहले राष्ट्रीय शैक्षणिक और अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने अपने ग्यारहवीं-बारहवीं के इतिहास के पाठ्यक्रम से, वैदिकयुगीन इतिहास को ही निकाल दिया है और अब यह संस्था न तो अपनी इस चूक को न तो मानने को तैयार है और न ही वैदिकयुगीन इतिहास को दोबारा शामिल करने को। विश्व ब्राह्मण संगठन के वैदिक विभाग के प्रमुख ललित मिश्र की आरटीआई के जवाब में एनसीईआरटी ने बहुत ही बेशर्मी से कहा है कि फिलहाल इस इतिहास को पाठ्यक्रम में दोबारा शामिल करने की कोई योजना नहीं है। दिलचस्प तथ्य यह है कि पाठ्यक्रम में ग्रीक, तुर्क, मुगल और अंग्रेजों के शासनकाल और व्यवस्था को तो पढ़ाया जा रहा है लेकिन उस वैदिक इतिहास को नहीं जिसमें दशमलव और पहाड़े का अविष्कार हुआ। राष्ट्र की संप्रभुता की पहली अवधारणा और आग के घरेलू उपयोग के तरीके की खोज हुई।
संपादक- एनओपी
  • 2007 में 11-12वीं की पुस्तक से निकाल दिया था वैदिक इतिहास
  • आरटीआई के जवाब में कहा दोबारा शामिल करने की योजना नहीं
  • वैदिककाल में हुआ था दशमलव और पहाड़े का अविष्कार 
  • एनसीईआरटी का कारनामा

दरअसल 2005 में एनसीईआरटी ने पाठ्यक्रम तय करने के लिए कोलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हरि वासुदेवन की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई जिसमें जेएनयू के प्रोफेसर नीलाद्रि भट्टाचार्य मुख्य सलाहकार थे और रामचंद्र गुहा सहित कई इतिहासकार व शिक्षाविद सदस्य। इस कमेटी की सिफारिश पर इतिहास के पाठ्यक्रम से वैदिक इतिहास को हटाने का निर्णय हुआ। नतीजतन वर्ष 2007 में एनसीईआरटी की 11वीं व 12वीं की इतिहास की जो किताब प्रकाशित हुर्स उसमें से वैदिक इतिहास नदारद हो गया। सनद रहे कि इसी साल में यूनेस्को ने ऋग वेद को विश्व धरोहर में शामिल किया था। यह कम लोगों को मालूम होगा कि वैदिककाल में ही शब्दों की व्याख्या के लिए निरुक्त की रचना की गई, शिक्षा के अंकुर फूटे, परिवार, गांव व राष्ट्र व्यवस्थित हुए। प्रशासन की सबसे छोटी इकाई कुल थी। एक कुल में एक छत के नीचे रहने वाले लोग शामिल थे। ग्राम कई कुलों से मिलकर बना। ग्रामों का संगठन विश कहलाता था और विशों का संगठन जन, कई जनों को मिलाकर राष्ट्र बनाते थे। राष्ट्र -राज्य का शासक राजन (राजा) कहलाता था जो राजा बड़े होते थे उन्हें सम्राट कहते थे। ऋग्वैदिक काल में प्राकृतिक शक्तियों की ही पूजा की जाती थी और कर्मकांडों की प्रमुखता बिल्कुल नहीं थी। वैदिक युग 1200-1500 ईस्वी ईसा पूर्व माना जाता है। कुछ लोग इसे 3000-6000 ईस्वी ईसा पूर्व भी मानते हैं। लेकिन अधिकांश विद्वान वैदिक सभ्यता का काल 2000-600 ईस्वी ईसा पूर्व के बीच मानते हैं।

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