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चेन्नई। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) एक बार फिर इतिहास लिखने को तैयार है। अब से महज कुछ घंटे बाद श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से इनसैट-3डीआर को लॉन्च किया जाएगा।सैटेलाइट को ले जाने वाले जीएसएलवी-05 का कल कई चरणों में सफल परीक्षण किया गया था। इसरो के इतिहास में ये पहला अवसर है जब एडवांस्ड स्वदेशी क्रायोजेनिक (क्रायोजेनिक अपर स्टेज) इंजन के जरिये अधिक वजनी उपग्रह भेजा जाना है। प्रक्षेपण अगर सफल रहा तो यह मील का पत्थर साबित होगा। पिछले दिनों स्वदेशी स्क्रैमजेट इंजन के सफल परीक्षण के बाद यह देश के लिए एक और उपलब्धि होगी। मौसम संबंधित सैटेलाइट ‘इनसेट-3डीआर’ में कई अत्याधुनिक उपकरण लगे हैं, जो मौसम की सटीक गणना करने में सक्षम हैं।
जीएसएलवी की खासियत पढ़कर आप भी कहेंगे वाह भई वाह

ये हैं खूबियां
- इसमें छह चैनल इमेजर व 19 चैनल साउंडर उपकरण लगे हैं।
- इनसे रात में भी बादलों और धुंधले आकाश पर साफ नजर रखी जा सकती है।
- थर्मल इंफ्रारेड बैंड से समुद्र के तापमान को सटीक मापा जा सकेगा।
- 1,700 वाट सौर पैनल से खुद बनाएगा ऊर्जा
- डाटा रिले ट्रांसपोंडर और सर्च और रेस्क्यू ट्रांसपोंडर के जरिये बचाव अभियानों में करेगा मदद।
- सूचना का आदान-प्रदान बेहद तेज होगा।
चौथा मौसम उपग्रह
इसरो का यह चौथा स्वदेशी मौसम उपग्रह है। इससे पहले 2002 में कल्पना-1, 2003 में इनसेट-3ए और 2013 में इनसैट-3डी नामक स्वदेशी मौसम उपग्रह इसरो लांच कर चुका है।
अधिक पेलोड की पहली उड़ान
वैसे तो क्रायोजेनिक इंजन से लैस रॉकेट तीन बार उपग्रह भेजे जा चुके हैं। इस उड़ान के साथ इंजन के उन्नत रूप से अधिक वजन को भेजने की क्षमता को परखा जाना है। जनवरी 2014 और अगस्त 2015 में डी5 और डी6 अभियानों में भी जीएसएलवी में क्रायोजेनिक इंजन इस्तेमाल हुआ। क्रायोजेनिक इंजन के उन्नत रूप को जीएसएलवी में तीसरे स्टेज में लगाया जाएगा। इस इंजन में ईंधन के रूप में तरल हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का इस्तेमाल होता है। भारत छठा ऐसा देश है जिसने क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन विकसित किया है। इसी इंजन से अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा चांद तक पहुंची थी।
जीएसएलवी की 10वीं उड़ान
इनसेट-3डीआर की लांचिंग जियोसिंक्रोनस सेटेलाइट लांच व्हीकल (जीएसएलवी) के जरिये होगी। इस रॉकेट का नाम जीएसएलवी-एफ05 है। यह जीएसएलवी की दसवीं उड़ान है। जीएसएलवी के जरिये 2.5 टन वजनी उपग्रह को भी लांच किया जा सकता है। यह तीन स्टेज (हिस्सों) वाला रॉकेट है। यह इनसेट-3डीआर को जियोस्टेशनरी ट्रांसफर ऑर्बिट तक पहुंचाएगा। वहां से यह अपने गंतव्य तक खुद की प्रोपल्शन प्रणाली से जाएगा।
जीएसएलवी-एफ05 अपनी दसवीं उड़ान में 2,211 किग्रा के अत्याधुनिक मौसम सैटेलाइट इनसैट-3डीआर को जियोस्टेशनरी ट्रांसफर ऑर्बिट (जीटीओ) में प्रक्षेपण करेगा। जीएसएलवी-एफ05 उड़ान में स्वदेशी रूप से विकसित क्रायोजेनिक अपर स्टेज (सीयूएस) चौथी बार जीएसएलवी की उड़ान में सवार किया जाएगा। वेबसाइट के अनुसार जीएसएलवी-एफ05 उड़ान महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सीयूएस से लैस जीएसएलवी की पहली परिचालन उड़ान है। एडवांस मौसम सैटेलाइट श्रीहरिकोटा से जीएसएलवी-एफ 05 के साथ उड़ान भरेगा। इसरो वैज्ञानिक ने बताया, ‘जब हम नया रॉकेट बनाते हैं, तो हम इस बात को सुनिश्चित करते हैं कि यह उचित रूप से काम करेगा या नहीं। इस बात से निश्चिंत हो जाने के बाद हम इसके लांचिंग की तारीख तय करते हैं। जीएसएलवी-एफ05 इस सैटेलाइट को जियोस्टेशनरी ट्रांसफर ऑर्बिट में रखेगा जहां से सैटेलाइट अपने इंधन के साथ अपने फाइनल जियोस्टेशनरी ऑर्बिट में जाएगा।‘
मानव को अंतरिक्ष में भेजने की दिशा में बढ़े भारत के कदम
क्रायोजेनिक इंजन में लिक्विड हाइड्रोजन का उपयोग इंधन के तौर पर होता है और लिक्विड ऑक्सीजन का ऑक्सीडाइजर के तौर पर जो इंधन का खपत करने में मदद करती है। यह लिक्विड रॉकेट इंजन की तुलना में बेहतर होती है।

क्रायोजेनिक इंजन के उन्नत रूप को जीएसएलवी में तीसरे स्टेज में लगाया जाएगा। इस इंजन में ईंधन के रूप में तरल हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का इस्तेमाल होता है। भारत छठा ऐसा देश है जिसने क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन विकसित किया है। इसी इंजन से अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा चांद तक पहुंची थी। क्रायोजेनिक इंजन के उन्नत रूप को जीएसएलवी में तीसरे स्टेज में लगाया जाएगा। इस इंजन में ईंधन के रूप में तरल हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का इस्तेमाल होता है। भारत छठा ऐसा देश है जिसने क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन विकसित किया है। इसी इंजन से अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा चांद तक पहुंची थी।

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