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नई दिल्ली, 01 जुलाई, 2016
 जय प्रकाश पाण्डेय

अब जबकि ब्रिटेन की जनता ने युरोपीयन युनियन से अलग होने का फैसला कर लिया हैतब देश को रघुराम राजन जैसे अर्थशास्त्री की क्या अहमियत होती हैइसका भी आभास आसानी से हो जाएगा. 23 जून, 2016 को ब्रिटेन के यूरोपीयन युनियन में बने रहने या अलग होने के लिए हुई वोटिंग में 51.9% लोगों ने युनियन से अलग होने जबकि 48.1%  ने जुड़े रहने के पक्ष में वोट डाला. जनता को प्रधानमंत्री डेविड कैमरन की  अपीलें भी लुभा नहीं सकीं और लोगों ने अलग होना पसंद किया.

आलम यह है कि ब्रिटीश जनता के इस फैसले से दुनिया भर के शेयर बाजारों में खलबली है और विश्व नेता सकते में हैं. यूरोपीय युनियन से ब्रिटेन के अलग होने के लिए पिछले 20 सालों से अभियान चला रहे यूकेआईपी नेता नाइगल फैरागे ने इन नतीजों को खास आदमी पर आम आदमी की जीत बताया है. उन्होंने कहा कि यह ब्रिटेन की दूसरी आजादी है. दूसरी ओर प्रधान मंत्री डेविड कैमरन ने हार को स्वीकार करते हुए अक्टूबर तक अपना पद छोड़ने की बात कही है.

जाहिर है जो देश और नेता अपने आर्थिक मामलों को सही ढंग से नहीं देखते उन्हें ऐसे ही हालातों का सामना करना पड़ता है. ब्रिटेन की जनता के इस फैसले के बाद भारत सरकार को भी रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन पर किए गए अपने फैसले पर एक बार फिर से विचार करना चाहिए. 'भारत दुनिया के सबसे अच्छे आर्थिक विचारकों में से एक खो रहा है.'  रिजर्व बैंक के सर्वाधिक पॉपुलर गवर्नर रघुराम राजन द्वारा दूसरे कार्यकाल के लिए किसी भी तरह का प्रयास न कर वापस अकादमिक हलके में काम करने की सूचना मिलने के बाद नोबेल पुरस्कार विजेता चर्चित अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन की यह पहली टिप्पणी थी. वाकई केंद्र सरकार के साथ हालिया विवादों को छोड़ दें तो रघुराम राजन की काबिलियत पर शक करने की कोई वजह नहीं है.

3 फरवरी, 1963  को जन्मे रघुराम राजन ने आईआईटी-दिल्ली से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की डिग्री ली और प्रबंधन के प्रतिष्ठित संस्थान आईआईएम से एमबीए करने के बाद मैसाच्युसेट्स इंस्टीच्युट ऑफ टेक्नॉलोजी से पीएचडी करने के लिए अमेरिका के कैंब्रिज चले गए. 1991 से 2013 तक वह युनिवर्सिटी ऑफ शिकागो में वाणिज्य के प्रोफेसर रहे. इस बीच साल 2003 से 2006 तक उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुख्य अर्थशास्त्री के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं. तब इस पद पहुंचने वाले वह सब से युवा थे.

रिजर्व बैंक का गवर्नर बनने से पहले साल 2012–13 के दौरान वह भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार भी रहे. इस दौरान उन्होंने आर्थिक-समीक्षा तैयार कराई. पर राजन को अपने काम के साथ-साथ उनकी बेबाकी के लिए भी जाना जाएगा. वह कई मामलों में अपने पूर्ववर्तियों से अलग थे. आर्थिक से लेकर राजनीतिक मुददों पर उनकी अपनी एक स्पष्ट राय थी.  कभी जेम्स बांड की शैली में उन्होंने कहा था- 'मेरा नाम राजन है और मैं जो कहता हूं वो करता हूं.'

दादरी में गोमांस खाने के आरोप में एक मुस्लिम व्यक्ति की पीट-पीटकर की गई हत्या के बाद सहिष्णुता के समर्थन में उतरते हुए आईआईटी-दिल्लीजहां से उन्होंने पढ़ाई की थीमें कहा था कि सहिष्णुता और पारस्परिक सम्मान विचारों के वातावरण में सुधार के लिए जरूरी हैं और शारीरिक नुकसान या किसी खास समुदाय के लिए मौखिक तिरस्कार की अनुमति किसी भी कीमत पर नहीं होनी चाहिए.

भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर नेताओं के बड़बोलेपन की तुलना 'अंधों में काना राजासे करके उन्होंने खुद के लिए बवाल मोल ले लिया था. पर वह तो राजन हैं. दुनिया भर में जारी आर्थिक मंदी की भविष्यवाणी उन्होंने काफी पहले कर दी थी. इसीलिए उनकी हर बात का वजन माना जाता था.

अमेरिका का ग्रीनकार्ड रखने को लेकर अपनी भारतीयता पर सवाल किए जाने पर राजन ने कभी कहा थाभारतीयता! अपने देश के प्रति प्रेम एक जटिल विषय है. अपने देश के प्रति सम्मान दिखाने का हर व्यक्ति का अपना-अपना अलग तरीका है. मेरी सास कहती हैं कि कर्मयोगी अभी सफर बाकी है-अपना काम करो.

चाहे सरकार के महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रमों पर सवाल उठाना हो या नए जीडीपी आंकड़ों पर सवाल पूछने काराजन के लिए देश सबसे ऊपर था और सरकार की पसंद उसके बाद. इसीलिए उनके विरोधी भी उनके प्रशंसकों से कहीं ज्यादा थे. सरकार के साथ महत्त्वपूर्ण मौद्रिक नीति पर हस्ताक्षर करने के दिन राजन ने हिटलर के शासनकाल का उल्लेख करते हुए कहा था कि मजबूत सरकारें हमेशा सही दिशा में नहीं बढ़ेंगी.

वह रिजर्व बैंक के पहले गवर्नर रहेजिन्होंने केंद्रीय बैंक के प्रमुख के तौर पर दूसरे राष्ट्रीय बैंकों द्वारा पूंजीपतियों को अरबों के लोन देने पर उन की जवाबदेही तय करने की कोशिश की. केंद्रीय बैंक में अपने तीन वर्षों के कार्यकाल के दौरान राजन ने नियमित तौर पर बेबाक भाषण दिए और शैक्षणिक संस्थानों में महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर अपने मन की बात रखी.

शायद यही वजह थी कि आर्थिक हलकों में बे्रक्जिट की तर्ज पर रघुराम राजन के आरबीआई गवर्नर बने रहने की अटकलों पर एक नया शब्द गढ़ा गया था रेक्जिट' . बे्रक्जिट शब्द का इस्तेमाल ब्रिटेन के यूरोपीयन युनियन में बने रहने या अलग होने पर होने वाले मतदान के लिए हो रहा है. पर राजन ने सरकार को उतना मौका भी नहीं दिया और खुद ही अपने दूसरे कार्यकाल के लिए मना करके इस बारे में लेकर लगाई जा रही तमाम अटकलों पर विराम लगा दिया. 

हालांकि राजन द्वारा रिजर्व बैंक गवर्नर के रूप में अगले कार्यकाल के लिए मना कर देने के बाद उनका उत्तराधिकारी कौन होगाको लेकर अटकलों का बाजार गर्म है और इसके लिए रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर उर्जित पटेलपूर्व कैग विनोद राय से लेकर एसबीआई प्रमुख अरुंधति भट्टाचार्यमुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यनविश्व बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री कौशिक बसुराजस्व सचिव शक्तिकान्त दासवित्त मंत्री के पूर्व सलाहकार पार्थसारथी शोमब्रिक्स बैंक के प्रमुख के वी कामत तथा सेबी के चेयरमैन यूके सिन्हा के नाम चर्चा में हैं.

जिन अन्य नामों पर अटकलें चल रही हैं उनमें रिजर्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर राकेश मोहन और सुबीर गोकर्णपूर्व वित्त सचिव विजय केलकरभारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग के पूर्व चेयरमैन अशोक चावलापूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अशोक लाहिडी तथा प्रबुद्ध अर्थशास्त्री आर वैद्यनाथन शामिल हैं. ये सभी योग्य हैं पर यह तय है कि रिजर्व बैंक को भारतीय अर्थव्यवस्था को संभालने और एक रॉक स्टार की स्टाइल में काम करने वाला गवर्नर मिलना मुश्किल है.

हालांकि खुद राजन ने कहा कि रिजर्व बैंक जैसी महान संस्था की पहचान किसी व्यक्ति विशेष से नहीं की जानी चाहिए. उन्होंने यह भी साफ किया है कि वह देश में महंगाई पर रोक लगाने और बैंकों के रिकॉर्ड को साफ करने के अपने अधूरे काम को देखने के लिए तैयार हैं. पर सभी को यह पता है एक बार अपनी अकादमिक गतिविधियों में लौटने के बाद उनके पास वक्त कहां होगा. वैसे भी विश्व बाजार और शोध उनका इंतजार कर रहे हैं. पर राजन चाहे जो कहेंइस देश को उन जैसी प्रतिभाओं की जरूरत हमेशा रहेगी.




           

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