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राजीव रंजन तिवारी,

देश में अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में छींटाकशी करने, गलतबयानी, अफवाह फैलाने और चरित्र हनन का सिलसिला ही चल पड़ा है। रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन पर हमले करते रहने के बाद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने जिस तरह मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम पर निशाना साधा और साथ ही उन्हें हटाने की मांग भी कर डाली, उससे भाजपा के साथ-साथ मोदी सरकार की भी किरकिरी हुई है। इसमें संदेह है कि सुब्रह्मण्यम स्वामी के बयानों को उनके निजी बयान करार देने भर से बात बनने वाली है। अहम पदों पर बैठे लोगों के प्रति स्वामी के हमलावर रुख को आंतरिक लोकतंत्र से भी नहीं ढंका जा सकता। इसके साथ ही वह विपक्षी दलों और आलोचकों को सवाल उठाने का मौका भी दे रहे हैं। स्वामी पर लगाम लगाना इसलिए जरूरी है, क्योंकि उनकी सूची में दो दर्जन से अधिक ऐसे नाम बताए जा रहे हैं, जिनके खिलाफ वह अभियान छेड़ने का इरादा रखते हैं। इसकी अनदेखी भी नहीं की जा सकती कि रघुराम राजन को निशाने पर लेने के बाद उन्होंने दिल्ली के उपराज्यपाल के खिलाफ भी टिप्पणी की और अब मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम के पीछे पड़ गए। पता नहीं उनकी सूची में और कौन-कौन हैं, किंतु ये स्पष्ट है कि इनमें कई अहम पदों पर हैं, जो उनका प्रतिवाद करने की स्थिति में नहीं। ऐसे में यह और जरूरी हो जाता है कि उन्हें ऐसे लोगों के बारे में सार्वजनिक तौर पर उल्टे-सीधे बयान देने से रोका जाए। उन पर लगाम नहीं लगी तो अन्य छोटे मगर बड़बोले नेताओं को भी काबू में रखना मुश्किल होगा। फिलहाल भाजपा द्वारा सुब्रह्मण्यम स्वामी को यह बताया जाना चाहिए कि वह सत्तारूढ़ दल के सांसद के तौर पर वैसा आचरण नहीं कर सकते जैसा विपक्षी दल के नेता के रूप में करते रहे हैं।
वित्त मंत्रालय पर हमले को नए स्तर पर ले जाते हुए बीजेपी सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने अपने ऊपर नियंत्रण रखने की सलाह देने वालों को यह कहते हुए ढंके-छुपे अंदाज में धमकी दी कि कि यदि वह अनुशासन की उपेक्षा करेंगे तो तूफान आ जाएगा। उन्होंने स्पष्ट रूप से वित्त मंत्री अरुण जेटली पर निशाना साधते हुए अपने ट्वीट में कहा कि बिना मांगे मुझे अनुशासन और नियंत्रण की सलाह देने वाले लोग यह नहीं समझ रहे कि यदि मैंने अनुशासन की उपेक्षा की तो तूफान आ जाएगा। स्वामी ने ट्वीट में कहा कि बीजेपी को अपने मंत्रियों को निर्देश देना चाहिए कि वह विदेशी दौरों में परंपरागत और आधुनिक परिधान ही पहनें। कोट और टाई में वह वेटर जैसे लगते हैं। स्वामी ने हालांकि जेटली का नाम नहीं लिया लेकिन वह स्पष्ट रूप से वित्त मंत्री का हवाला दे रहे थे जिन्होंने उनसे मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम पर हमले के मद्देनजर नियंत्रण और अनुशासन की अपील की थी। स्वामी द्वारा आर्थिक मामलों के सचिव शक्तिकांत दास पर निशाना साधने के मद्देनजर सचिव के बचाव में भी जेटली ने अनुशासन शब्द का प्रयोग किया था। लोग मुझे बिना मांगी हुई सलाह देकर अनुशासन और नियंत्रण की बात कह रहे हैं। उन्हें ये नहीं पता कि अगर मैंने अनुशासन तोड़ा तो खूनखराबा हो जाएगा। गौरतलब है कि अखबारों में जेटली की बैंक आफ चायना के अध्यक्ष से मुलाकात की तस्वीर छपी है जिसमें उन्होंने लाउंज सूट पहना है। लगता है कि स्वामी को विदेश में रहे और वहां कार्य किए व्यक्तियों से कुछ ज्यादा ही एलर्जी है। अच्छा हो कि कोई उन्हें यह बताए कि वह खुद भी हार्वर्ड में पढ़ा चुके हैं। स्पष्ट है कि सिर्फ यह जाहिर करने से काम नहीं चलने वाला कि स्वामी तो बिना सोचे किसी के खिलाफ कुछ भी बोलते रहते हैं। भाजपा नेतृत्व इस बात को भी ओझल नहीं कर सकता कि स्वामी वित्त मंत्रालय के तौर-तरीकों के प्रति कुछ ज्यादा ही तीखे तेवर अपनाए हुए हैं।
पिछले कुछ बरसों से घृणा फैलाने वाले लेखन और भाषण देने वाले नेताओं की तादाद बढ़ी है। इनमें भाजपा नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी भी कठघरे में खड़े किए जाते रहे हैं। उन्होंने बीते वर्ष अभिव्यक्ति की आजादी का तर्क देते हुए प्रतिबंध लगाने वाले आईपीसी के प्रावधानों को चुनौती दे डाली थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार से जब जवाब मांगा तो सरकार ने स्वामी पर अभियोग का समर्थन किया और घृणित भाषण रोकने के लिए कानून की जरूरत बताई थी। संविधान के अनुच्छेद-19 में स्पष्ट लिखा हुआ है कि हमें बोलने की आजादी है लेकिन जायज प्रतिबंध भी है। अगर आपकी बयानबाजी, लेखन, भाषण से हिंसा का खतरा है, वैमनस्य बढ़ने या धार्मिक भावनाएं आहत होने का खतरा है और किसी को अपमानित होने का खतरा है तो यहां जायज प्रतिबंध शुरू हो जाता है। देश में प्रतिबंध के लिए याचिकाएं लगती रही हैं और स्वीकार होती रही हैं। यहां जायज प्रतिबंध हमेशा प्रमुख रहा है। एक न्यूनतम पक्ष तो सही है कि अगर कोई अपनी आजादी का इस्तेमाल इस तरह करें कि उससे वैमनस्य और कटुता, हिंसा की आशंका बढ़े तो वह रोका जाना चाहिए। सुब्रह्मण्यम स्वामी बेवजह एक बड़े आदर्श का इस्तेमाल करके ओछी बातों को आगे बढ़ाते रहते हैं। उनका यह ऊंचा आदर्श है अभिव्यक्ति की आजादी। उन्हें लगता है कि अमरीका में जिस तरह अभिव्यक्ति की आजादी का बेजा इस्तेमाल होता है, वैसा ही वे भारत में कर सकते हैं। पर यहां न तो कानून में इसकी इजाजत है, न संविधान में है न ही सुप्रीम कोर्ट के आदेशों में है।
खैर, अब सुब्रह्मण्यम स्वामी अब केन्द्र सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम के पीछे हाथ धोकर पड़ गए हैं। इस तरह उन्होंने पार्टी और सरकार दोनों को सांसत में डाल दिया है। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने सुब्रह्मण्यम का बचाव करते हुए कहा है कि उन पर सरकार को पूरा भरोसा है। उनके बारे में स्वामी का बयान उनका निजी विचार है, उससे पार्टी या सरकार का कोई लेना-देना नहीं है। पर सवाल है कि स्वामी विपक्ष के नेता नहीं हैं, वे सत्तारूढ़ दल से नाता रखते हैं, फिर वे क्यों अरविंद सुब्रह्मण्यम पर निशाना साध रहे हैं जिन्हें इसी सरकार ने नियुक्त किया है? उनका हौसला इस हद तक कैसे बढ़ा? इसके लिए भाजपा नेतृत्व कम दोषी नहीं है। कुछ दिन पहले तक सुब्रह्मण्यम स्वामी रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन के खिलाफ निंदा अभियान छेड़े हुए थे। जान-बूझ कर ब्याज दरें घटाने से इनकार करने और इस तरह देश की अर्थव्यवस्था को इरादतन नुकसान पहुंचाने का आरोप वे राजन पर लगातार लगाते रहे। ब्याज दरों को लेकर वित्तीय विशेषज्ञों के बीच अक्सर मतभेद की गुंजाइश रहती है। रघुराम राजन के कार्यकाल में जब भी मौद्रिक नीति घोषित हुई, आर्थिक विश्लेषकों की अलग-अलग राय सामने आई। पर किसी ने भी सुब्रह्मण्यम स्वामी की तरह रघुराम राजन की नीयत में खोट नहीं बताया। लेकिन स्वामी भारत के हितों के प्रति राजन की निष्ठा पर सवाल उठाने की हद तक चले गए। फिर प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर रिजर्व बैंक के गवर्नर पद से उन्हें हटाने की मांग कर डाली। आखिरकार स्वामी ने तभी चैन की सांस ली, जब रघुराम राजन ने एलान कर दिया कि वे चार सितंबर के बाद दूसरा कार्यकाल नहीं लेंगे।

सवाल है कि क्या अरविंद सुब्रह्मण्यम की तरह रघुराम राजन की बाबत भी स्वामी के आरोप निजी विचारथे? अगर ऐसा था तो भाजपा और सरकार ने दृढ़ता से हस्तक्षेप और रघुराम राजन को पद पर बनाए रखने का प्रयत्न क्यों नहीं किया? अब जब स्वामी ने मुख्य आर्थिक सलाहकार पर हमला बोला है। सरकार इसे उनका निजी विचार कह कर पल्ला झाड़ लेना चाहती है। पर स्वामी की टिप्पणियों को टालने की कोशिश करना बहुत ही हल्की प्रतिक्रिया मानी जाएगी। जबकि सरकार को अपने मुख्य आर्थिक सलाहकार के पद की प्रतिष्ठा की फिक्र है, तो उसे कुछ ऐसा कदम उठाना चाहिए जो कार्रवाई जैसा दिखे। इसके बगैर स्वामी के बयान से दूरी दिखाने की कोशिश बेकार साबित होगी। हाल में स्वामी को राज्यसभा में भेज कर उनका सियासी कद भाजपा नेतृत्व ने ही बढ़ाया है। यही नहीं उन्हें मनोनयन के जरिए राज्यसभा की सदस्यता दी गई जो परिपाटी के खिलाफ है। मनोनयन का प्रावधान पार्टी से जुड़े या सक्रिय राजनीति के लोगों के लिए नहीं बल्कि अन्य क्षेत्रों में विशिष्ट योगदान कर चुके लोगों को ध्यान में रख कर किया गया था। स्वामी पर इतनी मेहरबानी बरसाने की जो भी वजह रही हो, एक के बाद एक किसी न किसी पर कीचड़ उछालते रहने की उनकी फितरत भाजपा को महंगी साबित हो सकती है। इसलिए स्वामी पर लगाम लगाना जरूरी है। देखना है कि सरकार और पार्टी किस हद तक क्या-क्या कर पाती है।

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